भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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६२ स्पन्दकारिका १यहाँ पर केवल इस बात को समझाने की आवश्यकता है कि मायाशक्ति के द्वारा उत्पादित संकोच भी सर्वतोमुखी है। सर्वप्रथम यह संकोच पूर्वोक्त सर्वकर्तृत्व इत्यादि पांच स्वतन्त्र शक्तियों पर प्रभावान्वित होकर उनको क्रमशः किञ्चित्कर्तृत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, अपूर्णत्व, अनित्यत्व और अव्यापकत्व में परिणत कर देता है जिससे स्वतन्त्र शक्तिमान् पतिप्रमाता शक्तिदरिद्र पशु बन जाता है। इन पांच संकुचित शक्तियों के शास्त्रीय नाम क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति रखे गये हैं। इस अवस्था में ये स्वतन्त्र शक्तियां न रह कर पांच प्रकार के वासनात्मक बन्धन (पञ्चकंचुकपांच आवरण) बन जाती हैं और स्वतन्त्र आत्मा इन्हीं शृङ्खलाओं में फंसकर संसारी पशु बन जाता है। तत्त्वरूपा माया की शास्त्रीय परिभाषायें इस प्रकार हैं :- १. माया—२जिसको योगी लोग हेय समझ कर अपने से अलग कर देते हैं। २. माया—३जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित रहती है। ३. माया—४जो स्वयं 'मा' शब्द से वाच्य निषेध अर्थात् विनाश का विषय नहीं बनती है अर्थात् नित्य है। ४. माया—५जिसके गर्भ में सारा विश्व अवस्थित रहता है। ५. माया—६जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर स्वरूप में अभिन्न रूप में भी अवस्थित भावराशि को अपने से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित करता है। इन सारी परिभाषाओं के अतिरिक्त भगवान् ने स्वयं अपने सूत्र में इसको अशिवा अर्थात् चतुर्दिकू भेदप्रथा का अन्धकार उत्पन्न करके महान् अकल्याण करने वाली बताया है—'अशिवा भेदप्रथाप्रदा'। केवल अनुत्तरतत्त्व पर ही इसकी दाल नहीं गलती है। बाकी विश्व के अणु-अणु पर इसने अपना इन्द्रजाल बिछा दिया है। बार-बार सुलझाये जाने पर भी गोरखधन्धे की तरह फिर कर उलझ जाती हैं। ७यह एक भयंकर ओर विष उगलती हुई १. मायापरिग्रहवशाद् बोधो मलिनः पुमान् पशुर्भवति । कालकलानियतिवशाद् रागाविद्यावशेन संबद्धः ।। (प० सा०, १६) २. मीयते हेयतया परिच्छिद्यते योगिभिः । (तं० वि० ९.१५२) ३. सर्वत्र मातीति । (तत्रैव) ४. 'मा' शब्दवाच्याद्विनाशरूपान्निषेधाद् यातेति । (तत्रैव) ५. मात्यस्यां विश्वमिति । (तं० वि०, ९.१५२) ६. स्वात्माभिन्नमपि भावमण्डलं शिवो यया मिमीते भिदा व्यवस्थापयतीति ! (तत्रैव) ७. उन्मूलितापि शतशः खण्डितापि सहस्रशः । गोनासेवाप्रथयोदेति द्रागत्र शरणं शिवः ॥ (गोनासा कश्मीर में एक भयंकर सर्पिणी को कहते हैं । खण्ड खण्ड किये जाने पर भी यह उछलकर डंस लेती है।)