स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंपतिप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५३ होना उसका स्वभाव ही है। फलतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संसारी ग्राहक (मित- प्रमाता) और पतिप्रमाता स्वरूपतः भिन्न नहीं हैं। ऐसी दशा में उनकी इच्छाशक्ति भी भिन्न नहीं हो सकती है। परिणामतः ज्ञान और क्रिया में भी भेद नहीं हो सकता है। हां केवल स्वातन्त्र्य के अनुपात और तारतम्य में भेद अवश्य है। पतिप्रमाता पूर्ण स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण विश्वरूप में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों को प्रयोग में ला सकता है जबकि पशुप्रमाता अंशतः स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण, अपनी संकुचित परिधि में ही इन तीनों शक्तियों को, उसी अनुपात से प्रयोग में ला सकता है। इतना ही नहीं, अपितु संसार के अनन्त जीव-जन्तुओं में आपस में भी, चिद्रूपता पर पड़े हुए आवरण का अनुपात से इन तीन शक्तियों की हीनता या अधिकता देखने में आती है। यदि एक छोटे से जीव का विश्व की परिधि और शक्तित्रय का तारतम्य कुछ होता है वही उससे बड़े जीव या मनुष्य का नहीं हो सकता है। महान् दावाग्नि बड़े जंगल को जला सकती है जब कि अंगारा एक छोटे दाह्यपदार्थ को और चिंगारी एक रूई के रेशे को ही जला सकती है। परन्तु जिस प्रकार अग्नि के छोटा या बड़ा होने से उसके जलाने के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता है उसी प्रकार प्रमाता चाहे पतिभाव पर हो या पशुभाव पर, उसके स्पन्दात्मक चैतन्यस्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ सकता है। अब यदि कोई कहे कि छोटी सी चिंगारी भी कभी बड़ी से बड़ी आग बन सकती है, तो ठीक है; पशुप्रमाता भी कभी कभी साधना के बल से पतिप्रमाता बन सकता है । प्रमाता के इस पतिभाव और पशु के विषय में भगवान् उत्पलदेव का कथन है कि प्रमाता¹ को जिस अवस्था में सारा भावमण्डल अपना अंग जैसा ही अर्थात् अपने अहंविम- र्शात्मक स्वभाव से अभिन्न प्रतीत होता है उसको पतिप्रमातृभाव कहते हैं । उस प्रमाता को 'पति' इसलिए कहते हैं कि उसका स्वतन्त्र साम्राज्य सारे भाववर्ग पर छाया रहता है और वह उन सारे भावों को अपने चैतन्यामृत की बिन्दुओं से अनुप्राणन या पालन करता रहता है। इसके प्रतिकूल जिस अवस्था में उसको, मायीय आवरण में ढके रहने के कारण, अपने ही अंगभूत भाव अपने से व्यतिरिक्त रूप में प्रतीत होते हैं उसको 'पशुप्रमातृभाव' कहते हैं। इस अवस्था में वह भाववर्ग का अधिपति न रहकर उनका दास बना रहता है। भावों का क्षोभ (उथल पुथल) ही उसके लिए बन्धन बन जाता है जिसमें फँसकर वह पशु और जन्ममरण की संसृति से दुरत्यय पथ का राही बन जाता है । इन तीनों रूपों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में शैवगुरुओं ने लम्बी-चौड़ी और पेचदार दिमागी कवायद करने के अनन्तर यह निष्कर्ष निकाला है कि ये तीनों आपस में अभेद-सम्बन्ध में स्थित हैं । १. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥ (ई० प्र०, ३. २. ३)