भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 190 में से

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६० स्पन्दकारिका (कार्ममल) के चक्कर में पड़ गया है और उन कर्मों से जनित जन्ममरणरूप संसृति के क्षोभ (मायीयमल) का विषय बन गया है। फलतः वह स्वयं ही संसरणशील पशु का रूप धारण कर गया है। माया—परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सर्वतोमुखी है। वह महान् एवं अचिन्त्य सामर्थ्यशालिनी है। अतः वह स्वेच्छा से अपने स्वरूप पर अख्याति (अपूर्णज्ञान) का आवरण भी डाल सकती है। अपने 'अहं'विमर्श में, अभेदरूप में अवस्थित विराट् विश्वकल्पना को, अपने से भिन्नरूप में अवभासित करके, इसकी सृष्टि, संहार इत्यादि की क्रीडा करना उसी का सामर्थ्य है। आखिर इतने विस्तृत एवं तुच्छ मानव की कल्पना से भी अतीत विश्व को हस्तामलक की तरह नचाने के लिए इससे अनन्तगुणा सामर्थ्यशालिनी शक्ति तो चाहिये ही। ऐसी परिस्थिति में जिस समय वह पारमेश्वरी स्वातन्त्र्यशक्ति निजी संकल्पात्मक स्फुरणा के द्वारा ही, इतने महान् विश्व को, अपने से भिन्नरूप में अवभासित करने के १दुर्घट कृत्य को करने की ओर उन्मुख होती है उस समय उसका नाम मायाशक्ति पड़ जाता है। संक्षिप्त शब्दों में यह कहा जा सकता है कि २अभेद में ही भेदसर्जना करने के स्वातन्त्र्य को ही मायाशक्ति कहते हैं, अतः वह भी परमेश्वर की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है। स्वयं ही आवरण बन कर, अपने ही पूर्णरूप को अपूर्ण बनाना और अपने भेदहीन स्वरूप में भेद का सूत्रपात करना ही इसका काम है। अनुत्तर शक्तिमान् भगवान् भूतनाथ ने स्वयं इस निजी अभिन्नशक्ति का स्वरूप-विश्लेषण करते हुए कहा है कि :— 'वह ३माया-शक्ति एक सर्वव्यापक, सूक्ष्म, खण्डों या भागों से हीन, समग्र संसार को अपने गर्भ में धारण करने वाली, अनादि, अनन्त, अकल्याणिनी होने पर भी स्वातन्त्र्य से परिपूर्ण और स्वयं किसी भी प्रकार के विकार से रहित है। माया के दो रूप हैं—(१) शक्तिरूपा और (२) तत्त्वरूपा। इनमें से पहली का नाम महामाया या मायाशक्ति और दूसरी का नाम केवल माया या मायातत्त्व है। ये भी संसार के शुद्धाध्व और अशुद्धाध्व नामक दो स्तरों पर 'अहंता' का तिरोधान करने के अनुपात से एक ही शक्ति के दो रूप हैं। इनमें जो अन्तर है वह इस प्रकार है :— महामाया या मायाशक्ति—४स्वातन्त्र्यशक्ति की वह अवस्था जिसमें अहन्तारूप में अवस्थित इदन्ता को भेदरूप में अवभासित करने की ओर केवल प्राथमिक संकल्पात्मक स्फुरणा १. परमं यत्स्वातन्त्र्यं दुर्घटसंपादनं महेशस्य । देवी मायाशक्तिः स्वात्मावरणं शिवस्यैतत् ॥ (प० सा०, १५) २. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी । भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथाहि स तया कृतः ॥ (तं०, ९.१४९-५०) ३. सा चैका व्यापिनीरूपा निष्कला जगतो निधिः । अनाद्यन्ता शिवेशानी व्ययहीना च कथ्यते ॥ (मा० वि०, १.२६) ४. आद्यो भेदावभासो यो विभागमनुपैयिवान् । गर्भीकृतानन्तभावोऽसावपरामर्श उच्यते ॥ (तं०, ९.१५१)