भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

५२ स्पन्दकारिका है। इस प्रकार परमेश्वर स्वयं ही तीनों रूपों में भासमान है। निम्नलिखित तालिका से यह बात स्पष्ट हो जायेगी:—

प्रमाता का रूपआवरण का तारतम्यशक्तित्व का स्वरूपआकारभावों का रूपभेद
१.पति प्रमाताविशुद्ध, चिद्रूप<br>अनावृतज्ञातृत्व और कर्तृ-<br>त्वरूपपूर्ण-<br>स्वातन्त्र्यविश्वात्मभाव<br>आकारहीनसारे भाव अपने ही अंग जैसेभेदरहित<br>सर्वव्यापक
२.पशु प्रमाताचिदचित्,<br>आधा आवृत<br>आधा अनावृतसंकुचित<br>ज्ञान और<br>क्रियादेह, प्राण<br>पुर्यष्टक और<br>शून्यसारे भाव<br>अपने से<br>भिन्नदेवता<br>मानव<br>पशुपक्षिवर्ग
३.जड<br>प्रमेयअचित्<br>चिद्रूपता-<br>पूर्ण आवृतज्ञेयभाव<br>और<br>कार्यभावजड<br>पंचमहाभूतघोरमूढ़ता में<br>पड़े रहने के<br>कारण<br>संज्ञाहीनतासारी<br>स्थावर<br>प्रकृति के<br>असंख्यभेद
वास्तव¹ में संसार में दिखाई देने वाली अनन्त भावराशि परमात्मा की अनन्त
शक्तियों के विश्वमय प्रसार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह इसको अपने स्वतन्त्र
संकल्पमात्र से ही अवभासित करता है। स्वरूपतः एकाकार होने पर भी ग्राहकरूप या
ग्राह्यरूप अनेकाकारता को अवभासित करने की संकल्पात्मक क्षमता ही परमेश्वर का
क्रियात्मक स्वातन्त्र्य है जो संकुचित ग्राहकवर्ग में सम्भव नहीं हो सकता है। चैतन्य² किसी
दूसरे वस्तु की अपेक्षा से रूपप्रसार नहीं करता है अपितु यह उसका अकाट्य स्वभाव ही है।
भूमि में डाला हुआ बीज लोकयात्रा की अपेक्षा से अंकुर नहीं बनता है अपितु अंकुरित
१. एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून ।
भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥
(ई० प्र०, २. ४. २)
२. न लोकयात्राभिप्रायज्जनयेद् बीजमङ्कुरम् ।
किन्तु स्वभावात्...........................॥
(ई० सि०, ४१)

पतिप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५३ होना उसका स्वभाव ही है। फलतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संसारी ग्राहक (मित- प्रमाता) और पतिप्रमाता स्वरूपतः भिन्न नहीं हैं। ऐसी दशा में उनकी इच्छाशक्ति भी भिन्न नहीं हो सकती है। परिणामतः ज्ञान और क्रिया में भी भेद नहीं हो सकता है। हां केवल स्वातन्त्र्य के अनुपात और तारतम्य में भेद अवश्य है। पतिप्रमाता पूर्ण स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण विश्वरूप में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों को प्रयोग में ला सकता है जबकि पशुप्रमाता अंशतः स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण, अपनी संकुचित परिधि में ही इन तीनों शक्तियों को, उसी अनुपात से प्रयोग में ला सकता है। इतना ही नहीं, अपितु संसार के अनन्त जीव-जन्तुओं में आपस में भी, चिद्रूपता पर पड़े हुए आवरण का अनुपात से इन तीन शक्तियों की हीनता या अधिकता देखने में आती है। यदि एक छोटे से जीव का विश्व की परिधि और शक्तित्रय का तारतम्य कुछ होता है वही उससे बड़े जीव या मनुष्य का नहीं हो सकता है। महान् दावाग्नि बड़े जंगल को जला सकती है जब कि अंगारा एक छोटे दाह्यपदार्थ को और चिंगारी एक रूई के रेशे को ही जला सकती है। परन्तु जिस प्रकार अग्नि के छोटा या बड़ा होने से उसके जलाने के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता है उसी प्रकार प्रमाता चाहे पतिभाव पर हो या पशुभाव पर, उसके स्पन्दात्मक चैतन्यस्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ सकता है। अब यदि कोई कहे कि छोटी सी चिंगारी भी कभी बड़ी से बड़ी आग बन सकती है, तो ठीक है; पशुप्रमाता भी कभी कभी साधना के बल से पतिप्रमाता बन सकता है । प्रमाता के इस पतिभाव और पशु के विषय में भगवान् उत्पलदेव का कथन है कि प्रमाता¹ को जिस अवस्था में सारा भावमण्डल अपना अंग जैसा ही अर्थात् अपने अहंविम- र्शात्मक स्वभाव से अभिन्न प्रतीत होता है उसको पतिप्रमातृभाव कहते हैं । उस प्रमाता को 'पति' इसलिए कहते हैं कि उसका स्वतन्त्र साम्राज्य सारे भाववर्ग पर छाया रहता है और वह उन सारे भावों को अपने चैतन्यामृत की बिन्दुओं से अनुप्राणन या पालन करता रहता है। इसके प्रतिकूल जिस अवस्था में उसको, मायीय आवरण में ढके रहने के कारण, अपने ही अंगभूत भाव अपने से व्यतिरिक्त रूप में प्रतीत होते हैं उसको 'पशुप्रमातृभाव' कहते हैं। इस अवस्था में वह भाववर्ग का अधिपति न रहकर उनका दास बना रहता है। भावों का क्षोभ (उथल पुथल) ही उसके लिए बन्धन बन जाता है जिसमें फँसकर वह पशु और जन्ममरण की संसृति से दुरत्यय पथ का राही बन जाता है । इन तीनों रूपों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में शैवगुरुओं ने लम्बी-चौड़ी और पेचदार दिमागी कवायद करने के अनन्तर यह निष्कर्ष निकाला है कि ये तीनों आपस में अभेद-सम्बन्ध में स्थित हैं । १. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥ (ई० प्र०, ३. २. ३)

५४ स्पन्दकारिका अब रह जाता है प्रश्न आत्मबल और उसके स्पर्श का। आत्मसत्ता में स्पन्दमयी पूर्णाहन्ता का बल है। पतिप्रमातृभाव की अवस्था में यह बल अपरिमित एवं पूर्ण स्वतन्त्र है। संसारी ग्राहकभाव की अवस्था में इसका 'स्पर्श' अर्थात् अंशतः विद्यमानता है अतः वह परिमित एवं अंशतः स्वतन्त्र है। यही कारण है कि जहाँ पतिप्रमाता असीम रूप में सब कुछ युगपत् ही चाहता है, जानता है और करता है, वहाँ पशुप्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टक के पिंजरे में बद्ध होने के कारण, ससीम रूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही चाहता है, जानता है और करता है। परन्तु दोनों रूपों में प्रवर्त्तमान क्रियाशीलता वास्तव में मौलिक¹ आत्म- सत्ता पर ही आश्रित है। फलतः पशुप्रमाता भी वास्तव में स्वरूप में ही अवस्थित है, उससे बाहर नहीं है। इसके अतिरिक्त 'आत्मबलस्पर्श' का अभिप्राय स्वरूप की पूर्णानुभूति होना भी है। पशुप्रमाता को अलक्ष्य अनुग्रह से जब वास्तविक पूर्ण अहन्तारूप स्वरूप की अनुभूति हो जाती है तब वह भी पशुभाव से मुक्त होकर साक्षात् शिव ही बन जाता है। ऐसी दशा में उसकी इच्छा विश्वात्मा की ही इच्छा होती है। आत्मबल के विषय पर आगे भी यथासम्भव विवेचन किया जायेगा। यहाँ पर केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि आत्मबल का महत्त्व शब्दों के द्वारा अवर्णनीय है। इसके स्पर्शमात्र से, करणवर्ग ही क्या, सारे विश्व में हलचल मच जाती है। आज का यांत्रिक युग तो इसका ज्वलन्त उदाहरण है। किसी भी बिन्दु पर आत्मबल का स्पर्श पाते ही सारा जडवर्ग ऐसे नाचने लगता है कि मानो कठपुतलियाँ नाच रही हों। प्रत्येक प्राणी की पंच- भौतिक काया, प्राण इत्यादि भी इसके अपवाद नहीं हैं ॥८॥ [ क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ] पूर्व सूत्र में यह बात सिद्ध की गई कि वास्तव में पतिप्रमाता में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है। इस सिद्धान्त को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु सूत्र का अन्तिम चरण इसमें अड़चन उत्पन्न कर रहा है। वह यह कि यदि जीव और शिव में कोई स्वरूपगत भेद नहीं है तो इस अन्तिम चरण-'पुरुषस्तत्समो भवेत्' में पुरुष को शिव के साथ समानता प्राप्त करने की आवश्यकता को अभिव्यक्त करने का क्या प्रयोजन है ? अतः स्पष्ट है कि स्वरूपगत भेद न होने पर भी पुरुष किसी बात में शिव से न्यून है। अगले सूत्र में इसी बात पर प्रकाश डाला जा रहा है— निजशुद्ध्याससमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥९॥ स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत, तदास्य भवति परमे पदे प्रतिष्ठानम् ॥९॥ १. यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते । जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ (अ० प्र० सि०, २०)

क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ५५ अनुवाद सूत्र—अपने ही स्वातन्त्र्य से उत्पादित सहज १अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए और संसार के वासनात्मक २कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े हुए, मितप्रमाता का ३क्षोभ, जब स्वरूप में ही लीन हो जाये तब उसको परमपद प्राप्त होता है ॥९॥ वृत्ति—स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि के द्वारा ओत-प्रोत रहने के कारण और वासना- त्मक कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े रहने के कारण, मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने नहीं पाता है। परन्तु जब इनका क्षोभ अर्थात् देहादि पर 'अहं' अभिमानमूलक विकल्पपरम्परा, स्वरूप में ही लीन हो जाये, तब यह सर्वोत्कृष्ट पदवी पर प्रतिष्ठित हो जाता है ॥९॥ विवरण शैवशास्त्रियों ने स्थान स्थान पर विश्वात्मा के पतिरूप और पशुरूप की तर्कपूर्ण विवेचना प्रस्तुत करके, प्रबल युक्तियों के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया है कि ये दोनों रूप वास्तव में एक ही स्वतन्त्र सत्ता के 'पूर्णस्वतन्त्र' और 'संकुचितस्वतन्त्र' रूपान्तर मात्र हैं। उस सत्ता ने विश्वमयता के महान् नाटक की भूमिका निभाने के लिये, अपनी ही इच्छा से, अपने को ही अख्याति का लबादा पहना कर 'संकुचितस्वतन्त्र' रूप धारण किया है। 'पूर्णस्वतन्त्र' रूप में यह भूमिका निभ नहीं सकती क्योंकि पूर्ण में संकोच कहाँ और संकोच के अभाव में संसार कहाँ ? फलतः यदि 'पति' अग्नि का बड़ा सा ढेर है तो 'पशु' उसी की एक छोटी सी चिंगारी है। वह अनुपम अभिनेता स्वयं ही महान् और स्वयं ही लघु है, परन्तु वास्तव में महत्ता और लघुता इत्यादि सारे मायीय बन्धनों से रहित स्वातन्त्र्यवन- विहारी आनन्दघन है। वह शवित्तघन प्रति समय चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच रूपों में स्पन्दायमान है। इनमें से आनन्दशक्ति के द्वारा विश्वरूप की सर्जना होती है क्योंकि सारा विश्व असीम आनन्दामृत की उछल्लता ही है। परमेश्वर संसार भाव को, अपने से भिन्नरूप में (वेद्यरूप में) अवभासित करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति को मायाशक्ति का रूप देकर, उससे जनित स्वात्मविस्मृतिरूप अख्याति (अपने स्वरूप की पूर्णता की विस्मृति) के द्वारा, अपने वास्तविक असीमरूप को भुलाकर, ससीम पशु का रूप धारण करता है। इसको शास्त्रीय शब्दों में अभेद व्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति का ग्रहण करना कहते हैं। फलतः अख्याति भी पतिप्रमाता की स्वयं ही उत्पादित अशुद्धि है, जिसके द्वारा वह स्वयं ही शक्ति-दरिद्र बन कर, जीवभाव की संकुचित और पग पग पर हेयता और उपादेयता के संशयों से ग्रस्त, इतिकर्तव्यता के क्षोभ में पड़ गया है। यह क्षोभ अर्थात् संसार की अनन्त तुच्छ कामनायें और उनकी पूर्ति के लिए चिरसंघर्ष ही तो इन दो रूपों में एक ऐसी गहरी खाई है जिसको पाटना उतना सरल नहीं जितना आम गोष्ठियों में कहा या सुना १-३. सूत्र में उल्लिखित 'अशुद्धि' शब्द से आणव, 'कर्त्तव्य' शब्द से कार्म और 'क्षोभ' शब्द से मायीय मलों का अभिप्राय है।

५६ स्पन्दकारिका जाता है। यदि किसी प्रकार अर्थात् गम्भीर अध्ययन, श्रद्धा-भक्ति, अथक-अभ्यास, शक्तिपात- रूप गुरुकृपा इत्यादि साधनात्मक उपायों के द्वारा इस खाई को पाटना सम्भव हो सके तो स्वरूपस्पन्द की अनुभूति हो जाती है और पशु भी साक्षात् पति ही बन जाता है। शैवगुरुओं ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञा, तंत्रालोक इत्यादि महान् शैवग्रन्थों में, स्वतन्त्र चैतन्य की इसी द्विमुखी स्फुरणा के सिद्धान्त और इसके साथ सम्बन्धित अवरोहप्रक्रिया की विस्तृत एवं गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की है परन्तु उसका अध्ययन करना लोहे के चने चबाना ही तो है। शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा बहुधा संशयों की निवृत्ति गुरुओं के वचनामृतों से ही हो जाती है। अस्तु, जहाँ तक स्वतन्त्र संवित्-भट्टारिका के स्वयं ही अस्वतन्त्र संसारी पशुपदवी पर अवतीर्ण होने की प्रक्रिया का प्रश्न है उस पर सूत्र १९-२० में यथा सम्भव प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर केवल विषय को स्पष्ट करने के लिए शैव दर्शन के स्वातन्त्र्यवाद, अशुद्धि और माया के स्वरूप पर थोड़ा बहुत प्रकाश डालना आवश्यक है। स्वातन्त्र्य—शैवशास्त्रों में 'स्वातन्त्र्य' शब्द और 'चैतन्य शब्द पर्यायवाची हैं। दोनों भाववाचक संज्ञायें हैं। इनको भाववाचक रखने का एक विशेष अभिप्राय है। वह अभिप्राय आगे स्पष्ट हो जायेगा। पहले यह समझना आवश्यक है कि स्वातन्त्र्य या चैतन्य शब्दों से ज्ञान और क्रिया के स्वतन्त्र अर्थात् १अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व का अभिप्राय लिया गया है। इसका अर्थ विश्वात्मक रूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच प्रकार के दुर्घट कृत्यों के जानने और करने में, अनन्यमुखापेक्षी अर्थात् स्वरूप से इतर और किसी सत्ता पर निर्भरता का अभाव है। इस स्वतन्त्र२ आत्मनिर्भरता की स्वरूपभूता पूर्णज्ञातृता और पूर्णकर्तृता की अहंविमर्शनमयी विश्वात्मक-स्फुरणा को ही शैव शब्दों में स्वातन्त्र्य, चैतन्य या आत्मा इत्यादि नाम दिये गये हैं। अब यह देखना है कि इस सर्वोत्कृष्ट सत्ता को स्वतन्त्र न कह कर स्वातन्त्र्य या चेतन न कह कर चैतन्य कहने का अभिप्राय क्या है ? शैवदर्शन में ज्ञातृता और कर्तृता का साधारण ज्ञान (जानना) या क्रिया (करना) अर्थ नहीं है, प्रत्युत विश्वरूप में प्रत्येक वस्तु के देश, काल एवं आकार की बाधाओं या सीमाओं से अबाधित रूप में, जानने३ और करने की क्रिया का स्वतन्त्र कर्तृत्व ही ज्ञातृता और कर्तृता है। साधारण पशुभाव में प्रत्येक जीव भी जानता और करता है परन्तु उस को एक ही समय पर प्रत्येक वस्तु जानने और करने की स्वतन्त्रता नहीं है क्योंकि वह देश, काल एवं आकार की परिधियों में सीमित हो कर कुछ ही जान सकता है या कुछ ही कर सकता है; सारा नहीं। फलतः संसारी जीव में अपने सीमित विश्व के अनुपात से सीमित स्वातन्त्र्य है। अतः वह प्रतिसमय पर-मुखापेक्षी है। १. स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई० प्र० वि०, १. ८. ११) २. 'चैतन्यमात्मा'········'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते । (शि० सू० वि०, १. १) चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । (शि० स्तो० वि०, १. १) ३. आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदित''''''''। (ई० प्र०, १. ५. १२)

