भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

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क्षेमराजकृत शिवसूत्रविमर्शिनी ५९ देखने की अभिलाषा का उदय होना अपूर्णता की अनुभूति नहीं तो और क्या हो सकती है ? यह अपूर्णता की अनुभूति आणव, मायीय और कार्म इन तीन रूपों में अभिव्यक्त होती है जिनको शैव शब्दों में मलत्रय कहते हैं। अनुग्रहमूर्ति भगवान् आशुतोष ने स्वयं ही श्रीमालिनीविजय-तन्त्र के दो सूत्रों में इन तीन मलों के स्वरूप का विश्लेषण किया है जो इस प्रकार है :— 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति१ संसाराङ्कुरकारणम् ॥१॥ 'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुःखादिलक्षणम्' ॥२॥ इसका अभिप्राय यह है कि अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान ही मूलभूत आणवमल है। यह आणवमल, संसार अर्थात् मायीयमल के, अङ्कुर अर्थात् कारणभूत कार्ममल का भी कारण है। भाव यह कि आणवमल से कार्ममल और कार्ममल से मायीयमल का विकास हो जाता है। आणवमल का रूप२ अज्ञान, कार्ममल का रूप हेय एवं उपादेय कर्मों का ३पचडा और मायीय मल का रूप शुभ अथवा अशुभ कर्मों की वासनाओं से जनित सुख दुःख, जन्म, मरण इत्यादि का ४भोग है। आणवमल के विषय में शास्त्रकारों का कथन है कि स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् संकोच दो रूपों में अभिव्यक्त होता है।— (१) ५बोध में स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् ६चिन्मय स्वरूप की पूर्णज्ञातृता का संकोच; (२) ७स्वातन्त्र्य का अबोध अर्थात् ८पूर्णकर्तृता को बोधरूपता से भिन्न समझने का मिथ्याभिमान । यहाँ पर यह नहीं समझना चाहिये कि ये दो अलग-अलग मल हैं, प्रत्युत दोनों रूपों में स्वातन्त्र्य की अख्याति होने के कारण वास्तव में एक ही मल के दो रूप हैं। प्रस्तुत सूत्र (निजाशुद्ध्या इत्यादि) में भी सूत्रकार ने इसी मलत्रय की ओर संकेत करते हुए कहा है कि पतिप्रमाता ने अपने स्वातन्त्र्य से, स्वयं ही, एक प्रकार की अशुद्धि (आणवमल) उत्पन्न की है जिसके द्वारा वह स्वयं शक्तिदरिद्र होकर, संसारी शुभाशुभ कर्मों १. 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति' इसमें 'इच्छन्ति' शब्द का अर्थ 'कहते हैं' हैं। २. मलम्ज्ञानमिच्छन्ति । (मा० वि०, १.२३) ३. धर्माधर्मात्मकं कर्म । (तत्रैव) ४. सुखदुःखादिलक्षणम् । (तत्रैव) ५. स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य । (ई० प्र०, ३.२.४) ६. बोधस्य चिन्मात्रस्य स्वातंत्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः एकः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४)—भास्करी ७. स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । (ई० प्र०, ३.२.४) ८. स्वातन्त्र्यस्य कर्तृत्वस्य अबोधता बोधव्यतिरिक्ताभिमानः द्वितीयः प्रकारः। (ई० प्र०, ३.२.४-भास्करी) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal