स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ स्पन्दकारिका अब रह जाता है प्रश्न आत्मबल और उसके स्पर्श का। आत्मसत्ता में स्पन्दमयी पूर्णाहन्ता का बल है। पतिप्रमातृभाव की अवस्था में यह बल अपरिमित एवं पूर्ण स्वतन्त्र है। संसारी ग्राहकभाव की अवस्था में इसका 'स्पर्श' अर्थात् अंशतः विद्यमानता है अतः वह परिमित एवं अंशतः स्वतन्त्र है। यही कारण है कि जहाँ पतिप्रमाता असीम रूप में सब कुछ युगपत् ही चाहता है, जानता है और करता है, वहाँ पशुप्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टक के पिंजरे में बद्ध होने के कारण, ससीम रूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही चाहता है, जानता है और करता है। परन्तु दोनों रूपों में प्रवर्त्तमान क्रियाशीलता वास्तव में मौलिक¹ आत्म- सत्ता पर ही आश्रित है। फलतः पशुप्रमाता भी वास्तव में स्वरूप में ही अवस्थित है, उससे बाहर नहीं है। इसके अतिरिक्त 'आत्मबलस्पर्श' का अभिप्राय स्वरूप की पूर्णानुभूति होना भी है। पशुप्रमाता को अलक्ष्य अनुग्रह से जब वास्तविक पूर्ण अहन्तारूप स्वरूप की अनुभूति हो जाती है तब वह भी पशुभाव से मुक्त होकर साक्षात् शिव ही बन जाता है। ऐसी दशा में उसकी इच्छा विश्वात्मा की ही इच्छा होती है। आत्मबल के विषय पर आगे भी यथासम्भव विवेचन किया जायेगा। यहाँ पर केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि आत्मबल का महत्त्व शब्दों के द्वारा अवर्णनीय है। इसके स्पर्शमात्र से, करणवर्ग ही क्या, सारे विश्व में हलचल मच जाती है। आज का यांत्रिक युग तो इसका ज्वलन्त उदाहरण है। किसी भी बिन्दु पर आत्मबल का स्पर्श पाते ही सारा जडवर्ग ऐसे नाचने लगता है कि मानो कठपुतलियाँ नाच रही हों। प्रत्येक प्राणी की पंच- भौतिक काया, प्राण इत्यादि भी इसके अपवाद नहीं हैं ॥८॥ [ क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ] पूर्व सूत्र में यह बात सिद्ध की गई कि वास्तव में पतिप्रमाता में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है। इस सिद्धान्त को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु सूत्र का अन्तिम चरण इसमें अड़चन उत्पन्न कर रहा है। वह यह कि यदि जीव और शिव में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है तो इस अन्तिम चरण-'पुरुषस्तत्समो भवेत्' में पुरुष को शिव के साथ समानता प्राप्त करने की आवश्यकता को अभिव्यक्त करने का क्या प्रयोजन है ? अतः स्पष्ट है कि स्वरूपगत भेद न होने पर भी पुरुष किसी बात में शिव से न्यून है। अगले सूत्र में इसी बात पर प्रकाश डाला जा रहा है— निजशुद्ध्याससमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥९॥ स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत, तदास्य भवति परमे पदे प्रतिष्ठानम् ॥९॥ १. यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते । जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ (अ० प्र० सि०, २०)