मोक्ष की शक्ति और सानन्द की उपलब्धि ५७ 'चेतन' और 'चैतन्य' का मूल शब्द 'चिति' है। इस 'चिति' शब्द का अर्थ चेतने की क्रिया है। यह चेतने की क्रिया संसार के प्रत्येक ग्राहक में सर्वसाधारण रूप में विद्यमान है। यदि^२ सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो सारे तथाकथित जड पदार्थों में भी इसका सद्भाव पाया जाता है। चेतने वाले को चेतन कहा जाता है अर्थात् जो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी वस्तु को जान सके या कर सके। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु फिर भी एक संसारी ग्राहक और विश्वात्मा के चेतने में क्या भेद है ? यदि कोई भेद नहीं है तो पूर्ण-स्वातन्त्र्य नहीं कहा जा सकता है। अतः^३ शैव दार्शनिकों ने इसकी भाववाचक संज्ञा बनाकर यह अभिप्राय निकाला है कि विश्वात्मकरूप में ज्ञानक्रियामयी चेतने की क्रिया का पूर्ण अधिकारात्मक और अनन्य- मुखापेक्षी कर्तृत्व ही पूर्ण स्वातन्त्र्य अथवा पारमेश्वर ऐश्वर्य है। यह कर्तृत्व अथवा स्वातन्त्र्य ऐसा है कि शाश्वतरूप में सत्तावान् होकर किसी भी देश, काल इत्यादि की संकुचित परिधि में सीमित नहीं है। विश्वात्मा प्रत्येक समय प्रत्येक बात को जानने या करने में स्वतन्त्र है फलतः^४ 'चैतन्य' शब्द से केवल और केवल ज्ञातृता-कर्तृता-रूप स्वातन्त्र्य को अभिव्यक्त किया गया है और यही स्वातन्त्र्य शाश्वत स्पन्दमय पतिप्रमाता का वास्तविक स्वरूप और सारे विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा चिन्त्यमान पदार्थवर्ग का आधार एवं अन्तिम विश्रान्तिस्थान भी है। इसी स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में सतत स्पन्दमयी-संवित् भी कहते हैं। इस विषय के अधिक स्पष्टीकरण के लिए पूर्वोक्त ज्ञानक्रियात्मक चितिक्रिया के स्वरूप को भी समझना आवश्यक है। जैसा पहले सूत्र के विवरण में भी स्पष्ट किया गया है कि चितिक्रिया का स्वरूप चलना, पकाना इत्यादि स्थूल क्रियाओं का जैसा नहीं अपितु आन्तर अनुसंधानात्मक अथवा मात्र संकल्पात्मक गतिमयता ही है जिसको शास्त्रीय शब्दों में अहं^५ प्रत्यवमर्शात्मक सामान्यस्पन्द कहते हैं। यह विमर्शात्मकता ही इसका एक अविच्छेद्य स्वभाव है जो इसको ^६जड़ से पृथक् करता है। ज्ञान और क्रिया अथवा प्रकाश और विमर्श दो अलग पदार्थ नहीं अपितु एक ही चितिशक्ति की द्विमुखी स्पन्दात्मकता के द्योतक हैं। क्रिया, ज्ञान की ही पल्लवित दशा है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्वरूप है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रकाश अर्थात् शिव ही बहिर्मुखदशा में विमर्श अर्थात् शक्ति ही अन्तर्मुख दशा में प्रकाश अर्थात् शिव है। 'अहं' ही 'इदं' का बीजरूप और 'इदं' ही 'अहं' का विकसित १. 'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा' (शि० सू० वि०, १. १) २. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के १. १. ३ सूत्र पर भास्कराचार्य की टीका, (भास्करी, प्रथमभाग, पृष्ठ ६५) ३. चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियासम्बन्धमयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्। (शि० सू० वि०, १. १) ४. 'चैतन्यमिति भावन्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम्। अनाक्षिप्तविशेषं सदाह सूत्रे पुरातने। (तं०, १. २८) ५. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा। (ई० प्र०, १.५.१३) ६. तेन जडात् स हि विलक्षणः। (ई० प्र०, १. ५-१२)

५८ स्पन्दकारिका रूप है । स्पन्दात्मक शिव में सारा जगत् अभेदरूप में अवस्थित है और सारा जगत् ही शिव का प्रसार है । ऐसी ही चितिकर्तृ'तारूप स्वातन्त्र्य की गति में कहीं कोई अड़चन खड़ी नहीं हो सकती है और यही कारण है कि विश्वात्मा स्वयं उत्पादित अशुद्धि के द्वारा अपने ही स्वरूप को भागशः आवृत करके संसारी जीव का और पूरा आवृत करके सारे जडवर्ग का रूप धारण करके अवस्थित है । स्वातन्त्र्य तो आखिर स्वातन्त्र्य ही है । वह स्वयं ही कभी अर्धस्वतन्त्र या अस्वतन्त्र भी बन सकता है । यदि न बन सकता तो पूर्णस्वातन्त्र्य ही नहीं कहलाता । अशुद्धि—शैवशास्त्रों में अशुद्धि, अख्याति, मल अथवा बन्ध इत्यादि कतिपय शब्दों से वास्तविक स्वतन्त्र स्वरूप के अज्ञान का अर्थ लिया जाता है । स्वरूप का अज्ञान ही एक ऐसी महान् अशुद्धि है जिसने विश्वात्मा को भी विश्वात्मभाव से गिरा कर पशुभाव के चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है। इस अज्ञान के स्वरूप के विषय में भगवान् चन्द्रमौलि ने—'ज्ञान बन्धः' [शिवसूत्र १-२] इस सूत्र में यह निर्णय दिया है कि, 'अज्ञान' का अभिप्राय सर्वथा ज्ञानाभाव नहीं, अपितु वास्तविक स्वरूप का अपूर्णज्ञान है । १अज्ञान तिमिर (एक प्रकार का आँखों का रोग) है जो कि स्वरूपगोपन अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाने अर्थात् विस्मृत करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इस स्वात्मविस्मृतिरूप अज्ञान के विषय में आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा । यहाँ पर संक्षेप में इसके विकास एवं प्रसार की प्रक्रिया के साथ सम्बन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया जायेगा । ऊपर कहा गया है कि परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सतत उदीयमान होने के कारण प्रतिसमय पांच रूपों में स्पन्दनशील है जिनको चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहते हैं । इन्हीं को दूसरे शब्दों में क्रमशः सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व और व्यापकत्व भी कहते हैं । वह अनुत्तरतत्त्व इसी शक्तिपञ्चक के द्वारा प्रतिसमय विश्वरूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच विराट् कृत्यों को करता रहता है । विश्वरूप में प्रसृत अथवा अवभासित होना तो चैतन्य का स्वभाव ही है क्योंकि उसमें आनन्द की प्रधानता है । संसारभाव का अवभासन करने की ओर उन्मुख हो जाने पर वह चैतन्य-तत्त्व स्वतन्त्रता से अपनी अभेदव्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति को ग्रहण करता है । इसका अभिप्राय यह कि यद्यपि सारा विश्व उस अखण्ड स्वातन्त्र्यसागर में भेदरहित 'अहं' रूप में अवस्थित ही है तथापि उसमें इसको स्वरूप से भिन्न 'इदं' रूप में अवभासित करने की सूक्ष्म स्फुरणामयी अभिलाषा भी उस स्वरूप-स्वातन्त्र्य से ही उदित हो जाती है । इसप्रकार की अभिलाषा का उदित होना ही स्वरूप में अपूर्णता की प्राथमिक अनुभूति अर्थात् सब से पहला मल है क्योंकि जब सारी विश्वकल्पना स्वरूप में शाश्वत रूप में अवस्थित ही है तो उसको अपने से भेद में १. अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्रसमुल्लसितस्वरूपगोपनामात्रसतत्त्वम्.... (तं० वि० १.२३)

क्षेमराजकृत शिवसूत्रविमर्शिनी ५९ देखने की अभिलाषा का उदय होना अपूर्णता की अनुभूति नहीं तो और क्या हो सकती है ? यह अपूर्णता की अनुभूति आणव, मायीय और कार्म इन तीन रूपों में अभिव्यक्त होती है जिनको शैव शब्दों में मलत्रय कहते हैं। अनुग्रहमूर्ति भगवान् आशुतोष ने स्वयं ही श्रीमालिनीविजय-तन्त्र के दो सूत्रों में इन तीन मलों के स्वरूप का विश्लेषण किया है जो इस प्रकार है :— 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति१ संसाराङ्कुरकारणम् ॥१॥ 'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुःखादिलक्षणम्' ॥२॥ इसका अभिप्राय यह है कि अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान ही मूलभूत आणवमल है। यह आणवमल, संसार अर्थात् मायीयमल के, अङ्कुर अर्थात् कारणभूत कार्ममल का भी कारण है। भाव यह कि आणवमल से कार्ममल और कार्ममल से मायीयमल का विकास हो जाता है। आणवमल का रूप२ अज्ञान, कार्ममल का रूप हेय एवं उपादेय कर्मों का ३पचडा और मायीय मल का रूप शुभ अथवा अशुभ कर्मों की वासनाओं से जनित सुख दुःख, जन्म, मरण इत्यादि का ४भोग है। आणवमल के विषय में शास्त्रकारों का कथन है कि स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् संकोच दो रूपों में अभिव्यक्त होता है।— (१) ५बोध में स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् ६चिन्मय स्वरूप की पूर्णज्ञातृता का संकोच; (२) ७स्वातन्त्र्य का अबोध अर्थात् ८पूर्णकर्तृता को बोधरूपता से भिन्न समझने का मिथ्याभिमान । यहाँ पर यह नहीं समझना चाहिये कि ये दो अलग-अलग मल हैं, प्रत्युत दोनों रूपों में स्वातन्त्र्य की अख्याति होने के कारण वास्तव में एक ही मल के दो रूप हैं। प्रस्तुत सूत्र (निजाशुद्ध्या इत्यादि) में भी सूत्रकार ने इसी मलत्रय की ओर संकेत करते हुए कहा है कि पतिप्रमाता ने अपने स्वातन्त्र्य से, स्वयं ही, एक प्रकार की अशुद्धि (आणवमल) उत्पन्न की है जिसके द्वारा वह स्वयं शक्तिदरिद्र होकर, संसारी शुभाशुभ कर्मों १. 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति' इसमें 'इच्छन्ति' शब्द का अर्थ 'कहते हैं' हैं। २. मलम्ज्ञानमिच्छन्ति । (मा० वि०, १.२३) ३. धर्माधर्मात्मकं कर्म । (तत्रैव) ४. सुखदुःखादिलक्षणम् । (तत्रैव) ५. स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य । (ई० प्र०, ३.२.४) ६. बोधस्य चिन्मात्रस्य स्वातंत्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः एकः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४)—भास्करी ७. स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । (ई० प्र०, ३.२.४) ८. स्वातन्त्र्यस्य कर्तृत्वस्य अबोधता बोधव्यतिरिक्ताभिमानः द्वितीयः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४-भास्करी) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

