भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६५ सूत्र के विवरण में इन बातों की ओर थोड़ा बहुत संकेत किया गया है परन्तु यहाँ पर जरा विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक प्रतीत होता है । १शैवमतानुसार हृदय अर्थात् अहंप्रत्यवमर्शात्मक बोधपारावार में शाश्वत रूप में, विमर्शात्मक स्पन्द की ऊर्मियाँ उठती रहती हैं क्योंकि ज्ञान चैतन्य होने के नाते कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता है । यह विमर्शरूप स्पन्द ही है जो विश्व का द्रावण अर्थात् विश्व का बाह्य इदंरूप में अवभासन अथवा प्रसारण और प्रसारित भावमण्डल को पुनः आन्तर अहं- रूपता में विलयन करने की संकल्पात्मक क्रियाशीलता पर निरत है । पहले भी कहा गया है कि स्पन्द के प्रसार की दिशा युगपत् बहिर्मुखीन और अन्तर्मुखीन भी है । बहिर्मुख प्रसार अर्थात् विश्वात्मकता को स्वीकारने की ओर उन्मुखता को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वात्मविकास' और अन्तर्मुखप्रसार अर्थात् प्रसृत विश्वात्मकता को पुनः समेटने की ओर उन्मुखता को 'स्वात्मसंकोच' कहते हैं । साथ ही इस द्विमुखी क्रियाशीलता को इकट्ठेरूप में, 'स्वरूप का उच्छलन' या २'किञ्चिच्चलन' कहा जाता है । यह किञ्चिच्चलनात्मक स्फुरणा विश्व के स्थूलरूप में विक- सित होने के 'आदि' अर्थात् निर्माण काल और 'अन्त' अर्थात् विश्व को समेटने के समय पर सामान्यरूप में चलती रहती है अतः इस रूप में इसको३ सामान्यस्पन्द कहते हैं । इसका भाव यह है कि इस अवस्था में प्रवाहमान स्पन्दशक्ति में किसी भी प्रकार की घट पट आदि विशेष विकल्पात्मकता का विभाग नहीं होता है । विश्व के स्थितिकाल में निःसंशय स्पन्द अपनी सामान्यरूपता को छोड़कर देह, प्राण, नील, सुख इत्यादि विशेष विकल्पात्मक रूपों में प्रवहमान होकर विश्ववैचित्र्य का अवभासन कर लेता है और यह विशेषरूपता भी उच्छलन या किञ्चिच्चलन ही है । इस प्रकार की यह स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही तो चैतन्य का शाश्वत स्वभाव है अतः पतिप्रमातृभाव अथवा संविद्रूपता इसके बिना रह नहीं सकती है । आखिर स्वभाव तो स्वभाव ही है, वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता है । फलतः शैवसिद्धान्त के अनुसार अनुत्तरतत्त्व सर्वज्ञ और सर्वकर्ता होने के नाते कभी भी दूर अलग-थलग पड़ा हुआ तमाशाई बन कर नहीं रहता है । वह स्वयं स्वतन्त्र होकर सब कुछ जानता भी है और करता भी है, अतः वह उदासीन या निश्चेष्ट नहीं है । ४विश्वात्मक शाक्तप्रसर की भूमिका पर चलने वाले सारे कार्यकलाप की साधन-संपत्ति अर्थात् निश्चित कार्यों के निश्चित कारणसमूह का संयोजन अथवा वियोजन करने में शिव को १. हृदये स्वविमर्शाऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः । (तं०, ९.१०२-३) २. किञ्चिञ्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥ (तं०, ९.१८४) ३. द्रष्टव्य, सूत्र १५ का विवरण । ४. तथा च तेषां हेतूनां संयोनवियोजने । नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ! (तं०, ९.३५-६) ५