भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 190 में से

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क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ५५ अनुवाद सूत्र—अपने ही स्वातन्त्र्य से उत्पादित सहज १अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए और संसार के वासनात्मक २कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े हुए, मितप्रमाता का ३क्षोभ, जब स्वरूप में ही लीन हो जाये तब उसको परमपद प्राप्त होता है ॥९॥ वृत्ति—स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि के द्वारा ओत-प्रोत रहने के कारण और वासना- त्मक कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े रहने के कारण, मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने नहीं पाता है। परन्तु जब इनका क्षोभ अर्थात् देहादि पर 'अहं' अभिमानमूलक विकल्पपरम्परा, स्वरूप में ही लीन हो जाये, तब यह सर्वोत्कृष्ट पदवी पर प्रतिष्ठित हो जाता है ॥९॥ विवरण शैवशास्त्रियों ने स्थान स्थान पर विश्वात्मा के पतिरूप और पशुरूप की तर्कपूर्ण विवेचना प्रस्तुत करके, प्रबल युक्तियों के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया है कि ये दोनों रूप वास्तव में एक ही स्वतन्त्र सत्ता के 'पूर्णस्वतन्त्र' और 'संकुचितस्वतन्त्र' रूपान्तर मात्र हैं। उस सत्ता ने विश्वमयता के महान् नाटक की भूमिका निभाने के लिये, अपनी ही इच्छा से, अपने को ही अख्याति का लबादा पहना कर 'संकुचितस्वतन्त्र' रूप धारण किया है। 'पूर्णस्वतन्त्र' रूप में यह भूमिका निभ नहीं सकती क्योंकि पूर्ण में संकोच कहाँ और संकोच के अभाव में संसार कहाँ ? फलतः यदि 'पति' अग्नि का बड़ा सा ढेर है तो 'पशु' उसी की एक छोटी सी चिंगारी है। वह अनुपम अभिनेता स्वयं ही महान् और स्वयं ही लघु है, परन्तु वास्तव में महत्ता और लघुता इत्यादि सारे मायीय बन्धनों से रहित स्वातन्त्र्यवन- विहारी आनन्दघन है। वह शवित्तघन प्रति समय चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच रूपों में स्पन्दायमान है। इनमें से आनन्दशक्ति के द्वारा विश्वरूप की सर्जना होती है क्योंकि सारा विश्व असीम आनन्दामृत की उछल्लता ही है। परमेश्वर संसार भाव को, अपने से भिन्नरूप में (वेद्यरूप में) अवभासित करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति को मायाशक्ति का रूप देकर, उससे जनित स्वात्मविस्मृतिरूप अख्याति (अपने स्वरूप की पूर्णता की विस्मृति) के द्वारा, अपने वास्तविक असीमरूप को भुलाकर, ससीम पशु का रूप धारण करता है। इसको शास्त्रीय शब्दों में अभेद व्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति का ग्रहण करना कहते हैं। फलतः अख्याति भी पतिप्रमाता की स्वयं ही उत्पादित अशुद्धि है, जिसके द्वारा वह स्वयं ही शक्ति-दरिद्र बन कर, जीवभाव की संकुचित और पग पग पर हेयता और उपादेयता के संशयों से ग्रस्त, इतिकर्तव्यता के क्षोभ में पड़ गया है। यह क्षोभ अर्थात् संसार की अनन्त तुच्छ कामनायें और उनकी पूर्ति के लिए चिरसंघर्ष ही तो इन दो रूपों में एक ऐसी गहरी खाई है जिसको पाटना उतना सरल नहीं जितना आम गोष्ठियों में कहा या सुना १-३. सूत्र में उल्लिखित 'अशुद्धि' शब्द से आणव, 'कर्त्तव्य' शब्द से कार्म और 'क्षोभ' शब्द से मायीय मलों का अभिप्राय है।

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