६० स्पन्दकारिका (कार्ममल) के चक्कर में पड़ गया है और उन कर्मों से जनित जन्ममरणरूप संसृति के क्षोभ (मायीयमल) का विषय बन गया है। फलतः वह स्वयं ही संसरणशील पशु का रूप धारण कर गया है। माया—परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सर्वतोमुखी है। वह महान् एवं अचिन्त्य सामर्थ्यशालिनी है। अतः वह स्वेच्छा से अपने स्वरूप पर अख्याति (अपूर्णज्ञान) का आवरण भी डाल सकती है। अपने 'अहं'विमर्श में, अभेदरूप में अवस्थित विराट् विश्वकल्पना को, अपने से भिन्नरूप में अवभासित करके, इसकी सृष्टि, संहार इत्यादि की क्रीडा करना उसी का सामर्थ्य है। आखिर इतने विस्तृत एवं तुच्छ मानव की कल्पना से भी अतीत विश्व को हस्तामलक की तरह नचाने के लिए इससे अनन्तगुणा सामर्थ्यशालिनी शक्ति तो चाहिये ही। ऐसी परिस्थिति में जिस समय वह पारमेश्वरी स्वातन्त्र्यशक्ति निजी संकल्पात्मक स्फुरणा के द्वारा ही, इतने महान् विश्व को, अपने से भिन्नरूप में अवभासित करने के १दुर्घट कृत्य को करने की ओर उन्मुख होती है उस समय उसका नाम मायाशक्ति पड़ जाता है। संक्षिप्त शब्दों में यह कहा जा सकता है कि २अभेद में ही भेदसर्जना करने के स्वातन्त्र्य को ही मायाशक्ति कहते हैं, अतः वह भी परमेश्वर की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है। स्वयं ही आवरण बन कर, अपने ही पूर्णरूप को अपूर्ण बनाना और अपने भेदहीन स्वरूप में भेद का सूत्रपात करना ही इसका काम है। अनुत्तर शक्तिमान् भगवान् भूतनाथ ने स्वयं इस निजी अभिन्नशक्ति का स्वरूप-विश्लेषण करते हुए कहा है कि :— 'वह ३माया-शक्ति एक सर्वव्यापक, सूक्ष्म, खण्डों या भागों से हीन, समग्र संसार को अपने गर्भ में धारण करने वाली, अनादि, अनन्त, अकल्याणिनी होने पर भी स्वातन्त्र्य से परिपूर्ण और स्वयं किसी भी प्रकार के विकार से रहित है। माया के दो रूप हैं—(१) शक्तिरूपा और (२) तत्त्वरूपा। इनमें से पहली का नाम महामाया या मायाशक्ति और दूसरी का नाम केवल माया या मायातत्त्व है। ये भी संसार के शुद्धाध्व और अशुद्धाध्व नामक दो स्तरों पर 'अहंता' का तिरोधान करने के अनुपात से एक ही शक्ति के दो रूप हैं। इनमें जो अन्तर है वह इस प्रकार है :— महामाया या मायाशक्ति—४स्वातन्त्र्यशक्ति की वह अवस्था जिसमें अहन्तारूप में अवस्थित इदन्ता को भेदरूप में अवभासित करने की ओर केवल प्राथमिक संकल्पात्मक स्फुरणा १. परमं यत्स्वातन्त्र्यं दुर्घटसंपादनं महेशस्य । देवी मायाशक्तिः स्वात्मावरणं शिवस्यैतत् ॥ (प० सा०, १५) २. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी । भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथाहि स तया कृतः ॥ (तं०, ९.१४९-५०) ३. सा चैका व्यापिनीरूपा निष्कला जगतो निधिः । अनाद्यन्ता शिवेशानी व्ययहीना च कथ्यते ॥ (मा० वि०, १.२६) ४. आद्यो भेदावभासो यो विभागमनुपैयिवान् । गर्भीकृतानन्तभावोऽसावपरामर्श उच्यते ॥ (तं०, ९.१५१)

क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ६१ या उन्मुखतामात्र होती है और अभी इदन्ता का पृथक् रूप में विभाग नहीं हुआ होता है। संक्षेप में यह, आन्तरविमर्श में भेदावभास के उपक्रम के सूक्ष्म आसूत्रणमात्र की अवस्था है। यहीं से स्वातन्त्र्य में संकोचरूप १मलत्रय का भी श्रीगणेश होने लगता है। २मायाशक्ति के गर्भ में आगामी इदन्ता का पूर्णविभाग अर्थात् सारे स्थूल विश्व का भेदपूर्णवैचित्र्य उसीप्रकार अन्तर्निहित रूप में अवस्थित होता है जिस प्रकार शिम्बिका (सेम की फली) के गर्भ में असंख्य बीज अलग-अलग होकर भी बाहर से कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं। शास्त्रकारों ने मायाशक्ति की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है :- 'जो३ अपूर्णता की अनुभूति को जन्म देकर स्वरूप की हिंसा करती है।' मायाशक्ति का कार्यक्षेत्र, जैसा ऊपर कहा गया है, शुद्धाध्व अर्थात् शिवतत्त्व से लेकर शुद्धविद्या तत्त्व के प्रमातृमण्डल तक होता है क्योंकि यहाँ तक यद्यपि इदन्ता (भेदप्रथा- त्मक प्रमेयविश्व) के बहिरङ्ग अवभासन की प्रक्रिया विकासमान अवस्था होती है तथापि दूसरी ओर अहंता (प्रमातृभाव) का पूरा तिरोधान नहीं हुआ होता है। माया या मायातत्त्व-शुद्धविद्या से नीचे पृथवीतत्त्व तक के अशुद्धाध्व में मायाशक्ति का जो रूप कार्यनिरत होता है उसको 'मायातत्त्व' कहते हैं। इस स्तर पर अहन्ता का पूरा तिरोधान हो जाता है और आगामी जड एवं कार्यरूप प्रमेयविश्व की स्थूल अवभासन- प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। 'इदन्ता' 'अहन्ता' से बिल्कुल भिन्न होकर स्थूल देह, प्राण इत्यादि रूपों में विकसित हो जाती है। स्वरूप पर पूरा आवरण पड़ जाने के कारण शक्ति का रूप भी ५जड़ बन जाता है। वह स्वयं भी एक जडतत्त्व का ही रूप धारण करके आगे आगे जड़ कार्यवर्ग का ही कारण बन जाती है। यही कारण है कि इस अवस्था में उसको मायाशक्ति न कह कर मायातत्त्व कहा जाता है। जड़ बन जाने का ६अभिप्राय यह है कि मौलिकरूप में असीम स्वातन्त्र्यशालिनी शक्ति होकर भी, देश, काल एवं आकार की सीमाओं से संकुचित बन जाती है। शैवशब्दों में संकुचित प्रकाशमानता (अल्पज्ञातृता और अल्पकर्तृता) ही जड़ता होती है। संसारी ग्राहकवर्ग में मायातत्त्व के मधुमय विष का प्रसार अर्थात् मायाजनित क्षोभ, किन-किन रूपों में फैल जाता है इस विषय पर आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा। १. मायाशक्त्यैव तत्त्रयम्। (ई० प्र०, ३.२.५) २. ...............बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य शिम्बिकाफलवदस्यां गर्भीकारोऽस्ति। (तं० वि०, ९.१५१) ३. अपूर्णताप्रथनेन मीनाति हिनस्ति इति मायाशक्तिरुच्यते। (तं० वि०, ९. १५०) ४. ............तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः। (ई० प्र०, ३.१.७) ५. सा जडा भेदरूपत्वात् कार्यं चास्या जडं यतः। (ई० प्र०, ३.१.७) ६. अयमेव हि जडस्य स्वभावो यत् 'इदमत्र इदानीं भाति' इति परिच्छिन्नतया प्रकाश्यते इति। (तं० वि०, ९.१५३)

