स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
६२ स्पन्दकारिका १यहाँ पर केवल इस बात को समझाने की आवश्यकता है कि मायाशक्ति के द्वारा उत्पादित संकोच भी सर्वतोमुखी है। सर्वप्रथम यह संकोच पूर्वोक्त सर्वकर्तृत्व इत्यादि पांच स्वतन्त्र शक्तियों पर प्रभावान्वित होकर उनको क्रमशः किञ्चित्कर्तृत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, अपूर्णत्व, अनित्यत्व और अव्यापकत्व में परिणत कर देता है जिससे स्वतन्त्र शक्तिमान् पतिप्रमाता शक्तिदरिद्र पशु बन जाता है। इन पांच संकुचित शक्तियों के शास्त्रीय नाम क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति रखे गये हैं। इस अवस्था में ये स्वतन्त्र शक्तियां न रह कर पांच प्रकार के वासनात्मक बन्धन (पञ्चकंचुकपांच आवरण) बन जाती हैं और स्वतन्त्र आत्मा इन्हीं शृङ्खलाओं में फंसकर संसारी पशु बन जाता है। तत्त्वरूपा माया की शास्त्रीय परिभाषायें इस प्रकार हैं :- १. माया—२जिसको योगी लोग हेय समझ कर अपने से अलग कर देते हैं। २. माया—३जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित रहती है। ३. माया—४जो स्वयं 'मा' शब्द से वाच्य निषेध अर्थात् विनाश का विषय नहीं बनती है अर्थात् नित्य है। ४. माया—५जिसके गर्भ में सारा विश्व अवस्थित रहता है। ५. माया—६जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर स्वरूप में अभिन्न रूप में भी अवस्थित भावराशि को अपने से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित करता है। इन सारी परिभाषाओं के अतिरिक्त भगवान् ने स्वयं अपने सूत्र में इसको अशिवा अर्थात् चतुर्दिकू भेदप्रथा का अन्धकार उत्पन्न करके महान् अकल्याण करने वाली बताया है—'अशिवा भेदप्रथाप्रदा'। केवल अनुत्तरतत्त्व पर ही इसकी दाल नहीं गलती है। बाकी विश्व के अणु-अणु पर इसने अपना इन्द्रजाल बिछा दिया है। बार-बार सुलझाये जाने पर भी गोरखधन्धे की तरह फिर कर उलझ जाती हैं। ७यह एक भयंकर ओर विष उगलती हुई १. मायापरिग्रहवशाद् बोधो मलिनः पुमान् पशुर्भवति । कालकलानियतिवशाद् रागाविद्यावशेन संबद्धः ।। (प० सा०, १६) २. मीयते हेयतया परिच्छिद्यते योगिभिः । (तं० वि० ९.१५२) ३. सर्वत्र मातीति । (तत्रैव) ४. 'मा' शब्दवाच्याद्विनाशरूपान्निषेधाद् यातेति । (तत्रैव) ५. मात्यस्यां विश्वमिति । (तं० वि०, ९.१५२) ६. स्वात्माभिन्नमपि भावमण्डलं शिवो यया मिमीते भिदा व्यवस्थापयतीति ! (तत्रैव) ७. उन्मूलितापि शतशः खण्डितापि सहस्रशः । गोनासेवाप्रथयोदेति द्रागत्र शरणं शिवः ॥ (गोनासा कश्मीर में एक भयंकर सर्पिणी को कहते हैं । खण्ड खण्ड किये जाने पर भी यह उछलकर डंस लेती है।)
सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता
ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri नागिन है जो सौ-सौ खण्डों में काटी जाने पर भी उछल-उछल कर डस लेती है। जडमूर्त्ति होने के कारण स्वयं अन्धी है अतः चाहे साधु हो या असाधु, धनिक हो या निर्धन, पण्डित हो या मूर्ख, प्रत्येक को समान रूप से डसती है; किसी को छोड़ती नहीं। माया के ऐसे स्वभाव को दृष्टिपथ में रखकर भगवान् त्रिपुरारि ने एक और १सूत्र में माया के प्रपञ्च (अर्थात् त्रिविध मल, वासनात्मक कर्मों का जंजाल, स्वयं माया और इसका कार्यरूप जगत्) को, सहसा तिलाञ्जलि देकर, अपने वास्तविक स्वभाव की यथार्थ अनुभूति का आदेश दिया है ॥९॥ [ ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ] पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि प्रत्येक प्रकार का क्षोभ निलीन हो जाने पर मित- प्रमाता शिवभाव पर प्रतिष्ठित हो जाता है। स्पष्ट ही इस कथन का अभिप्राय यह है कि उस अवस्था में आत्मा में किसी भी प्रकार की स्फुरणा नहीं रहती है और फलतः वह तरंग- हीन सागर की भाँति शान्त अर्थात् निःस्पन्द हो जाता है। यदि ऐसी बात है तो उसका पूर्वोक्त स्पन्दात्मक स्वरूप हो कैसे सिद्ध हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का निवारण किया जा रहा है— तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥ यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञातृत्वकर्तृत्वभावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एव प्राप्तयोगात्मके काले यत् यद् ज्ञातुम् इच्छति तत् तत् जानाति च करोति च, नान्यदा संसार्थवस्थायाम् ॥१०॥ अनुवाद सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता और कर्तृतारूप धर्म, निरावृत रूप में प्रकट हो जाता है, जिससे यह सारी इच्छित बातों को स्वतन्त्रतापूर्वक जानता भी है और करता भी है ॥१०॥ वृत्ति :—यतः मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध ज्ञातृतारूप और कर्तृतारूप धर्म क्षोभ के निलीन हो जाने के उपरान्त तत्काल ही निरावृतरूप में प्रकट हो जाता है अतः वह उस आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बाद तत्क्षण ही जो जो बातें जानना चाहता है उनको (स्वतन्त्रता से) जानता है और करता है। इसके प्रतिकूल संसारी अवस्था में यह बात कदापि संभव नहीं है ॥१०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में शान्त ब्रह्मवाद वेदान्तियों का मुखमुद्रण सूत्रात्मक रूप में किया गया है। उनके विचारानुसार परब्रह्म का स्वरूप शान्त अर्थात् निःस्पन्द है। इसका अभिप्राय यह कि उनका परब्रह्म प्रकाशरूप हो या न हो परन्तु उसमें विमर्श का सर्वथा अभाव है। उनके १. मलः कर्म च माया च मायीयमखिलं जगत् । सर्वं हेयमिति प्रोक्तं विज्ञेयं वस्तु निश्चितम् ।। (मा० वि०, १.१६) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
६४ स्पन्दकारिका ही शब्दों में वह 'निस्तरंगमहोदधिकल्प (तरंगहीन महान् समुद्र के समान) है। इस कारण उसमें ज्ञान क्रियारूप चेतनता की वर्तमानता सम्भव नहीं हो सकती है। वह पूर्ण शान्त है और प्रत्येक प्रकार की झंझट से दूर है। फलतः 'विश्व है या नहीं—उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का कार्यक्रम नियमित रूप से चलता है या नहीं—यदि चलता है तो उसका ज्ञाता और कर्ता कौन है ?'—इत्यादि बातों की उसको न तो चिन्ता है और न चेतना ही। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि यद्यपि ये लोग एक ओर परब्रह्म को चेतन मानते हैं तथापि दूसरी ओर उसको शान्त-निस्तरंग-महोदधिकल्प बताकर उदासीन बना देते हैं। शैवशास्त्रियों को और विशेषकर स्पन्दशास्त्रियों को सब से उत्कृष्ट और सारे विश्व के नियामक अनुत्तर-तत्त्व की, इसप्रकार की शक्तिहीनता अथवा लूलापन मान्य नहीं है। स्वातन्त्र्यशक्तिघन चैतन्य का, ज्ञान और क्रिया पर अनन्यमुखापेक्षी अधिकार है; यह अधिकार तो उस सर्वकर्ता का अकाट्य स्वभाव ही है। ऐसी परिस्थिति में उस ज्ञानपारावार में कोई तरङ्ग न उठे यह कौन सा स्वभाव हो सकता है ? हाँ, पूर्णस्वतन्त्र होने के कारण वह तत्त्व युगपत् ही निस्तरङ्गवृत्ति और तरङ्गायमानरूप में भी प्रकाशमान है। १निस्तरङ्गवृत्तिता से शैवदर्शन में शक्तिहीनता का अभिप्राय नहीं अपितु इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों की सूक्ष्म सामरस्य अवस्था अर्थात् अभेद चिद्रूपता का अभिप्राय है। वास्तव में चैतन्य वही है जो प्रसरणशील है—रूपप्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभासमान है। विश्व भी मिथ्या या गर्हित नहीं क्योंकि ऊपर से नीचे तक सारा शिवरूप होने के कारण इसके २गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ से उठ सकता है। हाँ, केवल विश्व को शिवरूपता अर्थात् आत्मभूत चैतन्य से भेदरूप में देखना ही गर्हित है और वह एक प्रकार की भ्रान्ति ही है। ३नित्यस्फुरणशील परतत्त्व को अपनी स्वभावभूत शक्तियों से विछोह किसी भी अवस्था में नहीं होता अतः ज्ञातृता और कर्तृता उसका सहज अर्थात् अकृत्रिम और यथार्थ स्वभाव है। शान्त होने का अभिप्राय केवल यही हो सकता है कि वह परतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्व की सारी अवस्थाओं और वैचित्र्यों को स्वेच्छापूर्वक सत्ता प्रदान करने पर, असीम सामर्थ्यशाली होने के नाते, स्वयं कभी भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अथवा क्षणभङ्गुर शरीरादि के ममत्व और अभिमानरूप क्षोभों से अभिभूत नहीं हो सकता है। फलतः शान्त ब्रह्मवादियों ने परब्रह्म को शान्त कहकर उसकी उस शान्ति का जैसा ४संवेदनरहित रूप प्रस्तुत किया है उसको शैव- दार्शनिक जड़ता के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते हैं। इस विषय के साथ सम्बन्धित शैव दृष्टिकोण को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए पाठकों का ध्यान कुछ निम्नलिखित बातों की ओर आकर्षित किया जाता है। वैसे तो प्रथम १. सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते । चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ (शिवदृष्टि, १.