स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri नागिन है जो सौ-सौ खण्डों में काटी जाने पर भी उछल-उछल कर डस लेती है। जडमूर्त्ति होने के कारण स्वयं अन्धी है अतः चाहे साधु हो या असाधु, धनिक हो या निर्धन, पण्डित हो या मूर्ख, प्रत्येक को समान रूप से डसती है; किसी को छोड़ती नहीं। माया के ऐसे स्वभाव को दृष्टिपथ में रखकर भगवान् त्रिपुरारि ने एक और १सूत्र में माया के प्रपञ्च (अर्थात् त्रिविध मल, वासनात्मक कर्मों का जंजाल, स्वयं माया और इसका कार्यरूप जगत्) को, सहसा तिलाञ्जलि देकर, अपने वास्तविक स्वभाव की यथार्थ अनुभूति का आदेश दिया है ॥९॥ [ ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ] पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि प्रत्येक प्रकार का क्षोभ निलीन हो जाने पर मित- प्रमाता शिवभाव पर प्रतिष्ठित हो जाता है। स्पष्ट ही इस कथन का अभिप्राय यह है कि उस अवस्था में आत्मा में किसी भी प्रकार की स्फुरणा नहीं रहती है और फलतः वह तरंग- हीन सागर की भाँति शान्त अर्थात् निःस्पन्द हो जाता है। यदि ऐसी बात है तो उसका पूर्वोक्त स्पन्दात्मक स्वरूप हो कैसे सिद्ध हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का निवारण किया जा रहा है— तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥ यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञातृत्वकर्तृत्वभावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एव प्राप्तयोगात्मके काले यत् यद् ज्ञातुम् इच्छति तत् तत् जानाति च करोति च, नान्यदा संसार्थवस्थायाम् ॥१०॥ अनुवाद सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता और कर्तृतारूप धर्म, निरावृत रूप में प्रकट हो जाता है, जिससे यह सारी इच्छित बातों को स्वतन्त्रतापूर्वक जानता भी है और करता भी है ॥१०॥ वृत्ति :—यतः मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध ज्ञातृतारूप और कर्तृतारूप धर्म क्षोभ के निलीन हो जाने के उपरान्त तत्काल ही निरावृतरूप में प्रकट हो जाता है अतः वह उस आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बाद तत्क्षण ही जो जो बातें जानना चाहता है उनको (स्वतन्त्रता से) जानता है और करता है। इसके प्रतिकूल संसारी अवस्था में यह बात कदापि संभव नहीं है ॥१०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में शान्त ब्रह्मवाद वेदान्तियों का मुखमुद्रण सूत्रात्मक रूप में किया गया है। उनके विचारानुसार परब्रह्म का स्वरूप शान्त अर्थात् निःस्पन्द है। इसका अभिप्राय यह कि उनका परब्रह्म प्रकाशरूप हो या न हो परन्तु उसमें विमर्श का सर्वथा अभाव है। उनके १. मलः कर्म च माया च मायीयमखिलं जगत् । सर्वं हेयमिति प्रोक्तं विज्ञेयं वस्तु निश्चितम् ।। (मा० वि०, १.१६) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal