भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ६१ या उन्मुखतामात्र होती है और अभी इदन्ता का पृथक् रूप में विभाग नहीं हुआ होता है। संक्षेप में यह, आन्तरविमर्श में भेदावभास के उपक्रम के सूक्ष्म आसूत्रणमात्र की अवस्था है। यहीं से स्वातन्त्र्य में संकोचरूप १मलत्रय का भी श्रीगणेश होने लगता है। २मायाशक्ति के गर्भ में आगामी इदन्ता का पूर्णविभाग अर्थात् सारे स्थूल विश्व का भेदपूर्णवैचित्र्य उसीप्रकार अन्तर्निहित रूप में अवस्थित होता है जिस प्रकार शिम्बिका (सेम की फली) के गर्भ में असंख्य बीज अलग-अलग होकर भी बाहर से कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं। शास्त्रकारों ने मायाशक्ति की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है :- 'जो३ अपूर्णता की अनुभूति को जन्म देकर स्वरूप की हिंसा करती है।' मायाशक्ति का कार्यक्षेत्र, जैसा ऊपर कहा गया है, शुद्धाध्व अर्थात् शिवतत्त्व से लेकर शुद्धविद्या तत्त्व के प्रमातृमण्डल तक होता है क्योंकि यहाँ तक यद्यपि इदन्ता (भेदप्रथा- त्मक प्रमेयविश्व) के बहिरङ्ग अवभासन की प्रक्रिया विकासमान अवस्था होती है तथापि दूसरी ओर अहंता (प्रमातृभाव) का पूरा तिरोधान नहीं हुआ होता है। माया या मायातत्त्व-शुद्धविद्या से नीचे पृथवीतत्त्व तक के अशुद्धाध्व में मायाशक्ति का जो रूप कार्यनिरत होता है उसको 'मायातत्त्व' कहते हैं। इस स्तर पर अहन्ता का पूरा तिरोधान हो जाता है और आगामी जड एवं कार्यरूप प्रमेयविश्व की स्थूल अवभासन- प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। 'इदन्ता' 'अहन्ता' से बिल्कुल भिन्न होकर स्थूल देह, प्राण इत्यादि रूपों में विकसित हो जाती है। स्वरूप पर पूरा आवरण पड़ जाने के कारण शक्ति का रूप भी ५जड़ बन जाता है। वह स्वयं भी एक जडतत्त्व का ही रूप धारण करके आगे आगे जड़ कार्यवर्ग का ही कारण बन जाती है। यही कारण है कि इस अवस्था में उसको मायाशक्ति न कह कर मायातत्त्व कहा जाता है। जड़ बन जाने का ६अभिप्राय यह है कि मौलिकरूप में असीम स्वातन्त्र्यशालिनी शक्ति होकर भी, देश, काल एवं आकार की सीमाओं से संकुचित बन जाती है। शैवशब्दों में संकुचित प्रकाशमानता (अल्पज्ञातृता और अल्पकर्तृता) ही जड़ता होती है। संसारी ग्राहकवर्ग में मायातत्त्व के मधुमय विष का प्रसार अर्थात् मायाजनित क्षोभ, किन-किन रूपों में फैल जाता है इस विषय पर आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा। १. मायाशक्त्यैव तत्त्रयम्। (ई० प्र०, ३.२.५) २. ...............बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य शिम्बिकाफलवदस्यां गर्भीकारोऽस्ति। (तं० वि०, ९.१५१) ३. अपूर्णताप्रथनेन मीनाति हिनस्ति इति मायाशक्तिरुच्यते। (तं० वि०, ९. १५०) ४. ............तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः। (ई० प्र०, ३.१.७) ५. सा जडा भेदरूपत्वात् कार्यं चास्या जडं यतः। (ई० प्र०, ३.१.७) ६. अयमेव हि जडस्य स्वभावो यत् 'इदमत्र इदानीं भाति' इति परिच्छिन्नतया प्रकाश्यते इति। (तं० वि०, ९.१५३)