४) २. रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ (शिवदृष्टि, १.४) ३. एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥ (तत्रैव) ४. संवित्तिशून्यमात्मनश्चिद्रूपं न कदाचिदप्यस्तीत्यर्थः (शिवदृष्टि, १.४)
ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ६५ सूत्र के विवरण में इन बातों की ओर थोड़ा बहुत संकेत किया गया है परन्तु यहाँ पर जरा विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक प्रतीत होता है । १शैवमतानुसार हृदय अर्थात् अहंप्रत्यवमर्शात्मक बोधपारावार में शाश्वत रूप में, विमर्शात्मक स्पन्द की ऊर्मियाँ उठती रहती हैं क्योंकि ज्ञान चैतन्य होने के नाते कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता है । यह विमर्शरूप स्पन्द ही है जो विश्व का द्रावण अर्थात् विश्व का बाह्य इदंरूप में अवभासन अथवा प्रसारण और प्रसारित भावमण्डल को पुनः आन्तर अहं- रूपता में विलयन करने की संकल्पात्मक क्रियाशीलता पर निरत है । पहले भी कहा गया है कि स्पन्द के प्रसार की दिशा युगपत् बहिर्मुखीन और अन्तर्मुखीन भी है । बहिर्मुख प्रसार अर्थात् विश्वात्मकता को स्वीकारने की ओर उन्मुखता को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वात्मविकास' और अन्तर्मुखप्रसार अर्थात् प्रसृत विश्वात्मकता को पुनः समेटने की ओर उन्मुखता को 'स्वात्मसंकोच' कहते हैं । साथ ही इस द्विमुखी क्रियाशीलता को इकट्ठेरूप में, 'स्वरूप का उच्छलन' या २'किञ्चिच्चलन' कहा जाता है । यह किञ्चिच्चलनात्मक स्फुरणा विश्व के स्थूलरूप में विक- सित होने के 'आदि' अर्थात् निर्माण काल और 'अन्त' अर्थात् विश्व को समेटने के समय पर सामान्यरूप में चलती रहती है अतः इस रूप में इसको३ सामान्यस्पन्द कहते हैं । इसका भाव यह है कि इस अवस्था में प्रवाहमान स्पन्दशक्ति में किसी भी प्रकार की घट पट आदि विशेष विकल्पात्मकता का विभाग नहीं होता है । विश्व के स्थितिकाल में निःसंशय स्पन्द अपनी सामान्यरूपता को छोड़कर देह, प्राण, नील, सुख इत्यादि विशेष विकल्पात्मक रूपों में प्रवहमान होकर विश्ववैचित्र्य का अवभासन कर लेता है और यह विशेषरूपता भी उच्छलन या किञ्चिच्चलन ही है । इस प्रकार की यह स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही तो चैतन्य का शाश्वत स्वभाव है अतः पतिप्रमातृभाव अथवा संविद्रूपता इसके बिना रह नहीं सकती है । आखिर स्वभाव तो स्वभाव ही है, वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता है । फलतः शैवसिद्धान्त के अनुसार अनुत्तरतत्त्व सर्वज्ञ और सर्वकर्ता होने के नाते कभी भी दूर अलग-थलग पड़ा हुआ तमाशाई बन कर नहीं रहता है । वह स्वयं स्वतन्त्र होकर सब कुछ जानता भी है और करता भी है, अतः वह उदासीन या निश्चेष्ट नहीं है । ४विश्वात्मक शाक्तप्रसर की भूमिका पर चलने वाले सारे कार्यकलाप की साधन-संपत्ति अर्थात् निश्चित कार्यों के निश्चित कारणसमूह का संयोजन अथवा वियोजन करने में शिव को १. हृदये स्वविमर्शाऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः । (तं०, ९.१०२-३) २. किञ्चिञ्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥ (तं०, ९.१८४) ३. द्रष्टव्य, सूत्र १५ का विवरण । ४. तथा च तेषां हेतूनां संयोनवियोजने । नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ! (तं०, ९.३५-६) ५
६६ स्पन्दकारिका ही एक मात्र स्वतन्त्र कर्ता के रूप में अवश्य मानना पड़ता है क्योंकि उसका रूप संविदात्मक है और विश्वात्मक ज्ञातृता और कर्तृता की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का यथार्थ अकृत्रिम स्वभाव है। यही कारण है कि मितप्रमातृभाव की भूमिका पर भी संसार के सारे अणु, दैनिक आदान-प्रदान के समयों पर, अपनी अपनी आवश्यकतानुसार, निश्चित कार्यों का उत्पादन करने के लिए जिन निश्चित कारण समूहों का संयोजन अथवा वियोजन करते रहते हैं उनके मूल में भी स्पन्दात्मक संवित् ही क्रियाशील है। संवित् तो संवित् ही है; न कहीं कम न कहीं अधिक। अतः पतिप्रमातृभाव अथवा पशुप्रमातृभाव की भूमिकाओं पर उसकी ज्ञातृकर्तृ रूप क्रियाशीलता में कोई अन्तर नहीं है। हाँ केवल इतनी बात है कि पशुरूप में वह आवश्य- कता के अनुसार स्वयं ही जड़ शरीर इत्यादि के प्रति ममत्व अभिमान के क्षोभ का चोला पहन कर निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधियों में क्रियाशील है जबकि पतिरूप में उसकी क्रियाशीलता पर कोई अंकुश नहीं है। वास्तव में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो संसार के अणुवर्ग में पाया जाने वाला १देहादि के प्रति ममत्व, अथवा संसार के कर्तव्यों के प्रति कर्तृत्व का झूठा अभिमान् भी तो विश्वशरीरी भगवान् की ही स्फुरणा है। अतः वह जड़ या उदासीन नहीं है। संसार के पशु, अपने वास्तविक संविदात्मक स्वरूप को भूलकर, कभी भी तृप्त न होने वाली वासनाओं की मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए, 'इस कर्म से मेरी इष्टापत्ति है और उससे अनिष्टापत्ति होगी' ऐसे संकोचों में पड़कर, उपादेयता और हेयता के क्षोभ अर्थात् अन्तर्द्वन्द्व में, भावनाओं से जनित संघर्ष का शिकार बन जाते हैं। यदि भगवदनुग्रह और सद्गुरुओं के कृपाकटाक्ष से पशुहृदय में एक बार ही यह अनुभूति जागृत हो जाये कि— 'वास्तव में मैं देहादि का सत्ताभूत संवित् स्वरूप ही हूँ और सारा विश्व मेरा ही विभव है, अतः मैं जानने और करने में सर्वदा स्वतन्त्र हूँ' तो उसके सारे पाश स्वयं ही खुल जाते हैं; वह पशुप्रमातृभाव से ऊपर उठकर अकृत्रिम ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का अधिकारी बन जाता है। इसी को शास्त्रों में 'आत्मबल का स्पर्श' कहते हैं ॥१०॥ [ संसारभाव की शान्ति ] सूत्रकार ने यहाँ तक के सूत्रों में दृढ़ उपपत्तियों के द्वारा स्पन्दतत्त्व का प्रतिपादन किया। अब अगले सूत्र में यह समझाया जा रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास की दृढ़ता प्राप्त होने से, योगी को, अपने में ही उस स्पन्दशक्ति की अनुभूति हो जाती है। अनन्तर उसी भाव पर स्थिरता प्राप्त करने से उसको जघन्य एवं घृणित पशुयोनियों में भटकते रहने से छुटकारा मिल सकता है— तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ? ॥११॥ १. तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रहः । कर्तेति पुंसः कर्तृत्वमभिमानोऽपि विभोः कृतिः ॥ (तं०, ९.१७५)
सूत्र-जो कोई साधक स्वभाव अर्थात् स्पन्दात्मक आत्मरूप का ही, विश्व के कण-
