भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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५२ स्पन्दकारिका है। इस प्रकार परमेश्वर स्वयं ही तीनों रूपों में भासमान है। निम्नलिखित तालिका से यह बात स्पष्ट हो जायेगी:—

प्रमाता का रूपआवरण का तारतम्यशक्तित्व का स्वरूपआकारभावों का रूपभेद
१.पति प्रमाताविशुद्ध, चिद्रूप<br>अनावृतज्ञातृत्व और कर्तृ-<br>त्वरूपपूर्ण-<br>स्वातन्त्र्यविश्वात्मभाव<br>आकारहीनसारे भाव अपने ही अंग जैसेभेदरहित<br>सर्वव्यापक
२.पशु प्रमाताचिदचित्,<br>आधा आवृत<br>आधा अनावृतसंकुचित<br>ज्ञान और<br>क्रियादेह, प्राण<br>पुर्यष्टक और<br>शून्यसारे भाव<br>अपने से<br>भिन्नदेवता<br>मानव<br>पशुपक्षिवर्ग
३.जड<br>प्रमेयअचित्<br>चिद्रूपता-<br>पूर्ण आवृतज्ञेयभाव<br>और<br>कार्यभावजड<br>पंचमहाभूतघोरमूढ़ता में<br>पड़े रहने के<br>कारण<br>संज्ञाहीनतासारी<br>स्थावर<br>प्रकृति के<br>असंख्यभेद
वास्तव¹ में संसार में दिखाई देने वाली अनन्त भावराशि परमात्मा की अनन्त
शक्तियों के विश्वमय प्रसार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह इसको अपने स्वतन्त्र
संकल्पमात्र से ही अवभासित करता है। स्वरूपतः एकाकार होने पर भी ग्राहकरूप या
ग्राह्यरूप अनेकाकारता को अवभासित करने की संकल्पात्मक क्षमता ही परमेश्वर का
क्रियात्मक स्वातन्त्र्य है जो संकुचित ग्राहकवर्ग में सम्भव नहीं हो सकता है। चैतन्य² किसी
दूसरे वस्तु की अपेक्षा से रूपप्रसार नहीं करता है अपितु यह उसका अकाट्य स्वभाव ही है।
भूमि में डाला हुआ बीज लोकयात्रा की अपेक्षा से अंकुर नहीं बनता है अपितु अंकुरित
१. एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून ।
भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥
(ई० प्र०, २. ४. २)
२. न लोकयात्राभिप्रायज्जनयेद् बीजमङ्कुरम् ।
किन्तु स्वभावात्...........................॥
(ई० सि०, ४१)