भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 190 में से

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पृष्ठ 74

६४ स्पन्दकारिका ही शब्दों में वह 'निस्तरंगमहोदधिकल्प (तरंगहीन महान् समुद्र के समान) है। इस कारण उसमें ज्ञान क्रियारूप चेतनता की वर्तमानता सम्भव नहीं हो सकती है। वह पूर्ण शान्त है और प्रत्येक प्रकार की झंझट से दूर है। फलतः 'विश्व है या नहीं—उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का कार्यक्रम नियमित रूप से चलता है या नहीं—यदि चलता है तो उसका ज्ञाता और कर्ता कौन है ?'—इत्यादि बातों की उसको न तो चिन्ता है और न चेतना ही। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि यद्यपि ये लोग एक ओर परब्रह्म को चेतन मानते हैं तथापि दूसरी ओर उसको शान्त-निस्तरंग-महोदधिकल्प बताकर उदासीन बना देते हैं। शैवशास्त्रियों को और विशेषकर स्पन्दशास्त्रियों को सब से उत्कृष्ट और सारे विश्व के नियामक अनुत्तर-तत्त्व की, इसप्रकार की शक्तिहीनता अथवा लूलापन मान्य नहीं है। स्वातन्त्र्यशक्तिघन चैतन्य का, ज्ञान और क्रिया पर अनन्यमुखापेक्षी अधिकार है; यह अधिकार तो उस सर्वकर्ता का अकाट्य स्वभाव ही है। ऐसी परिस्थिति में उस ज्ञानपारावार में कोई तरङ्ग न उठे यह कौन सा स्वभाव हो सकता है ? हाँ, पूर्णस्वतन्त्र होने के कारण वह तत्त्व युगपत् ही निस्तरङ्गवृत्ति और तरङ्गायमानरूप में भी प्रकाशमान है। १निस्तरङ्गवृत्तिता से शैवदर्शन में शक्तिहीनता का अभिप्राय नहीं अपितु इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों की सूक्ष्म सामरस्य अवस्था अर्थात् अभेद चिद्रूपता का अभिप्राय है। वास्तव में चैतन्य वही है जो प्रसरणशील है—रूपप्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभासमान है। विश्व भी मिथ्या या गर्हित नहीं क्योंकि ऊपर से नीचे तक सारा शिवरूप होने के कारण इसके २गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ से उठ सकता है। हाँ, केवल विश्व को शिवरूपता अर्थात् आत्मभूत चैतन्य से भेदरूप में देखना ही गर्हित है और वह एक प्रकार की भ्रान्ति ही है। ३नित्यस्फुरणशील परतत्त्व को अपनी स्वभावभूत शक्तियों से विछोह किसी भी अवस्था में नहीं होता अतः ज्ञातृता और कर्तृता उसका सहज अर्थात् अकृत्रिम और यथार्थ स्वभाव है। शान्त होने का अभिप्राय केवल यही हो सकता है कि वह परतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्व की सारी अवस्थाओं और वैचित्र्यों को स्वेच्छापूर्वक सत्ता प्रदान करने पर, असीम सामर्थ्यशाली होने के नाते, स्वयं कभी भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अथवा क्षणभङ्गुर शरीरादि के ममत्व और अभिमानरूप क्षोभों से अभिभूत नहीं हो सकता है। फलतः शान्त ब्रह्मवादियों ने परब्रह्म को शान्त कहकर उसकी उस शान्ति का जैसा ४संवेदनरहित रूप प्रस्तुत किया है उसको शैव- दार्शनिक जड़ता के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते हैं। इस विषय के साथ सम्बन्धित शैव दृष्टिकोण को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए पाठकों का ध्यान कुछ निम्नलिखित बातों की ओर आकर्षित किया जाता है। वैसे तो प्रथम १. सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते । चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ (शिवदृष्टि, १.४) २. रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ (शिवदृष्टि, १.४) ३. एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥ (तत्रैव) ४. संवित्तिशून्यमात्मनश्चिद्रूपं न कदाचिदप्यस्तीत्यर्थः (शिवदृष्टि, १.४)