संसारभाव की शान्ति ६७ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः, तस्मात् तम् अधिष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन्, विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता सृतिः सरणं न भवति ॥११॥ अनुवाद सूत्र-जो कोई साधक स्वभाव अर्थात् स्पन्दात्मक आत्मरूप का ही, विश्व के कण- कण में अनुस्यूत रहने वाली मुख्य सत्ता के रूप में साक्षात्कार करता हुआ, विस्मय की जैसी मुद्रा में अवस्थित रहता है, वह इस तिरस्कार से पूर्ण और कुत्सित आवागमन के चक्कर में कैसे पड़ सकता है ? ॥११॥ वृत्ति-तो इस पूर्वोक्त प्रकार से जब यह बात सिद्ध है कि आत्मस्वभाव अर्थात् सामान्य स्पन्दतत्त्व विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अनुस्यूत और प्रत्येक प्रकार के सामर्थ्य से युक्त है, तब जो कोई भी योगी उसी स्वभाव को अधिष्ठाता के रूप में अर्थात् सर्वव्यापक रूप में अनुभव करता हुआ विस्मय की जैसी अवस्था में अवस्थित रहता है उसको कुत्सा अर्थात् जघन्यता से पूर्ण सृति अर्थात् आवागमन का झंझट नहीं होता है ॥११॥ विवरण 'तुर्यदशा' अथवा दूसरे शब्दों में 'शाक्तभूमिका' पर आरूढ़ होने का इच्छुक योगी संसार का सारा कार्य-कलाप करते-करते ही, संसार के तुच्छातिच्छ पदार्थों में भी स्वभाव- भूत स्पन्दरूपता के प्रसार एवं विकास को अनुभव करने का निरन्तर अभ्यास करता रहता है। धीरे-धीरे अभ्यास की परिपक्वता, शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन, परमेश्वरीय अनुग्रह और सद्गुरुओं के कृपा-कटाक्ष से उसकी भावनायें तुच्छ शरीर इत्यादि पर आत्माभिमान रखने की संकुचित परिधियों से निकलकर विश्वात्मभाव अथवा पूर्ण 'अहं विमर्श' पर आरूढ़ हो जाती हैं, ऐसी अवस्था में उसकी चित्-रूपता पर विद्यमान मायीय घन आवरण स्वयं ही हट जाता है, चतुर्दिक चित्प्रकाश के किरणजाल का स्वर्णिम एवं शाश्वत आलोक मुखरित हो उठता है और उसकी आत्मा शरीर में रहते हुए भी 'तुर्या-अवस्था' का साक्षात्कार कर लेती है। उसके लिए चिरन्तन सत्य के रुद्ध किवाड़ अकस्मात् खुल जाते हैं और वह भैरव भूमिका पर आरूढ़ होने का अधिकारी बन जाता है। १भाव यह कि ऐसा साधक निरन्तर अभ्यास करने से, चारों ओर अपनी ही स्वातन्त्र्यशक्ति के विकास का अनुभव करता हुआ, तुरीया- दशारूप स्वच्छन्द भूमिका के क्षेत्र में प्रवेश पा सकता है। प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक स्थान पर अपनी ही चित्रूपता की अधिष्ठातृता अर्थात् वास्तविक अथवा मौलिक व्यापकता का यथार्थ अनुभव करने से, उसको, विश्व की सारी भङ्गियाँ, २किसी जलाशय की उठने वाली तरङ्गों, अग्नि की ऊपर की ओर उठने वाली लपटों अथवा सौरमण्डल से निकलने वाले १. योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ।। (स्व० तं०, ७.२५७-८) २. जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभाङ्गयो यथा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्गयो विनिर्गताः ।। (वि० भै०, ११०) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
६८ स्पन्दकारिका आलोक पुञ्ज की तरह स्वरूप के ही बहिर्मुख विकास के रूप में प्रतीत होती हैं। इस प्रकार की यौगिक अनुभूति के स्तर को शास्त्रीय शब्दों में तुरीया दशा या शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने की भूमिका कहा जाता है। इसी शाक्तभूमिका का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर साधक में, ज्यों ज्यों इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है त्यों त्यों उसको कई ऐसी १लोकोत्तर यौगिक भूमिकायें स्वतः अनुभव में आ जाती हैं जो अन्तिम तुर्यातीत दशा पर शीघ्र ही आरूढ होने की पूर्वसूचना की प्रतीक होती हैं। वास्तव में शैवगुरुओं का कथन है कि तुरीया-भूमिका पर शाश्वत स्थिरता प्राप्त करना ही तुरीयातीत-भूमिका (पूर्ण शिवभाव) पर आरूढ होना होता है। इन यौगिक भूमिकाओं को ही परमकारुणिक भगवान् चन्द्रमौलि ने 'विस्मय' का नाम दे दिया है जिसका उल्लेख प्रस्तुत सूत्र में 'स्मयमानः' शब्द से किया गया है। शैवदर्शन में २'विस्मय' शब्द का अर्थ आश्चर्य की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य अनुभूति है। योगी को शाक्त- भूमिका का साक्षात्कार होते ही, उसके प्रति एक प्रकार की अतृप्ति जैसी उत्पन्न हो जाती है। फलतः वह बार बार अन्तर्मुख होकर उस आनन्दसागर में डुबकियां लगाने लगता है। ऐसे समयों पर उसके अन्तस् में एक विशेष प्रकार की आश्चर्यमानता की जैसी दशा उदित हो जाती है जो उसको बार बार अन्तर्मुख हो जाने की ओर आकर्षित कर लेती है। शैव मान्यता के अनुसार यह विस्मयात्मक योगभूमिका साक्षात् तुरीयारूप और नित्य नव-नव-चमत्कारमयी होने के कारण सबसे उत्कृष्ट और केवल स्वानुभवगम्य है, जबकि अणिमा इत्यादि दूसरे प्रकार की यौगिक भूमिकायें, इसकी अपेक्षा निम्नस्तर की और परसंवेद्य भी हैं। ३दैनिक आदान-प्रदानों में जब कोई मनुष्य किसी विशेष अतिशय से युक्त वस्तु का साक्षात्कार कर लेता है तो उसके मन में एक प्रकार की विचित्र एवं स्तम्भकारिणी वृत्ति का उदय हो जाता है। उस समय वह उस वस्तु के, अन्य वस्तुओं से विशिष्ट, आकार-प्रकार को कौतूहलपूर्ण नेत्रों से देखता हुआ भी वाणी के द्वारा कुछ अभिव्यक्त नहीं कर सकता है। उस समय उसको अन्तः-चेतना, उसी वस्तु के अनन्य एवं अद्भुत सौन्दर्य का आन्तरिक रूप में ही आनन्द लेती हुई एक ऐसी अकथनीय अवस्था में डूब जाती है जिसको 'विस्मय' १. ता एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य सम्बन्धिन्यो भूमिकाः। तदध्यारोहविश्रान्तिसूचिकाः परिमिता भूमयः। (शि० सू० वि०, १.१२) २. विस्मयो योगभूमिकाः। (शि० सू०, १.१२) ३. यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत्। तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने ॥ निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितैन्द्रिये । परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं हि विस्मयः ॥ (शि० सू० वा० (वरद), पृ० २.६३)
'या' 'आश्चर्यमानता' कहते हैं। ठीक इसी प्रकार स्वात्मनिष्ठ साधक को भी बार-बार शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इस वेद्यपञ्चक के, सामान्य-स्पन्दमयी अहन्ता में विश्रान्त हो जाने के अवसरों पर, अनिर्वाच्य अतिशयता से युक्त और नव-नव-चमत्कार (चैतन्य रस का अलौकिक आस्वाद) से पूर्ण स्वरूप-समावेश का उदय हो जाता है। उस समय उसके अन्तस् में, स्वरूपभूत करणेश्वरीचक्र के विकसित वैभव की अनुभूति प्राप्त कर लेने से कोई ऐसी आन्तरिक दशा उदित हो जाती है कि वह बार बार उस स्वरूपसमावेशमय आनन्द का, अतृप्तरूप में, अनुभव करता हुआ १आश्चर्यमानता से सराबोर हो जाता है। इस आश्चर्यमानता के प्रारम्भिक रूप को शास्त्रीय शब्दों में 'साश्चर्यस्पन्दरूपता' कहते हैं। इस दशा के उदित हो जाने के अनन्तर ही ऐसा साधक विकल्पहीन तुर्यातीत दशा पर प्रतिष्ठित होने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। इस दशा का उदित होना ही इस बात का सूचक होता है कि ऐसे योगीश्वर की आत्मा, पञ्चकञ्चुक की सीमाओं को लांघ कर, भेदरहित विश्वात्मभाव के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगी है और वह अपने ही चिन्मात्ररूप को सर्वत्र उपलब्धा या अधिष्ठाता के रूप में अनुभव करने लगी है। ऐसी मुक्तात्मा के लिए कभी भी आवागमन के बन्धन में फँस जाने का प्रश्न ही नहीं उठता है क्योंकि एक बार पिंजरे का द्वार खुल गया, उन्मुक्त होने के लिए युग युगों में तड़पता हुआ, विहङ्गम उड़ कर शून्य में खो गया, अब वह आकर फिर उसी पिंजरे का बन्दी बन जायेगा, ऐसी कल्पना करना व्यर्थ है। ऊपर कहा गया है कि तुर्यावस्था पर पहुँचा हुआ योगी बार बार उस आनन्द का अनुभव करने के लिये अन्तर्मुख हो जाता है। इस बार बार अन्तर्मुख हो जाने की अवस्था को शैव शब्दों में 'क्रममुद्रा' कहते हैं। साथ ही इस अवस्था को द्योतित करने वाले 'भैरवं- मुद्रा, स्वरूप-समावेश, शाम्भव-समावेश' इत्यादि अन्य कतिपय शास्त्रीय शब्द भी हैं। क्रममुद्रा नित्योदित-समाधि को कहते हैं। इस अवस्था में साधक अन्तर्मुख अवस्था के अति- रिक्त बहिर्मुख अवस्था में भी चित्-रूपता में २समाविष्ट ही रहता है। इसका अभिप्राय यह कि क्रममुद्रा समाधि की ऐसी परिपक्व अवस्था होती है कि साधक स्वरूप-समावेश के बल से, सहज ही में, ३बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में विद्युद्- गति से प्रवेश कर सकता है। ऐसा करने में उसको कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है क्योंकि निरन्तर अभ्यास के द्वारा यह उसका स्वभाव ही बना होता है। अपरिपक्व समाधि दशा में समाधिकाल तक ही स्वरूप की अनुभूति रहती है परन्तु इसमें ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता है। यही कारण है कि सिद्ध पुरुषों ने ऐसी समाधि को 'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नाम दिया है। गुरुओं का कथन है कि इस अवस्था पर पहुँचा हुआ साधक व्युत्थानदशा १. द्रष्टव्य, शि० सू० वि०, १.१२ २. क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । (प्र० हृ० सू०, १९) ३. तत्रादौ बाह्याद् अन्तःप्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत इति सबाह्याभ्यन्तरसमावेश मुद्राक्रमः। (तत्रैव)
७० स्पन्दकारिका में भी अर्थात् संसार के सारे कार्यकलापों को करता हुआ भी उन्हीं समाधिकालीन संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्यपदार्थ में मात्र चिन्मयता के ही आभास को प्राप्त करने के कारण, दोनों अवस्थाओं में १स्वरूपनिष्ठ ही होता है। उसको सारा भाववर्ग शरत्काल के मेघखण्ड की तरह चिदाकाश में ही लीन होता हुआ प्रतीत होता है। फलतः ऐसा योगी अभी अन्तर्मुख और अभी बहिर्मुख होता है। इस द्विमुखी समाधिक्रम को शास्त्रकारों ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है— “२शाक्तभूमिका पर पहुँचा हुआ योगी 'निमीलनसमाधि' के द्वारा, बाहर के इदन्तरूप भाववर्ग को सामान्यस्पन्द में ही विश्रान्त करता हुआ पराचित्-भूमिका में प्रवेश करता है। वहाँ स्वरूपसाक्षात्कार करके 'उन्मीलनसमाधि' के द्वारा अहन्ता में विश्रान्त किये हुए भाववर्ग को बाहिर की ओर वमन करता हुआ फिर भी इदन्ता के क्षेत्र में प्रवेश करता है। इस 'अन्तःप्रवेश' और 'बहिः-निर्गमन' की प्रक्रिया में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखने के योग्य है कि ऐसे पद पर पहुँचे हुए योगी को दोनों ही अवस्थाओं में स्वरूपभूत सामान्यस्पन्दात्मकता का ही विकास अनुभव में आता है।” ३'क्रममुद्रा' शब्द के दो खण्ड हैं—'क्रम' और 'मुद्रा'। इनमें से 'क्रम' शब्द से संवित् रूप में ही सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम का और 'मुद्रा' शब्द से मुद्रित करने का अर्थात् स्वरूप में ही विश्रान्त करने का अभिप्राय लिया जाता है। फलतः 'क्रममुद्रा' स्वतः तुरीयारूपा होने के कारण, प्रत्येक प्रकार के क्रम को, ग्रास करने के क्रम से स्वरूप में ही विश्रान्त कर लेती है। इसके अतिरिक्त 'क्रममुद्रा' शब्द से यह अभिप्राय भी लिया जाता है कि यह एक नित्य-उदित समाधि की दशा होने के कारण अन्तःरूप में या बाह्यरूप में समानरूप से आनन्द का वितरण करती है, अख्याति के द्वारा उत्पादित पाशों को काट लेती है और सारे बाह्य-अवभास को आभ्यन्तर तुरीयासत्ता में मुद्रित कर लेती है। प्रस्तुत सूत्र में इसी योग-भूमिका को 'स्मयमानः' शब्द के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है ॥१९॥ [ अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ] शैव दर्शन के अनुसार सामान्य-स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका पूर्णज्ञातृत्व और पूर्णकर्तृत्वरूप चैतन्य की भूमिका है। इसके प्रतिकूल अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों और लगभग उनके ही समकक्ष सिद्धान्त का अनुसरण करने वाले शून्यवादी माध्यमिकों की मान्यता के अनुसार स्व- १. आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं घूर्ण- मानो भावराशिं शरदभ्रलवम् इव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखतामेव समवल- म्बमानो निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरेऽपि समाध्येकरस एव भवति । (प्र० हृ० सू०, १९) २. द्रष्टव्य, प्रत्यभिज्ञाहृदय सूत्र १९ की टीका । ३. अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहारादिसंविच्चक्रविकासरूपं क्रमं मुद्रयति, स्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः...................................। (प्र० हृ० सू०, १९)
सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू-
अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यवाद की निःसारता ७१ रूपसाक्षात्कार की दशा सर्वभाव या सर्वशून्यता की ही दशा है क्योंकि इस दशा पर पहुँची हुई आत्मा अभाव में ही लीन हो जाती है। अगले सूत्र में ऐसे मतवादियों का मुखमुद्रण किया जा रहा है :- नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदिति निश्चयः ॥१२॥ न तु अभावो भावनीयो, यथा अन्यैर्योगिभिः उपदिश्यते, ‘अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्, इति। न चैतत् युक्तम्, यस्मात् नाभावे भावना युज्यते मूढावस्थैव सा यस्मात् उत्तरकालम् अभियोगसंस्पर्शात् अभिलापसंयोगात्-‘सा शून्यावस्था अतीता मम’ इति स्मर्यते, न च आत्मस्वभाव एषः, यस्मात् न त्वेवं चिद्रूपत्वं मूढावस्थावत् स्मर्यते, तस्य सर्वकालमनुभवितृत्वेनाननुभवो नित्योदितत्वात् ॥१२॥ अनुवाद सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू- ढ़ता (जड़ता का अभाव) भी नहीं है (अर्थात् अभाव-भावना की अवस्था जड़ता की ही अवस्था है)। इसका कारण यह कि (अभाव समाधि से उठने के अनन्तर योगी को) अभिलाप अर्थात् भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाने पर—'वह मेरी शून्य अवस्था थी' ऐसा निश्चय हो जाता है ॥१२॥ वृत्ति—जैसा कि दूसरे योगी उपदेश देते हैं— 'तब तक अभाव की भावना करते रहना चाहिये जब तक आत्मा अभाव में ही लीन हो जाए'—युक्तिसङ्गत नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। वास्तव में यह विचार युक्तियुक्त भी नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो निश्चय से जड़ता की ही अवस्था है अतः उसका, भावना का विषय होने का मन्तव्य प्रस्तुत करना असङ्गत है। वह अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि-काल के अनन्तर जब ऐसे योगी को अभियोग अर्थात् भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाता है तब वह उस समाधि की अवस्था को 'वह मेरी शून्य अवस्था थी' इसप्रकार स्मर्यमाणरूप में अनुभव करता है। आत्मा का स्वभाव ऐसा नहीं है क्योंकि चित्-स्वरूपता (सतत उदीयमान होने के कारण) मूढ़ता की अवस्था की तरह स्मरण नहीं की जाती है। वह तो शाश्वत-उदीयमान-सत्ता है अतः उसका अनुभव प्रतिसमय (वर्तमानकालिक) अनुभवविता (स्वतन्त्र ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य प्रमाता) के रूप में होता है ॥१२॥ विवरण अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों से प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा का और शून्य- वादियों से बौद्ध दार्शनिकों की माध्यमिक शाखा के अनुयायियों का अभिप्राय है। विषय को