६२ स्पन्दकारिका १यहाँ पर केवल इस बात को समझाने की आवश्यकता है कि मायाशक्ति के द्वारा उत्पादित संकोच भी सर्वतोमुखी है। सर्वप्रथम यह संकोच पूर्वोक्त सर्वकर्तृत्व इत्यादि पांच स्वतन्त्र शक्तियों पर प्रभावान्वित होकर उनको क्रमशः किञ्चित्कर्तृत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, अपूर्णत्व, अनित्यत्व और अव्यापकत्व में परिणत कर देता है जिससे स्वतन्त्र शक्तिमान् पतिप्रमाता शक्तिदरिद्र पशु बन जाता है। इन पांच संकुचित शक्तियों के शास्त्रीय नाम क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति रखे गये हैं। इस अवस्था में ये स्वतन्त्र शक्तियां न रह कर पांच प्रकार के वासनात्मक बन्धन (पञ्चकंचुकपांच आवरण) बन जाती हैं और स्वतन्त्र आत्मा इन्हीं शृङ्खलाओं में फंसकर संसारी पशु बन जाता है। तत्त्वरूपा माया की शास्त्रीय परिभाषायें इस प्रकार हैं :- १. माया—२जिसको योगी लोग हेय समझ कर अपने से अलग कर देते हैं। २. माया—३जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित रहती है। ३. माया—४जो स्वयं 'मा' शब्द से वाच्य निषेध अर्थात् विनाश का विषय नहीं बनती है अर्थात् नित्य है। ४. माया—५जिसके गर्भ में सारा विश्व अवस्थित रहता है। ५. माया—६जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर स्वरूप में अभिन्न रूप में भी अवस्थित भावराशि को अपने से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित करता है। इन सारी परिभाषाओं के अतिरिक्त भगवान् ने स्वयं अपने सूत्र में इसको अशिवा अर्थात् चतुर्दिकू भेदप्रथा का अन्धकार उत्पन्न करके महान् अकल्याण करने वाली बताया है—'अशिवा भेदप्रथाप्रदा'। केवल अनुत्तरतत्त्व पर ही इसकी दाल नहीं गलती है। बाकी विश्व के अणु-अणु पर इसने अपना इन्द्रजाल बिछा दिया है। बार-बार सुलझाये जाने पर भी गोरखधन्धे की तरह फिर कर उलझ जाती हैं। ७यह एक भयंकर ओर विष उगलती हुई १. मायापरिग्रहवशाद् बोधो मलिनः पुमान् पशुर्भवति । कालकलानियतिवशाद् रागाविद्यावशेन संबद्धः ।। (प० सा०, १६) २. मीयते हेयतया परिच्छिद्यते योगिभिः । (तं० वि० ९.१५२) ३. सर्वत्र मातीति । (तत्रैव) ४. 'मा' शब्दवाच्याद्विनाशरूपान्निषेधाद् यातेति । (तत्रैव) ५. मात्यस्यां विश्वमिति । (तं० वि०, ९.१५२) ६. स्वात्माभिन्नमपि भावमण्डलं शिवो यया मिमीते भिदा व्यवस्थापयतीति ! (तत्रैव) ७. उन्मूलितापि शतशः खण्डितापि सहस्रशः । गोनासेवाप्रथयोदेति द्रागत्र शरणं शिवः ॥ (गोनासा कश्मीर में एक भयंकर सर्पिणी को कहते हैं । खण्ड खण्ड किये जाने पर भी यह उछलकर डंस लेती है।)

सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता

ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri नागिन है जो सौ-सौ खण्डों में काटी जाने पर भी उछल-उछल कर डस लेती है। जडमूर्त्ति होने के कारण स्वयं अन्धी है अतः चाहे साधु हो या असाधु, धनिक हो या निर्धन, पण्डित हो या मूर्ख, प्रत्येक को समान रूप से डसती है; किसी को छोड़ती नहीं। माया के ऐसे स्वभाव को दृष्टिपथ में रखकर भगवान् त्रिपुरारि ने एक और १सूत्र में माया के प्रपञ्च (अर्थात् त्रिविध मल, वासनात्मक कर्मों का जंजाल, स्वयं माया और इसका कार्यरूप जगत्) को, सहसा तिलाञ्जलि देकर, अपने वास्तविक स्वभाव की यथार्थ अनुभूति का आदेश दिया है ॥९॥ [ ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ] पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि प्रत्येक प्रकार का क्षोभ निलीन हो जाने पर मित- प्रमाता शिवभाव पर प्रतिष्ठित हो जाता है। स्पष्ट ही इस कथन का अभिप्राय यह है कि उस अवस्था में आत्मा में किसी भी प्रकार की स्फुरणा नहीं रहती है और फलतः वह तरंग- हीन सागर की भाँति शान्त अर्थात् निःस्पन्द हो जाता है। यदि ऐसी बात है तो उसका पूर्वोक्त स्पन्दात्मक स्वरूप हो कैसे सिद्ध हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का निवारण किया जा रहा है— तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥ यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञातृत्वकर्तृत्वभावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एव प्राप्तयोगात्मके काले यत् यद् ज्ञातुम् इच्छति तत् तत् जानाति च करोति च, नान्यदा संसार्थवस्थायाम् ॥१०॥ अनुवाद सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता और कर्तृतारूप धर्म, निरावृत रूप में प्रकट हो जाता है, जिससे यह सारी इच्छित बातों को स्वतन्त्रतापूर्वक जानता भी है और करता भी है ॥१०॥ वृत्ति :—यतः मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध ज्ञातृतारूप और कर्तृतारूप धर्म क्षोभ के निलीन हो जाने के उपरान्त तत्काल ही निरावृतरूप में प्रकट हो जाता है अतः वह उस आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बाद तत्क्षण ही जो जो बातें जानना चाहता है उनको (स्वतन्त्रता से) जानता है और करता है। इसके प्रतिकूल संसारी अवस्था में यह बात कदापि संभव नहीं है ॥१०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में शान्त ब्रह्मवाद वेदान्तियों का मुखमुद्रण सूत्रात्मक रूप में किया गया है। उनके विचारानुसार परब्रह्म का स्वरूप शान्त अर्थात् निःस्पन्द है। इसका अभिप्राय यह कि उनका परब्रह्म प्रकाशरूप हो या न हो परन्तु उसमें विमर्श का सर्वथा अभाव है। उनके १. मलः कर्म च माया च मायीयमखिलं जगत् । सर्वं हेयमिति प्रोक्तं विज्ञेयं वस्तु निश्चितम् ।। (मा० वि०, १.१६) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

६४ स्पन्दकारिका ही शब्दों में वह 'निस्तरंगमहोदधिकल्प (तरंगहीन महान् समुद्र के समान) है। इस कारण उसमें ज्ञान क्रियारूप चेतनता की वर्तमानता सम्भव नहीं हो सकती है। वह पूर्ण शान्त है और प्रत्येक प्रकार की झंझट से दूर है। फलतः 'विश्व है या नहीं—उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का कार्यक्रम नियमित रूप से चलता है या नहीं—यदि चलता है तो उसका ज्ञाता और कर्ता कौन है ?'—इत्यादि बातों की उसको न तो चिन्ता है और न चेतना ही। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि यद्यपि ये लोग एक ओर परब्रह्म को चेतन मानते हैं तथापि दूसरी ओर उसको शान्त-निस्तरंग-महोदधिकल्प बताकर उदासीन बना देते हैं। शैवशास्त्रियों को और विशेषकर स्पन्दशास्त्रियों को सब से उत्कृष्ट और सारे विश्व के नियामक अनुत्तर-तत्त्व की, इसप्रकार की शक्तिहीनता अथवा लूलापन मान्य नहीं है। स्वातन्त्र्यशक्तिघन चैतन्य का, ज्ञान और क्रिया पर अनन्यमुखापेक्षी अधिकार है; यह अधिकार तो उस सर्वकर्ता का अकाट्य स्वभाव ही है। ऐसी परिस्थिति में उस ज्ञानपारावार में कोई तरङ्ग न उठे यह कौन सा स्वभाव हो सकता है ? हाँ, पूर्णस्वतन्त्र होने के कारण वह तत्त्व युगपत् ही निस्तरङ्गवृत्ति और तरङ्गायमानरूप में भी प्रकाशमान है। १निस्तरङ्गवृत्तिता से शैवदर्शन में शक्तिहीनता का अभिप्राय नहीं अपितु इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों की सूक्ष्म सामरस्य अवस्था अर्थात् अभेद चिद्रूपता का अभिप्राय है। वास्तव में चैतन्य वही है जो प्रसरणशील है—रूपप्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभासमान है। विश्व भी मिथ्या या गर्हित नहीं क्योंकि ऊपर से नीचे तक सारा शिवरूप होने के कारण इसके २गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ से उठ सकता है। हाँ, केवल विश्व को शिवरूपता अर्थात् आत्मभूत चैतन्य से भेदरूप में देखना ही गर्हित है और वह एक प्रकार की भ्रान्ति ही है। ३नित्यस्फुरणशील परतत्त्व को अपनी स्वभावभूत शक्तियों से विछोह किसी भी अवस्था में नहीं होता अतः ज्ञातृता और कर्तृता उसका सहज अर्थात् अकृत्रिम और यथार्थ स्वभाव है। शान्त होने का अभिप्राय केवल यही हो सकता है कि वह परतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्व की सारी अवस्थाओं और वैचित्र्यों को स्वेच्छापूर्वक सत्ता प्रदान करने पर, असीम सामर्थ्यशाली होने के नाते, स्वयं कभी भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अथवा क्षणभङ्गुर शरीरादि के ममत्व और अभिमानरूप क्षोभों से अभिभूत नहीं हो सकता है। फलतः शान्त ब्रह्मवादियों ने परब्रह्म को शान्त कहकर उसकी उस शान्ति का जैसा ४संवेदनरहित रूप प्रस्तुत किया है उसको शैव- दार्शनिक जड़ता के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते हैं। इस विषय के साथ सम्बन्धित शैव दृष्टिकोण को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए पाठकों का ध्यान कुछ निम्नलिखित बातों की ओर आकर्षित किया जाता है। वैसे तो प्रथम १. सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते । चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ (शिवदृष्टि, १.४) २. रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ (शिवदृष्टि, १.४) ३. एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥ (तत्रैव) ४. संवित्तिशून्यमात्मनश्चिद्रूपं न कदाचिदप्यस्तीत्यर्थः (शिवदृष्टि, १.४)

ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६५ सूत्र के विवरण में इन बातों की ओर थोड़ा बहुत संकेत किया गया है परन्तु यहाँ पर जरा विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक प्रतीत होता है । १शैवमतानुसार हृदय अर्थात् अहंप्रत्यवमर्शात्मक बोधपारावार में शाश्वत रूप में, विमर्शात्मक स्पन्द की ऊर्मियाँ उठती रहती हैं क्योंकि ज्ञान चैतन्य होने के नाते कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता है । यह विमर्शरूप स्पन्द ही है जो विश्व का द्रावण अर्थात् विश्व का बाह्य इदंरूप में अवभासन अथवा प्रसारण और प्रसारित भावमण्डल को पुनः आन्तर अहं- रूपता में विलयन करने की संकल्पात्मक क्रियाशीलता पर निरत है । पहले भी कहा गया है कि स्पन्द के प्रसार की दिशा युगपत् बहिर्मुखीन और अन्तर्मुखीन भी है । बहिर्मुख प्रसार अर्थात् विश्वात्मकता को स्वीकारने की ओर उन्मुखता को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वात्मविकास' और अन्तर्मुखप्रसार अर्थात् प्रसृत विश्वात्मकता को पुनः समेटने की ओर उन्मुखता को 'स्वात्मसंकोच' कहते हैं । साथ ही इस द्विमुखी क्रियाशीलता को इकट्ठेरूप में, 'स्वरूप का उच्छलन' या २'किञ्चिच्चलन' कहा जाता है । यह किञ्चिच्चलनात्मक स्फुरणा विश्व के स्थूलरूप में विक- सित होने के 'आदि' अर्थात् निर्माण काल और 'अन्त' अर्थात् विश्व को समेटने के समय पर सामान्यरूप में चलती रहती है अतः इस रूप में इसको३ सामान्यस्पन्द कहते हैं । इसका भाव यह है कि इस अवस्था में प्रवाहमान स्पन्दशक्ति में किसी भी प्रकार की घट पट आदि विशेष विकल्पात्मकता का विभाग नहीं होता है । विश्व के स्थितिकाल में निःसंशय स्पन्द अपनी सामान्यरूपता को छोड़कर देह, प्राण, नील, सुख इत्यादि विशेष विकल्पात्मक रूपों में प्रवहमान होकर विश्ववैचित्र्य का अवभासन कर लेता है और यह विशेषरूपता भी उच्छलन या किञ्चिच्चलन ही है । इस प्रकार की यह स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही तो चैतन्य का शाश्वत स्वभाव है अतः पतिप्रमातृभाव अथवा संविद्रूपता इसके बिना रह नहीं सकती है । आखिर स्वभाव तो स्वभाव ही है, वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता है । फलतः शैवसिद्धान्त के अनुसार अनुत्तरतत्त्व सर्वज्ञ और सर्वकर्ता होने के नाते कभी भी दूर अलग-थलग पड़ा हुआ तमाशाई बन कर नहीं रहता है । वह स्वयं स्वतन्त्र होकर सब कुछ जानता भी है और करता भी है, अतः वह उदासीन या निश्चेष्ट नहीं है । ४विश्वात्मक शाक्तप्रसर की भूमिका पर चलने वाले सारे कार्यकलाप की साधन-संपत्ति अर्थात् निश्चित कार्यों के निश्चित कारणसमूह का संयोजन अथवा वियोजन करने में शिव को १. हृदये स्वविमर्शाऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः । (तं०, ९.१०२-३) २. किञ्चिञ्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥ (तं०, ९.१८४) ३. द्रष्टव्य, सूत्र १५ का विवरण । ४. तथा च तेषां हेतूनां संयोनवियोजने । नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ! (तं०, ९.३५-६) ५

६६ स्पन्दकारिका ही एक मात्र स्वतन्त्र कर्ता के रूप में अवश्य मानना पड़ता है क्योंकि उसका रूप संविदात्मक है और विश्वात्मक ज्ञातृता और कर्तृता की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का यथार्थ अकृत्रिम स्वभाव है। यही कारण है कि मितप्रमातृभाव की भूमिका पर भी संसार के सारे अणु, दैनिक आदान-प्रदान के समयों पर, अपनी अपनी आवश्यकतानुसार, निश्चित कार्यों का उत्पादन करने के लिए जिन निश्चित कारण समूहों का संयोजन अथवा वियोजन करते रहते हैं उनके मूल में भी स्पन्दात्मक संवित् ही क्रियाशील है। संवित् तो संवित् ही है; न कहीं कम न कहीं अधिक। अतः पतिप्रमातृभाव अथवा पशुप्रमातृभाव की भूमिकाओं पर उसकी ज्ञातृकर्तृ रूप क्रियाशीलता में कोई अन्तर नहीं है। हाँ केवल इतनी बात है कि पशुरूप में वह आवश्य- कता के अनुसार स्वयं ही जड़ शरीर इत्यादि के प्रति ममत्व अभिमान के क्षोभ का चोला पहन कर निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधियों में क्रियाशील है जबकि पतिरूप में उसकी क्रियाशीलता पर कोई अंकुश नहीं है। वास्तव में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो संसार के अणुवर्ग में पाया जाने वाला १देहादि के प्रति ममत्व, अथवा संसार के कर्तव्यों के प्रति कर्तृत्व का झूठा अभिमान् भी तो विश्वशरीरी भगवान् की ही स्फुरणा है। अतः वह जड़ या उदासीन नहीं है। संसार के पशु, अपने वास्तविक संविदात्मक स्वरूप को भूलकर, कभी भी तृप्त न होने वाली वासनाओं की मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए, 'इस कर्म से मेरी इष्टापत्ति है और उससे अनिष्टापत्ति होगी' ऐसे संकोचों में पड़कर, उपादेयता और हेयता के क्षोभ अर्थात् अन्तर्द्वन्द्व में, भावनाओं से जनित संघर्ष का शिकार बन जाते हैं। यदि भगवदनुग्रह और सद्गुरुओं के कृपाकटाक्ष से पशुहृदय में एक बार ही यह अनुभूति जागृत हो जाये कि— 'वास्तव में मैं देहादि का सत्ताभूत संवित् स्वरूप ही हूँ और सारा विश्व मेरा ही विभव है, अतः मैं जानने और करने में सर्वदा स्वतन्त्र हूँ' तो उसके सारे पाश स्वयं ही खुल जाते हैं; वह पशुप्रमातृभाव से ऊपर उठकर अकृत्रिम ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का अधिकारी बन जाता है। इसी को शास्त्रों में 'आत्मबल का स्पर्श' कहते हैं ॥१०॥ [ संसारभाव की शान्ति ] सूत्रकार ने यहाँ तक के सूत्रों में दृढ़ उपपत्तियों के द्वारा स्पन्दतत्त्व का प्रतिपादन किया। अब अगले सूत्र में यह समझाया जा रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास की दृढ़ता प्राप्त होने से, योगी को, अपने में ही उस स्पन्दशक्ति की अनुभूति हो जाती है। अनन्तर उसी भाव पर स्थिरता प्राप्त करने से उसको जघन्य एवं घृणित पशुयोनियों में भटकते रहने से छुटकारा मिल सकता है— तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ? ॥११॥ १. तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रहः । कर्तेति पुंसः कर्तृत्वमभिमानोऽपि विभोः कृतिः ॥ (तं०, ९.१७५)