७२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri थोड़ा स्पष्ट करने के लिए यहाँ पर इन दोनों मतवादियों के सिद्धान्त का संक्षिप्त पर्यालोचन करना आवश्यक है। अभावब्रह्मवाद—इस वाद के अनुसार अभाव रूप अथवा असत्-रूप कारण से भावरूप या सद्रूप कार्य की उत्पत्ति मानी गई है। इसका तात्पर्य यह है कि इस भावरूप में दिखाई देने वाले स्थूल-जगत् की सृष्टि से पहले किसी पदार्थ की सत्ता भावरूप में न होने के कारण चारों ओर अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही भावरूप में दिखाई देने वाले जगत् की सृष्टि स्वयं हो गई है। ये लोग अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित उपनिषद्वाक्य को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं— 'असदेवेदमग्र आसीत्.........'॥ (छान्दोग्य० ३.१९.१) कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि से पहले असत् ही असत् था अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का अभाव था। प्रलय के पश्चात् भी सारा जगत् अभाव में ही लय होगा अतः वास्तव में अभाव ही यथार्थ-सत्ता है। ब्रह्म का वास्तविक रूप भी अभाव ही है। इस अभाव की निरन्तर भावना करने से सारी सांसारिक उथल-पुथल का उच्छेद हो जाता है क्योंकि वेदकसत्ता और वेद्यसत्ता दोनों अभाव में ही लय हो जाती हैं। अभाव में लय होना ही जीवात्मा की वास्तविक मुक्ति है। फलतः अभावसमाधि की परिपक्वता प्राप्त करके आत्मा का अभावरूप परब्रह्म में लीन होना ही सारी साधना का चरमलक्ष्य है। शून्यवाद—बौद्धों की १माध्यमिक शाखा के प्रसिद्ध एवं उद्भट विद्वान् नागार्जुन और उसके समकक्ष कई अन्य विद्वानों ने बौद्ध-दर्शन में 'सर्वशून्यवाद' की स्थापना की है। ये लोग इस वाद को 'सर्ववैनाशिकवाद' भी कहते थे। यह एक ऐसा वाद था जिसके अनुसार किसी भी प्रकार के पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं स्वीकारा गया था। भगवान् अभिनवगुप्त ने अपने तन्त्रालोक में इन लोगों को २'सर्वापह्नवहेवाकधर्मा' के नाम से पुकारा है। उनके विचारानुसार इन लोगों ने प्रत्येक प्रकार के ज्ञातृरूप, ज्ञानरूप और ज्ञेयरूप पदार्थों के अनस्तित्व पर दुराग्रह करने का ठेका ले रखा था। इनके मत का संक्षिप्त निष्कर्ष यह है कि यह सारा दृश्यमान स्थूल जगत् वास्तव में शून्य का ३विवर्तमात्र है। शून्य के अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थ अथवा ज्ञान की निजी कोई सत्ता नहीं है। शून्य का स्वरूप न ४सत्, न असत्, न सदसत् और न सदसत् से भिन्न है। यथार्थ शून्य वही है जहाँ इन चारों में से कुछ भी न हो। यह शून्य ही ५पारमार्थिक सत्य है १. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, डा० बलदेव उपाध्याय, पृ० १५२-६१। २. 'सर्वेषां ज्ञातृज्ञानज्ञेयानाम् 'अपह्नवों' निराकरणं तत्र 'हेवाक' एव 'धर्म:' स्वभावो यस्यासौ बौद्ध:।' (तं० वि०, १.५६) ३. मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्। (भा० द० पृष्ठ १३२) ४. न सन् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम्। चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥(मा०का०) भा०द० पृष्ठ ५६३ पर उदाहृत ५. अन्यथा न होने वाली, वास्तविक और प्रमाणों से परिपुष्ट यथार्थ।
अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७३ जबकि शेष जगत् संवृत्तिसत्य१ है। प्रत्येक प्रकार के स्वभाव अथवा लक्षण इत्यादि से परे होने के कारण शून्यदशा अनिर्वाच्य है परन्तु इस पर पहुँचना ही सारी साधना का अन्तिम लक्ष्य है। इस सर्वशून्य भाव की अनुभूति को ही बौद्ध शब्दों में 'निर्वाण' की संज्ञा मिली है। महाप्रज्ञा से ऐसे निर्वाण की प्राप्ति सम्भव हो सकती है और उसके प्राप्त करने से ही पूर्णतया क्लेशों का क्षय हो जाता है। प्रसिद्ध बौद्धदार्शनिक और कवि अश्वघोष ने इस सर्वशून्यरूप निर्वाण को शान्ति का नाम दिया है। उसके मन्तव्यानुसार, जिस प्रकार २दीये की लौ बुझ जाने पर न भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती है प्रत्युत तेल का क्षय हो जाने पर केवल शान्त हो जाती है, उसी प्रकार योगी की आत्मा निर्वृति पर पहुँच कर न भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती है प्रत्युत क्लेशों का क्षय हो जाने से केवल शान्ति की अवस्था में लय हो जाती है। यदि शैव सिद्धान्त को मन में रखकर इन दोनों मतावलम्बियों के विचारों का अनु- शीलन किया जाये तो मस्तिष्क में कई बातें सहज ही में उभर आती हैं— अभावब्रह्मवाद के अनुसार यदि आत्मा का वास्तविक 'स्वरूप' अभाव मान कर उससे किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व का सिद्धान्त स्वीकारा जाये तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि अभावदशा में किसी भी वेदकसत्ता ( ज्ञान-क्रियात्मक अनुभवित्ता ) का अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव दशा का अनुभव कौन कर सकता है ? साथ ही 'अभाव' से यदि पदार्थों की असत्ता का अभिप्राय है तो ऐसे अभाव से भावरूप जगत् कैसे उदय में आ सकता है ? क्योंकि असत से सत् की उत्पत्ति होना न तो सम्भव है और न ऐसी कल्पना करना ही तर्क-संगत है। यदि यह माना जाये कि भावरूपता को जन्म देना और फिर उसको अभावरूपता में लय करना ही 'अभाव' का स्वभाव है तो ऐसे ३स्वभाव की विद्यमानता में उसको सर्वाभाव कैसे माना जा सकता है ? फलतः पहले अभाव का स्वरूप ही स्पष्ट नहीं हो जाता है। अभावसमाधि का उपदेश देनेवाले गुरुओं का कथन है कि तब तक अभाव की भावना अर्थात् 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ' इस प्रकार की भावना का अभ्यास करते रहना चाहिये जब तक आत्मा स्वयं भी अभावरूप ही बन जाये। इस विषय में यह बात विचारणीय है कि भावना का विषय वही वस्तु बन सकती है जिसकी स्वतः अखण्डित सत्ता विद्यमान हो। जब अभाव प्रत्येक भाव अर्थात् सत्ता का अनस्तित्व है तो वह भावना का विषय क्यों कर बन सकता है ? १. व्यवहार मात्र से कहा सुना जाने वाला यथार्थ। २. दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्। दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ (सौन्दरनन्द, १६.२८-२९) ३. नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥ ( भ० गी०, २.१७ )
७४ स्पन्दकारिका 'दूसरे पक्ष में यदि अभाव वास्तव में कोई भाव्य वस्तु ही है तो वह अभाव का भी अभाव होने के कारण स्वयं एक सत्ता ही बन जाता है। विशेष बात तो यह है कि अभावभावना का उप- देश देने वाला गुरु और उसको ग्रहण करने वाला शिष्य दोनों को इस बात की पूर्णचेतना होती है कि हमारी सत्ता विद्यमान है, हम चेतन हैं; हममें ज्ञान क्रिया रूप वेदकताभाव विद्यमान है परन्तु उनको 'मैं नहीं हूँ' की भावना करके अपने ही अस्तित्व का स्वयं अपलाप करना पड़ता है। फलतः उनके लिए 'अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः' वाली बात चरितार्थ हो जाती है। उनसे न तो अपनी सत्ता का अपलाप करते और न उसको स्वीकारते ही बनता है। अभाववादी दावा करते हैं कि अभावसमाधि में सर्वाभावरूप विश्वोच्छेद ही भावना का विषय बन जाता है। इस विषय में विचारणीय बात यह है कि यदि '२विश्वोच्छेद' का अर्थ प्रत्येक सत्ता का अभाव है तो अनुभवित्ता का भी स्वतः उच्छेद होने के कारण उस विश्वोच्छेद का अनुभव ही कौन करेगा ? विश्वोच्छेद दशा का अनुभव करने के तत्काल ही अनुभवित्ता का भी उच्छेद होगा क्योंकि विश्वोच्छेद (होने की निश्चित प्रक्रिया) में वह कोई अपवाद नहीं होगा। अब यदि यह माना जाये कि विश्व का उच्छेद होने पर भी अनुभवित्ता का उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र की कल्पना के समान ही होगी। साथ ही इस में एक और कठिनाई उपस्थित हो जाती है। वह यह कि विश्वोच्छेद की कल्पना करने में भावना का भी उच्छेद होना आवश्यक मानना पड़ेगा। भावना का उच्छेद मानने पर भी विश्वोच्छेद की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है क्योंकि स्वतः उच्छेद की कल्पना तो अवशिष्ट रहेगी ही। फिर यदि उच्छेद के उच्छेद की कल्पना की जाये तो उस उच्छेद के उच्छेद की कल्पनाओं का गोरखधन्धा कभी समाप्त ही नहीं होगा और परिणाम यही होगा कि सर्वाभाव कभी भी सिद्ध ही नहीं होगा। अनुभवित्ता की सत्ता तो किसी न किसी रूप में अवशिष्ट रहेगी ही। प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने अभाव-समाधि के विषय में एक विशेष प्रकार के दोष का उल्लेख किया है। वह यह कि अभावसमाधि, जिस रूप में अभावब्रह्मवादी इसको स्वीकारते हैं, वास्तव में मूढता, अर्थात् विशेष प्रकार की जड़ता, जिसमें किसी प्रकार की संवेदना नहीं रहती है, की अवस्था है क्योंकि इस समाधि का अभ्यास करने वाला योगी समाधि से उठने के अनन्तर उस समाधिकालीन दशा का स्मरण जैसा करता हुआ कहने लगता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़ता की अवस्था में पड़ा हुआ था और अब मेरी वह अवस्था बीत गई है।' जिस समाधि में अपने आप में अपने ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य का आभास न रहे वह समाधि यथार्थ समाधि की अवस्था नहीं, प्रत्युत मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यक्ति के १. भावनाया भाव्यवस्तुविषयत्वादभावस्य न किञ्चित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किञ्चित्त्वे सत्यभावत्वाभावात् । (स्प० नि०, १.१२) २. किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः, भावकाभ्युपगमे तु न विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् । (स्प० नि०, १.१२)
असद्ब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७५ नशे की जैसी मोहात्मक (तामसिक अचेतना) अवस्था ही कही जा सकती है। फिर ऐसी दशा में, साधारण प्राणियों में पायी जाने वाली तामसिक सुषुप्ति और योगी की समाधि में अन्तर ही क्या है ? माध्यमिक लोगों के शून्यवाद के सम्बन्ध में भी लगभग ऐसी ही बाधायें उपस्थित हो जाती हैं। उनके 'शून्य' का स्वरूप भी कुछ स्पष्ट नहीं है। वे लोग एक ओर किसी वेदक आत्मसत्ता को स्वीकारने के पक्ष में नहीं हैं परन्तु दूसरी ओर ज़ोर-ज़ोर से निर्वाण का ढोल पीटते रहते हैं। यदि आत्मा का कहीं अस्तित्व ही नहीं है तो निर्वाण किसका ? शरीर आदि जड पदार्थ तो निर्वाण का विषय नहीं बन सकते हैं। किसी आत्मरूप वेदकसत्ता के अनस्तित्व की दशा में क्लेश किसका और उसके क्षय के लिये संघर्ष करने का प्रयोजन ही क्या ? आखिर 'शून्य' कौन सी और कैसी वस्तु है ? यदि उसका रूप सर्वाभाव जैसा ही है तो उसकी अनुभूति और नामकरण किसके द्वारा और कैसे सम्भव हो सकता है ? इन लोगों के द्वारा बतलाई गई निर्वाण की परिभाषा भी कुछ स्पष्ट नहीं है। इन्होंने निर्वाण को शान्ति का नाम दिया है परन्तु इन्हीं के मन्तव्यानुसार उसका रूप भी शून्य ही है। फिर यदि निर्वाण भी कोई ऐसी अवस्था है जिसमें ज्ञातृता और कर्तृता का सर्वथा लोप हो जाता है तो वह शैवों को मान्य नहीं क्योंकि वे लोग ऐसी अवस्था को जड़ता के अतिरिक्त और कुछ मानने के पक्ष में नहीं हैं। शैव दार्शनिकों के अनुसार¹ मोक्ष कोई अलग अवस्था नहीं प्रत्युत 'स्वरूपख्याति' ही मोक्ष है। जब आत्मा अख्याति की सीमाओं से निकलकर अपनी असीम ज्ञातृता और असीम कर्तृता की अनुभूति प्राप्त कर लेती है तब वह मुक्तात्मा कही जाती है। स्पष्ट है कि मुक्तात्मा का रूप जड़ नहीं, प्रत्युत ज्ञान-क्रिया पर स्वतन्त्र अधिकार रखने वाला 'पूर्णचैतन्य' है। ²शून्यवादी दार्शनिक प्रत्येक प्रकार के ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय पदार्थों की निःस्वभावता अथवा शून्यता को स्वीकारते हुए ज्ञातृ-कर्तृरूप संवित् को भी निःस्वभाव ही मानते हैं। फलतः इनके मतानुसार संवित् की शून्यता ही निर्वाण है। शैव दार्शनिकों का इस सम्बन्ध में एक भिन्न दृष्टिकोण है। इनका विश्वास है कि वास्तव में संवित् का स्वरूप पूर्णज्ञातृता और पूर्णकर्तृतारूप स्पन्द है। इस स्पन्द या स्फुरणा से ही सारे नील, पीत इत्यादि भावों का अवभासन और स्थिति सम्भव हो सकती है। यदि इस विश्वात्मक स्फुरणा को ही नकारा जाये तो सारा विश्व प्रत्यक्षरूप में संज्ञी होने पर भी एकदम संज्ञाहीन मानना आवश्यक है। विश्व की संज्ञाहीनता तो कदापि देखने में नहीं आती है अतः इस ³स्फुरत्तारूप संवित् का अपलाप कदापि नहीं किया जा सकता है। १. मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः। स्वरूपं चात्मनः संविन्नान्यत्..................॥ (तं०, १.१५६) २. ते खलु सर्वभावानैः स्वाभाव्यवादिनः संविदोऽपि नैःस्वाभाव्यान्मिथ्यात्वमभिदधतस्तच्छू- न्यतायामेव मोक्षमाचक्षीरन्। (तं० वि०, १.३३) ३. संविदि तु स्फुरतामात्रसारायां मिथ्यात्वादसत्त्वमेव स्यात्, इति न किञ्चित्स्फुरेत्, इति मूर्च्छव स्यात् इति। न च संविदः स्फुरतामात्रसाररूपाया अपह्नवः शक्यक्रिय इति। (तं० वि०, १.३३)
७६ स्पन्दकारिका शून्यवादी बौद्धों ने प्रसिद्ध माध्यमिक आचार्य नागार्जुन की यह उक्ति— सर्वलम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥ प्रस्तुत करके इस बात का दावा किया है कि हमारे शून्य से ऐसी किसी दशा का अभिप्राय नहीं जिसको अन्य दार्शनिकों ने सर्वाभाव का नाम देकर कटु आलोचना का विषय बनाया है। वास्तव में हमारे शून्य से एक ऐसे निरपेक्ष परम-तत्त्व का अभिप्राय है जिसमें कल्पित आलम्बनधर्मों, सम्पूर्ण तत्त्वों और सारी क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता हो। वास्तव में उस शून्यतत्त्व का स्वरूप सर्वाभाव नहीं है। वह शून्यतत्त्व एक ऐसी अवस्था है जो १चतुष्कोटियों की अविषय, मन और वाणी से अगोचर और अनिर्वचनीय है। इस विषय में यह बात विचारणीय है कि यदि नागार्जुन की उक्ति के अनुसार 'शून्य' में केवल कल्पित ग्राह्य, ग्राहक आदि भावों की ही शून्यता है और ज्ञानरूपता की स्थिरता अटल रहती है तो फिर शून्यवाद में, बौद्धों की दूसरी शाखा २विज्ञानवाद के सिद्धान्त से बढ़कर और कौन सी नई बात कही गई है ? विज्ञानवादियों का मन्तव्य भी यही है कि यह ३सारा कल्पित जगत्-प्रपञ्च, वास्तव में, अन्तःकरणों का धर्म बने हुए ज्ञान, जिसको उनकी शब्दावली में 'विज्ञप्ति' कहते हैं, का विकासमात्र है। यह ज्ञान ही विचित्र रूपों को अवभा- सित करने वाला है परन्तु स्वयं, कल्पित तत्त्वादि का रूप धारण नहीं करता है। यह चेतन- क्रिया के साथ सम्बन्धित होने के कारण 'चित्त' कहलाता है और यही एक पारमार्थिक सत्य है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शून्यवादियों के 'शून्य' और विज्ञानवादियों के 'चित्त' में शाब्दिक भेद के अतिरिक्त कोई सैद्धान्तिक भेद नहीं है। जहाँ तक शैवों का सम्बन्ध है वे तो ज्ञान को चित्तरूप या अन्तःकरणरूप मानने के पक्ष में नहीं हैं। अन्तःकरण इन्द्रिय होने के कारण स्वतः जड़ हैं। ज्ञान सर्वस्वतन्त्र और चैतन्य होने के कारण उनका धर्म कैसे बन सकता है ? 'शून्य' की कल्पना के विषय में भी शैवों का दृष्टिकोण अन्य दार्शनिकों से नितरां भिन्न है। इनके कथनानुसार 'शून्य' शब्द से वास्तव में ४अशून्य अर्थात् चिदानन्दघन और १. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १५४-६२ । २. अथ 'सर्वलम्बनधमैश्च....................' इत्याद्युक्तयुक्त्या ग्राह्यग्राहकभावादिना कल्पितेन रूपेण शून्यं न तु संविदापि इति चेत्, एवं ह्युच्यमाने विज्ञानवादे एवाभ्युपगमः स्यात्' । (तं० वि०. १.३३) ३. इत्यन्तःकरणस्यैव विचित्रात्मावभासिनः । अविभाविततत्त्वस्य विस्फूर्जितमिदं जगत् ॥ (तं० १.३३ में उदाहृत) ४. अशून्यं शून्यमित्युक्तं शून्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुद्दिष्टो यत्र भावाः क्षयं गताः । सत्तामात्रं परं शान्तं तत्पदं किमपि स्थितम् ॥ (स्व० तं० ४.२९२-९३)