सूत्र-जो कोई साधक स्वभाव अर्थात् स्पन्दात्मक आत्मरूप का ही, विश्व के कण-

संसारभाव की शान्ति ६७ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः, तस्मात् तम् अधिष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन्, विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता सृतिः सरणं न भवति ॥११॥ अनुवाद सूत्र-जो कोई साधक स्वभाव अर्थात् स्पन्दात्मक आत्मरूप का ही, विश्व के कण- कण में अनुस्यूत रहने वाली मुख्य सत्ता के रूप में साक्षात्कार करता हुआ, विस्मय की जैसी मुद्रा में अवस्थित रहता है, वह इस तिरस्कार से पूर्ण और कुत्सित आवागमन के चक्कर में कैसे पड़ सकता है ? ॥११॥ वृत्ति-तो इस पूर्वोक्त प्रकार से जब यह बात सिद्ध है कि आत्मस्वभाव अर्थात् सामान्य स्पन्दतत्त्व विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अनुस्यूत और प्रत्येक प्रकार के सामर्थ्य से युक्त है, तब जो कोई भी योगी उसी स्वभाव को अधिष्ठाता के रूप में अर्थात् सर्वव्यापक रूप में अनुभव करता हुआ विस्मय की जैसी अवस्था में अवस्थित रहता है उसको कुत्सा अर्थात् जघन्यता से पूर्ण सृति अर्थात् आवागमन का झंझट नहीं होता है ॥११॥ विवरण 'तुर्यदशा' अथवा दूसरे शब्दों में 'शाक्तभूमिका' पर आरूढ़ होने का इच्छुक योगी संसार का सारा कार्य-कलाप करते-करते ही, संसार के तुच्छातिच्छ पदार्थों में भी स्वभाव- भूत स्पन्दरूपता के प्रसार एवं विकास को अनुभव करने का निरन्तर अभ्यास करता रहता है। धीरे-धीरे अभ्यास की परिपक्वता, शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन, परमेश्वरीय अनुग्रह और सद्गुरुओं के कृपा-कटाक्ष से उसकी भावनायें तुच्छ शरीर इत्यादि पर आत्माभिमान रखने की संकुचित परिधियों से निकलकर विश्वात्मभाव अथवा पूर्ण 'अहं विमर्श' पर आरूढ़ हो जाती हैं, ऐसी अवस्था में उसकी चित्-रूपता पर विद्यमान मायीय घन आवरण स्वयं ही हट जाता है, चतुर्दिक चित्प्रकाश के किरणजाल का स्वर्णिम एवं शाश्वत आलोक मुखरित हो उठता है और उसकी आत्मा शरीर में रहते हुए भी 'तुर्या-अवस्था' का साक्षात्कार कर लेती है। उसके लिए चिरन्तन सत्य के रुद्ध किवाड़ अकस्मात् खुल जाते हैं और वह भैरव भूमिका पर आरूढ़ होने का अधिकारी बन जाता है। १भाव यह कि ऐसा साधक निरन्तर अभ्यास करने से, चारों ओर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के विकास का अनुभव करता हुआ, तुरीया- दशारूप स्वच्छन्द भूमिका के क्षेत्र में प्रवेश पा सकता है। प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक स्थान पर अपनी ही चित्रूपता की अधिष्ठातृता अर्थात् वास्तविक अथवा मौलिक व्यापकता का यथार्थ अनुभव करने से, उसको, विश्व की सारी भङ्गियाँ, २किसी जलाशय की उठने वाली तरङ्गों, अग्नि की ऊपर की ओर उठने वाली लपटों अथवा सौरमण्डल से निकलने वाले १. योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ।। (स्व० तं०, ७.२५७-८) २. जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभाङ्गयो यथा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्गयो विनिर्गताः ।। (वि० भै०, ११०) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

६८ स्पन्दकारिका आलोक पुञ्ज की तरह स्वरूप के ही बहिर्मुख विकास के रूप में प्रतीत होती हैं। इस प्रकार की यौगिक अनुभूति के स्तर को शास्त्रीय शब्दों में तुरीया दशा या शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने की भूमिका कहा जाता है। इसी शाक्तभूमिका का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर साधक में, ज्यों ज्यों इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है त्यों त्यों उसको कई ऐसी १लोकोत्तर यौगिक भूमिकायें स्वतः अनुभव में आ जाती हैं जो अन्तिम तुर्यातीत दशा पर शीघ्र ही आरूढ होने की पूर्वसूचना की प्रतीक होती हैं। वास्तव में शैवगुरुओं का कथन है कि तुरीया-भूमिका पर शाश्वत स्थिरता प्राप्त करना ही तुरीयातीत-भूमिका (पूर्ण शिवभाव) पर आरूढ होना होता है। इन यौगिक भूमिकाओं को ही परमकारुणिक भगवान् चन्द्रमौलि ने 'विस्मय' का नाम दे दिया है जिसका उल्लेख प्रस्तुत सूत्र में 'स्मयमानः' शब्द से किया गया है। शैवदर्शन में २'विस्मय' शब्द का अर्थ आश्चर्य की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य अनुभूति है। योगी को शाक्त- भूमिका का साक्षात्कार होते ही, उसके प्रति एक प्रकार की अतृप्ति जैसी उत्पन्न हो जाती है। फलतः वह बार बार अन्तर्मुख होकर उस आनन्दसागर में डुबकियां लगाने लगता है। ऐसे समयों पर उसके अन्तस् में एक विशेष प्रकार की आश्चर्यमानता की जैसी दशा उदित हो जाती है जो उसको बार बार अन्तर्मुख हो जाने की ओर आकर्षित कर लेती है। शैव मान्यता के अनुसार यह विस्मयात्मक योगभूमिका साक्षात् तुरीयारूप और नित्य नव-नव-चमत्कारमयी होने के कारण सबसे उत्कृष्ट और केवल स्वानुभवगम्य है, जबकि अणिमा इत्यादि दूसरे प्रकार की यौगिक भूमिकायें, इसकी अपेक्षा निम्नस्तर की और परसंवेद्य भी हैं। ३दैनिक आदान-प्रदानों में जब कोई मनुष्य किसी विशेष अतिशय से युक्त वस्तु का साक्षात्कार कर लेता है तो उसके मन में एक प्रकार की विचित्र एवं स्तम्भकारिणी वृत्ति का उदय हो जाता है। उस समय वह उस वस्तु के, अन्य वस्तुओं से विशिष्ट, आकार-प्रकार को कौतूहलपूर्ण नेत्रों से देखता हुआ भी वाणी के द्वारा कुछ अभिव्यक्त नहीं कर सकता है। उस समय उसको अन्तः-चेतना, उसी वस्तु के अनन्य एवं अद्भुत सौन्दर्य का आन्तरिक रूप में ही आनन्द लेती हुई एक ऐसी अकथनीय अवस्था में डूब जाती है जिसको 'विस्मय' १. ता एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य सम्बन्धिन्यो भूमिकाः। तदध्यारोहविश्रान्तिसूचिकाः परिमिता भूमयः। (शि० सू० वि०, १.१२) २. विस्मयो योगभूमिकाः। (शि० सू०, १.१२) ३. यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत्। तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने ॥ निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितैन्द्रिये । परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं हि विस्मयः ॥ (शि० सू० वा० (वरद), पृ० २.६३)

'या' 'आश्चर्यमानता' कहते हैं। ठीक इसी प्रकार स्वात्मनिष्ठ साधक को भी बार-बार शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इस वेद्यपञ्चक के, सामान्य-स्पन्दमयी अहन्ता में विश्रान्त हो जाने के अवसरों पर, अनिर्वाच्य अतिशयता से युक्त और नव-नव-चमत्कार (चैतन्य रस का अलौकिक आस्वाद) से पूर्ण स्वरूप-समावेश का उदय हो जाता है। उस समय उसके अन्तस् में, स्वरूपभूत करणेश्वरीचक्र के विकसित वैभव की अनुभूति प्राप्त कर लेने से कोई ऐसी आन्तरिक दशा उदित हो जाती है कि वह बार बार उस स्वरूपसमावेशमय आनन्द का, अतृप्तरूप में, अनुभव करता हुआ १आश्चर्यमानता से सराबोर हो जाता है। इस आश्चर्यमानता के प्रारम्भिक रूप को शास्त्रीय शब्दों में 'साश्चर्यस्पन्दरूपता' कहते हैं। इस दशा के उदित हो जाने के अनन्तर ही ऐसा साधक विकल्पहीन तुर्यातीत दशा पर प्रतिष्ठित होने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। इस दशा का उदित होना ही इस बात का सूचक होता है कि ऐसे योगीश्वर की आत्मा, पञ्चकञ्चुक की सीमाओं को लांघ कर, भेदरहित विश्वात्मभाव के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगी है और वह अपने ही चिन्मात्ररूप को सर्वत्र उपलब्धा या अधिष्ठाता के रूप में अनुभव करने लगी है। ऐसी मुक्तात्मा के लिए कभी भी आवागमन के बन्धन में फँस जाने का प्रश्न ही नहीं उठता है क्योंकि एक बार पिंजरे का द्वार खुल गया, उन्मुक्त होने के लिए युग युगों में तड़पता हुआ, विहङ्गम उड़ कर शून्य में खो गया, अब वह आकर फिर उसी पिंजरे का बन्दी बन जायेगा, ऐसी कल्पना करना व्यर्थ है। ऊपर कहा गया है कि तुर्यावस्था पर पहुँचा हुआ योगी बार बार उस आनन्द का अनुभव करने के लिये अन्तर्मुख हो जाता है। इस बार बार अन्तर्मुख हो जाने की अवस्था को शैव शब्दों में 'क्रममुद्रा' कहते हैं। साथ ही इस अवस्था को द्योतित करने वाले 'भैरवं- मुद्रा, स्वरूप-समावेश, शाम्भव-समावेश' इत्यादि अन्य कतिपय शास्त्रीय शब्द भी हैं। क्रममुद्रा नित्योदित-समाधि को कहते हैं। इस अवस्था में साधक अन्तर्मुख अवस्था के अति- रिक्त बहिर्मुख अवस्था में भी चित्-रूपता में २समाविष्ट ही रहता है। इसका अभिप्राय यह कि क्रममुद्रा समाधि की ऐसी परिपक्व अवस्था होती है कि साधक स्वरूप-समावेश के बल से, सहज ही में, ३बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में विद्युद्- गति से प्रवेश कर सकता है। ऐसा करने में उसको कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है क्योंकि निरन्तर अभ्यास के द्वारा यह उसका स्वभाव ही बना होता है। अपरिपक्व समाधि दशा में समाधिकाल तक ही स्वरूप की अनुभूति रहती है परन्तु इसमें ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता है। यही कारण है कि सिद्ध पुरुषों ने ऐसी समाधि को 'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नाम दिया है। गुरुओं का कथन है कि इस अवस्था पर पहुँचा हुआ साधक व्युत्थानदशा १. द्रष्टव्य, शि० सू० वि०, १.१२ २. क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । (प्र० हृ० सू०, १९) ३. तत्रादौ बाह्याद् अन्तःप्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत इति सबाह्याभ्यन्तरसमावेश मुद्राक्रमः। (तत्रैव)

७० स्पन्दकारिका में भी अर्थात् संसार के सारे कार्यकलापों को करता हुआ भी उन्हीं समाधिकालीन संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्यपदार्थ में मात्र चिन्मयता के ही आभास को प्राप्त करने के कारण, दोनों अवस्थाओं में १स्वरूपनिष्ठ ही होता है। उसको सारा भाववर्ग शरत्काल के मेघखण्ड की तरह चिदाकाश में ही लीन होता हुआ प्रतीत होता है। फलतः ऐसा योगी अभी अन्तर्मुख और अभी बहिर्मुख होता है। इस द्विमुखी समाधिक्रम को शास्त्रकारों ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है— “२शाक्तभूमिका पर पहुँचा हुआ योगी 'निमीलनसमाधि' के द्वारा, बाहर के इदन्तरूप भाववर्ग को सामान्यस्पन्द में ही विश्रान्त करता हुआ पराचित्-भूमिका में प्रवेश करता है। वहाँ स्वरूपसाक्षात्कार करके 'उन्मीलनसमाधि' के द्वारा अहन्ता में विश्रान्त किये हुए भाववर्ग को बाहिर की ओर वमन करता हुआ फिर भी इदन्ता के क्षेत्र में प्रवेश करता है। इस 'अन्तःप्रवेश' और 'बहिः-निर्गमन' की प्रक्रिया में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखने के योग्य है कि ऐसे पद पर पहुँचे हुए योगी को दोनों ही अवस्थाओं में स्वरूपभूत सामान्यस्पन्दात्मकता का ही विकास अनुभव में आता है।” ३'क्रममुद्रा' शब्द के दो खण्ड हैं—'क्रम' और 'मुद्रा'। इनमें से 'क्रम' शब्द से संवित् रूप में ही सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम का और 'मुद्रा' शब्द से मुद्रित करने का अर्थात् स्वरूप में ही विश्रान्त करने का अभिप्राय लिया जाता है। फलतः 'क्रममुद्रा' स्वतः तुरीयारूपा होने के कारण, प्रत्येक प्रकार के क्रम को, ग्रास करने के क्रम से स्वरूप में ही विश्रान्त कर लेती है। इसके अतिरिक्त 'क्रममुद्रा' शब्द से यह अभिप्राय भी लिया जाता है कि यह एक नित्य-उदित समाधि की दशा होने के कारण अन्तःरूप में या बाह्यरूप में समानरूप से आनन्द का वितरण करती है, अख्याति के द्वारा उत्पादित पाशों को काट लेती है और सारे बाह्य-अवभास को आभ्यन्तर तुरीयासत्ता में मुद्रित कर लेती है। प्रस्तुत सूत्र में इसी योग-भूमिका को 'स्मयमानः' शब्द के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है ॥१९॥ [ अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ] शैव दर्शन के अनुसार सामान्य-स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका पूर्णज्ञातृत्व और पूर्णकर्तृत्वरूप चैतन्य की भूमिका है। इसके प्रतिकूल अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों और लगभग उनके ही समकक्ष सिद्धान्त का अनुसरण करने वाले शून्यवादी माध्यमिकों की मान्यता के अनुसार स्व- १. आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं घूर्ण- मानो भावराशिं शरदभ्रलवम् इव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखतामेव समवल- म्बमानो निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरेऽपि समाध्येकरस एव भवति । (प्र० हृ० सू०, १९) २. द्रष्टव्य, प्रत्यभिज्ञाहृदय सूत्र १९ की टीका । ३. अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहारादिसंविच्चक्रविकासरूपं क्रमं मुद्रयति, स्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः...................................। (प्र० हृ० सू०, १९)

सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू-

अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यवाद की निःसारता ७१ रूपसाक्षात्कार की दशा सर्वभाव या सर्वशून्यता की ही दशा है क्योंकि इस दशा पर पहुँची हुई आत्मा अभाव में ही लीन हो जाती है। अगले सूत्र में ऐसे मतवादियों का मुखमुद्रण किया जा रहा है :- नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदिति निश्चयः ॥१२॥ न तु अभावो भावनीयो, यथा अन्यैर्योगिभिः उपदिश्यते, ‘अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्, इति। न चैतत् युक्तम्, यस्मात् नाभावे भावना युज्यते मूढावस्थैव सा यस्मात् उत्तरकालम् अभियोगसंस्पर्शात् अभिलापसंयोगात्-‘सा शून्यावस्था अतीता मम’ इति स्मर्यते, न च आत्मस्वभाव एषः, यस्मात् न त्वेवं चिद्रूपत्वं मूढावस्थावत् स्मर्यते, तस्य सर्वकालमनुभवितृत्वेनाननुभवो नित्योदितत्वात् ॥१२॥ अनुवाद सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू- ढ़ता (जड़ता का अभाव) भी नहीं है (अर्थात् अभाव-भावना की अवस्था जड़ता की ही अवस्था है)। इसका कारण यह कि (अभाव समाधि से उठने के अनन्तर योगी को) अभिलाप अर्थात् भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाने पर—'वह मेरी शून्य अवस्था थी' ऐसा निश्चय हो जाता है ॥१२॥ वृत्ति—जैसा कि दूसरे योगी उपदेश देते हैं— 'तब तक अभाव की भावना करते रहना चाहिये जब तक आत्मा अभाव में ही लीन हो जाए'—युक्तिसङ्गत नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। वास्तव में यह विचार युक्तियुक्त भी नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो निश्चय से जड़ता की ही अवस्था है अतः उसका, भावना का विषय होने का मन्तव्य प्रस्तुत करना असङ्गत है। वह अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि-काल के अनन्तर जब ऐसे योगी को अभियोग अर्थात् भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाता है तब वह उस समाधि की अवस्था को 'वह मेरी शून्य अवस्था थी' इसप्रकार स्मर्यमाणरूप में अनुभव करता है। आत्मा का स्वभाव ऐसा नहीं है क्योंकि चित्-स्वरूपता (सतत उदीयमान होने के कारण) मूढ़ता की अवस्था की तरह स्मरण नहीं की जाती है। वह तो शाश्वत-उदीयमान-सत्ता है अतः उसका अनुभव प्रतिसमय (वर्तमानकालिक) अनुभवविता (स्वतन्त्र ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य प्रमाता) के रूप में होता है ॥१२॥ विवरण अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों से प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा का और शून्य- वादियों से बौद्ध दार्शनिकों की माध्यमिक शाखा के अनुयायियों का अभिप्राय है। विषय को