सूत्र:—उक्त कारणों से वह अभाव समाधि प्रतिसमय (साधारण पशुवर्ग की) सुषुप्ति
स्मर्यमाणता की असंगति ७७ सतत स्फुरणशील परमशिवतत्त्व ही अभिप्रेत है। उसको 'शून्य' की संज्ञा इसलिये दी गई है वह विश्वोत्तीर्ण रूप में, १माया का अविषय होने के कारण, उससे (माया से) जनित परिणामित्व इत्यादि धर्मों से शून्य है। उस तत्त्व का यह 'शून्य' अर्थात् विश्वोत्तीर्ण रूप ही कुछ ऐसा है जिसमें यह सारा इदंवाच्य प्रमेयमण्डल, उसी रूप में विश्रान्त होकर, अभिन्न 'अहं-रूप' में ही अवस्थित है। विश्वोत्तीर्ण दशा में इस नामरूपात्मक प्रमेयमण्डल का अलग भाव न होने का नाम ही 'अभाव' है और ऐसे ही अभाव का नाम 'शून्य' है। 'शून्य' ही एक महान् सत्ता है जो कि पूर्णज्ञानक्रियात्मक स्वातन्त्र्य होने के कारण प्रत्येक भाव या अभाव को सत्ता प्रदान कर देती है। इस पद में जिस कारण प्रत्येक प्रकार की भेदकल्पना विश्रान्त होती है उस कारण यह शान्त एवं अनिर्वाच्य है। यह शून्यतत्त्व एक अति अद्भुत एवं विलक्षण तत्त्व है क्योंकि वह शून्य होकर भी अशून्य है। इसका अभिप्राय यह कि (शून्यतत्त्व) विश्वोत्तीर्णता के अतिरिक्त, नाद, बिन्दु, भुवन, भाव इत्यादि रूपों में आभासमान विश्वमयता में भी, सुमन में वास की तरह, २व्याप्त होकर अवस्थित है। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह कि शैव आचार्यों के मतानुसार 'शून्य' सर्वाभाव न होकर, पूर्णवेदक अर्थात् स्वतन्त्र ज्ञान-क्रियात्मक प्रमातृसत्ता का अभिव्यञ्जक है। इस सारे पर्यालोचन का निष्कर्ष यही निकलता है कि शैव मान्यता के अनुसार व्युत्थान, समाधि, शून्य, अभाव इत्यादि सारी अवस्थाओं में अनुभवितारूप आत्मा की ज्ञान- क्रियात्मक स्पन्दना में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। फलतः सततस्पन्दमयी आत्मसत्ता के प्रत्यभिज्ञान की अवस्था न सर्वाभाव, न सर्वशून्यता और न मूढ़ता की ही अवस्था है ॥१२॥ [स्मर्यमाणता की असंगति] अब सूत्रकार अभावसमाधि को साधारण पशुवर्ग में पाई जाने वाली मोहात्मक सुषुप्ति (प्रगाढ़ निद्रा) जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की ही अवस्था सिद्ध करने के अभिप्राय से अलग सूत्र बतला देते हैं— अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥ अभावभावनालब्धभूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्यसन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशील- नीयम् ॥१३॥ अनुवाद सूत्र:—उक्त कारणों से वह अभाव समाधि प्रतिसमय (साधारण पशुवर्ग की) सुषुप्ति (तामसिक निद्रा) के समान कृत्रिम ही समझनी चाहिये। वह तत्त्व (स्पन्दतत्त्व = १. यत्तु अस्य शून्यत्वमुक्तं तन्मायाक्षयोपचारेण तद्धर्मैः परिणामित्वादिभिः शून्यत्वाच्छून्यम् । (तं० वि०, १.७६) २. यत्र यत्र च नादादि स्थूला अन्येऽपि संस्थिताः । तत्र तत्र परं शून्यं सर्वं व्याप्य व्यवस्थितम् ॥ (स्व० तं०, ४.२९४)
सूत्र का अभिप्राय अच्छी प्रकार समझाने के लिए यहाँ पर पहले 'सौषुप्तपद' के
७८ स्पन्दकारिका आत्मतत्त्व = स्वरूप) इस जड़समाधि की तरह कभी भी स्मर्यमाणता का विषय नहीं बन जाता है ॥१३॥ वृत्तिः-(मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ—इस प्रकार की) अभाव-भावना का अभ्यास करने से यदि योगी को ऐसी किसी भूमिका का साक्षात्कार हो भी जाये, वह अवस्था कृत्रिम अर्थात् अनित्य ही होती है। उसकी अनुभूति कुछ ऐसी ही होती हैं जैसी कि (जीवभाव की मोहात्मक) सुषुप्ति में होती है। इसका कारण यह कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप चित्- रूपता है और उसकी अवस्थिति सतत सन्निहित अर्थात् त्रिकालाबाधित (शाश्वतिक वर्तमान) ही है। प्रतिसमय गुरु के उपदेश पर कटिबद्ध रहकर उसी का (आत्मतत्त्व का) अनुशीलन करते रहना चाहिये ॥१३॥ विवरण सूत्र का अभिप्राय अच्छी प्रकार समझाने के लिए यहाँ पर पहले 'सौषुप्तपद' के विषय में दो शब्द कहना आवश्यक है। अनुग्रहमूर्ति भगवान् भूतनाथ ने स्वयं एक १सूत्र में साधारण पशुवर्ग और योगी-वर्ग की दृष्टि से सौषुप्तपद का निरूपण किया है। पशुवर्ग की सुषुप्ति—साधारण पशुभाव में सुषुप्ति प्रगाढ निद्रा की अवस्था होती है। इसमें तमोगुण से उद्भूत मोह की घनता के कारण वेद्यपदार्थों का प्रत्यक्ष ज्ञान या २स्मृति नहीं रहती है। इस अवस्था में अविवेक अर्थात् ३ज्ञानरूप और ज्ञेयरूप चित्शक्ति पर अख्याति का इतना मोटा आवरण छा जाता है कि अपनी चित्-रूपता और बाह्यरूप में अवभासमान भाववर्ग की, स्फुटतर रूप में, विवेचना का सामर्थ्य पूर्णतया रुक जाता है। भाव यह कि यह अवस्था मृत्यु की जडता जैसी होती है। सुषुप्ति काल तक ज्ञानज्ञेयरूप शक्ति पर ४मायीय आवरण पड़ा रहने के कारण, स्पष्टरूप में, न तो बाह्य अर्थों की ओर उन्मुखता, न उनका ऐन्द्रिय बोध और न उनकी स्मृति ही सम्भव हो सकती है। वास्तव में सुषुप्ति में पड़े हुए व्यक्ति की सारी चेतनाशक्ति शरीर, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय इत्यादि से सिमट कर पुर्यष्टक- प्रमातृभाव पर ही केन्द्रित हुई होती है। पुर्यष्टक पर लगे हुए सुषुप्तिकालीन संस्कारों के फलस्वरूप वह व्यक्ति, सुषुप्ति से निकलने के अनन्तर, तत्कालीन दशा को धुंधली स्मर्यमाणता के रूप में अभिव्यक्त कर लेता है। यथा—“मैं सुख से सोया था, मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है”। १. अविवेको मायासौषुप्तम्। (शिवसूत्र, १.१०) २. यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम् । (शिवसूत्र, १.१० टिप्पणी) ३. ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादासवेवाविमर्शतः । सैव मायावृत्तिजालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता । .... —— —सुषुप्तता ॥ (शिवसूत्रवा०, १.१०) ४. यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः, एतदेव मायारूपं मोहमयं सौषुप्तम् । (शिवसूत्रवि०, १.१०)
स्मर्यमाणता की असंगति ७९ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri स्मर्यमाण रूप में अभिव्यक्त किये जाने के कारण यह दशा कृत्रिम होती है। सच्ची आत्म-अनुभूति तो सतत उदीयमान होने के कारण कभी भी स्मर्यमाण नहीं बन सकती है। योगियों की दृष्टि में सुषुप्ति—पशुभाव की सुषुप्ति के प्रतिकूल योगियों की सुषुप्ति समाधि की अवस्था होती है। इसमें समाधिकाल तक बाह्य भाववर्ग की ओर उन्मुखता न रहने के कारण सब कुछ १स्वरूप में ही विश्रान्त हुआ होता है और फलतः योगी की आत्मा तब तक विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही अवस्थित रहती है। यही कारण है कि २समाधिनिष्ठ योगी को तावत्कालपर्यन्त ग्राह्यता और ग्राहकता के भेदभाव की चेतना नहीं रहती है, प्रत्युत उसको सारे भाव स्वात्मरूप में ही अवभासित होते हैं। योगी को समाधिकाल में निजी ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दना की पूर्ण चेतना रहती है अतः यह साधारण सुषुप्ति की तरह मूढ़ता की जैसी अवस्था कदापि नहीं होती है। वेदकता सम्पूर्ण रूप में अक्षुण्ण रहने के कारण इस काल में योगी को किसी प्रकार के अभाव या शून्यता की अनुभूति नहीं होती है। साथ ही अनुभवी गुरुओं का कथन है कि समाधिकाल में प्राप्त की हुई स्वरूप-अनुभूति त्रिकालाबाधित और सतत उदीयमान होती है। अतः ऐसी अवस्था न तो कृत्रिम और न अनित्य ही होती है। फलतः शैवगुरु अपनी यथार्थ अनुभूति के आधार पर यह उपदेश देते हैं कि अभाव- समाधि या शून्य-समाधि दोनों उपरिवर्णित पशुभाव की सुषुप्ति के समान जड़, कालपरिधि में संकुचित और कृत्रिम अवस्थायें हैं। जो भी कोई आध्यात्मिक अनुभूति, अनुभवकाल के अनन्तर, बीते हुए रूप में स्मरण की जाती है वह केवल भूतकाल के साथ सम्बन्धित होने के कारण कालकल्पना की परिधि में सीमित हो जाती है। कालकल्पना में सिमट जाने के साथ ही वह अनित्य बन जाती है। आत्म-अनुभूति तो सतत स्फुरणामय होने के कारण इससे बिल्कुल विपरीत है। वह तो अनुभव के समय और स्मृति के समय में भी एक ही उदीयमान रूप में अवभासमान रहती है। एक और बात ध्यान में रखने के योग्य है। वह यह कि अभाव या शून्य की भावना करनेवाले योगियों में जो यह अपनी विद्यमान सत्ता को—'मैं नहीं हूँ' कहकर आग्रहपूर्वक झुठलाने की प्रवृत्ति पाई जाती है वह तो, उनमें, चित्-रूपता के अभाव की नहीं; प्रत्युत सद्भाव की ही द्योतिका है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति घर के अन्दर बैठा हो और बाहर से कोई ऐसा व्यक्ति आकर उसको बुलाने लगे जिसके साथ उसको मिलने की इच्छा न हो, तो ऐसी स्थिति में यदि वह पहला व्यक्ति अन्दर से स्वयं ही चिल्लाने लगे— १. अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता। पत्युश्च'''' .... .... ''''॥ (शिवसूत्रवा०, १.१०) २. ग्राह्यग्राहकभेदसंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्, इत्यप्यनया वचोयुक्त्या दर्शितम्। (शिवसूत्रवि०, १.१०) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
सूत्र—( इस स्पन्दमार्ग में ) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की दो अवस्थाओं को कार्यता
८० स्पन्दकारिका 'जी, मैं यहाँ नहीं हूँ'—उसका ऐसा स्वरूप-अपलाप, सहज ही में, उसके वहाँ असद्भाव को नहीं, प्रत्युत सद्भाव को ही सिद्ध कर देता है। फलतः कौन व्यक्ति ऐसा मूर्ख होगा जो स्वयं चेतन होकर, अपने आपको ही अभाव- रूप या शून्यरूप समझने की गलती करे ॥१३॥ [कर्तृता की अनश्वरता] स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की, वेदकरूप और वेद्यरूप दो अवस्थायें हैं। इनको शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः कर्तृता और कार्यता अथवा भोक्तृता और भोग्यता कहते हैं। इनमें से कर्तृतारूप अवस्था ही आत्मा का वास्तविक रूप है। कार्यता उसके द्वारा स्वयं अङ्गीकृत कृत्रिमरूप है। यही कारण है कि पहली अवस्था अनश्वर और दूसरी नश्वर है। अगले सूत्र में चित्तत्त्व की इन्हीं दो अवस्थाओं पर प्रकाश डाला जा रहा है :— अवस्थायुगलं चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥ अवस्थायुगलम्, अवस्थाद्वयमेव कार्यकार्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्, तत्र यो भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च; भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचिद् विनश्यति तेन नित्यः ॥ १४ ॥ अनुवाद सूत्र—( इस स्पन्दमार्ग में ) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की दो अवस्थाओं को कार्यता और कर्तृत्व ( कर्तृता ) इन दो शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है। इनमें से कार्यता नश्वर है परन्तु कर्तृत्व कभी नष्ट नहीं होता है ।। १४ ।। वृत्ति—( स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की ) दो अवस्थायें हैं। इन दो अवस्थाओं को कार्यता और कर्तृत्व ( कर्तृता ) नाम दिया गया है। इनमें भेद यह है कि एक भोग्य है दूसरी भोक्ता है। इनमें से जो 'भोग्य' नामवाला भेद है वह उत्पन्न भी होता है और नष्ट भी होता है। परन्तु 'भोक्ता' नामवाला भेद मात्र चित्-रूप होने के कारण न तो उत्पन्न ही होता है और न कभी नष्ट ही होता है। अतः वह नित्य है ।। १४ ।। विवरण पहले भी शैवदर्शन के इस सिद्धान्त का उल्लेख किया जा चुका है कि अहंदविमर्शात्मक स्पन्दतत्त्व, स्वतन्त्र होने के कारण, प्रतिसमय दो प्रकार की अवस्थाओं में स्पन्दायमान रहता है। इनमें पहली सामान्य-अवस्था और दूसरी विशेष-अवस्था है। सामान्य-अवस्था किसी भी प्रकार के उपराग से रहित और विशुद्ध चिद्रूपता की अवस्था है। इसमें बाह्य प्रमेयवर्ग विभागहीन अहंविमर्श के रूप में ही अवस्थित रहता है। प्रस्तुत सूत्र में इसी अवस्था को कर्तृत्व की अवस्था का नाम दिया गया है। दूसरी विशेष-अवस्था वह अवस्था है जिसमें मौलिक चित्- रूपता, स्वयं उत्पादित अख्याति के द्वारा, अपने ही वास्तविक रूप को आच्छादित करके, देह, प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां, अथवा घट, पट इत्यादि अनन्त एवं विचित्र जड़ वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासमान है। इस अवस्था को प्रस्तुत सूत्र में कार्यता की अवस्था का नाम
सूत्र-( समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि बहिर्मुखीन कार्यता के प्रति
समाधि में मात्र कार्यता का लोप ८१ दिया गया है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने कहा है कि मौलिक तत्त्व अपने स्वातन्त्र्य से प्रति- समय ^१आवरणरहित अर्थात् वेदक और आवरण-सहित अर्थात् वेद्य के रूप में स्वयं अवभासमान है। वह तत्त्व युगपत् ही कर्तृता की अवस्था और कार्यता की अवस्था भी है पहले रूप में अपरिणामी, अविचल और अनश्वर और दूसरे रूप में परिणामी, चल और नश्वर। अनुभवी शैवगुरुओं ने तुरीयारूप शाक्तभूमिका का यथार्थ अनुभव प्राप्त करके इस बात को स्पष्ट किया है कि शाक्त के 'कर्तृत्व' अंश में, किसी भी दशा में, कोई परिवर्तन नहीं होता है। वेदकता का भाव, शाश्वतरूप में, अटल एवं अक्षुण्ण है क्योंकि यही शक्ति का वास्त- विक रूप है। 'कार्यता' अंश में देश, काल एवं आकार के भेद के अनुसार उतार-चढ़ाव अथवा उदय एवं अस्त होते ही रहते हैं। समाधि की अवस्था में कार्यता का क्षय हो जाता है। इसका वास्तविक अभिप्राय यह है कि कार्यता संहृत होकर कर्तृता में ही विश्रान्त हो जाती है और वह अपने विशुद्ध ज्ञानक्रियात्मक चित्-रूप में अवभासमान रहती है ॥ १४ ॥ [ समाधि में मात्र कार्यता का लोप ] समाधिकाल में सतत स्पन्दमयी कर्तृता ( वेदकता ) बाह्य प्रमेयवर्ग की ओर उन्मुख न होने के कारण, अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में अवस्थित रहती है। ऐसी अवस्था में ^२सुप्रबुद्ध योगीजन ही उस चिन्मात्र रूपता को पहचानने में समर्थ होते हैं। अभाव की भावना करने वाले योगी वास्तव में अबुद्ध होते हैं अतः समाधि- काल में कार्यता अंश के विलीन होते ही उनको ऐसा लगता है कि हम अभाव में हो गये। अगले सूत्र में इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है :- कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥ कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये 'स्वभावो मे विलुप्त'-इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोऽस्ति ॥ १५ ॥ अनुवाद सूत्र-( समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि बहिर्मुखीन कार्यता के प्रति उन्मुखता रूप प्रयत्न लुप्त हो जाता है। उसके लुप्त हो जाने पर अबुध योगी को ऐसा लगता है कि-'मैं स्वयं भी लुप्त हो गया हूँ अर्थात् अभाव में ही हो गया हूँ' ॥ १५ ॥ वृत्ति-(समाधि-काल में ) केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने का सामर्थ्य, जिसका बाह्य इन्द्रियों का, अपने शब्द स्पर्श इत्यादि विषयों को ग्रहण करने का व्यापार होता है, लुप्त हो जाता है। बाह्य इन्द्रियों के विरत हो जाने की दशा में; विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य लुप्त हो जाने पर, अबुध योगी ऐसा समझ लेता है कि-'मेरे स्वभाव का ही लोप १. 'निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः ।' (तं० १.९३) २. आगे, सूत्र १७ की विवृत्ति देख लें। ६