भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

५८ स्पन्दकारिका रूप है । स्पन्दात्मक शिव में सारा जगत् अभेदरूप में अवस्थित है और सारा जगत् ही शिव का प्रसार है । ऐसी ही चितिकर्तृ'तारूप स्वातन्त्र्य की गति में कहीं कोई अड़चन खड़ी नहीं हो सकती है और यही कारण है कि विश्वात्मा स्वयं उत्पादित अशुद्धि के द्वारा अपने ही स्वरूप को भागशः आवृत करके संसारी जीव का और पूरा आवृत करके सारे जडवर्ग का रूप धारण करके अवस्थित है । स्वातन्त्र्य तो आखिर स्वातन्त्र्य ही है । वह स्वयं ही कभी अर्धस्वतन्त्र या अस्वतन्त्र भी बन सकता है । यदि न बन सकता तो पूर्णस्वातन्त्र्य ही नहीं कहलाता । अशुद्धि—शैवशास्त्रों में अशुद्धि, अख्याति, मल अथवा बन्ध इत्यादि कतिपय शब्दों से वास्तविक स्वतन्त्र स्वरूप के अज्ञान का अर्थ लिया जाता है । स्वरूप का अज्ञान ही एक ऐसी महान् अशुद्धि है जिसने विश्वात्मा को भी विश्वात्मभाव से गिरा कर पशुभाव के चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है। इस अज्ञान के स्वरूप के विषय में भगवान् चन्द्रमौलि ने—'ज्ञान बन्धः' [शिवसूत्र १-२] इस सूत्र में यह निर्णय दिया है कि, 'अज्ञान' का अभिप्राय सर्वथा ज्ञानाभाव नहीं, अपितु वास्तविक स्वरूप का अपूर्णज्ञान है । १अज्ञान तिमिर (एक प्रकार का आँखों का रोग) है जो कि स्वरूपगोपन अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाने अर्थात् विस्मृत करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इस स्वात्मविस्मृतिरूप अज्ञान के विषय में आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा । यहाँ पर संक्षेप में इसके विकास एवं प्रसार की प्रक्रिया के साथ सम्बन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया जायेगा । ऊपर कहा गया है कि परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सतत उदीयमान होने के कारण प्रतिसमय पांच रूपों में स्पन्दनशील है जिनको चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहते हैं । इन्हीं को दूसरे शब्दों में क्रमशः सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व और व्यापकत्व भी कहते हैं । वह अनुत्तरतत्त्व इसी शक्तिपञ्चक के द्वारा प्रतिसमय विश्वरूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच विराट् कृत्यों को करता रहता है । विश्वरूप में प्रसृत अथवा अवभासित होना तो चैतन्य का स्वभाव ही है क्योंकि उसमें आनन्द की प्रधानता है । संसारभाव का अवभासन करने की ओर उन्मुख हो जाने पर वह चैतन्य-तत्त्व स्वतन्त्रता से अपनी अभेदव्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति को ग्रहण करता है । इसका अभिप्राय यह कि यद्यपि सारा विश्व उस अखण्ड स्वातन्त्र्यसागर में भेदरहित 'अहं' रूप में अवस्थित ही है तथापि उसमें इसको स्वरूप से भिन्न 'इदं' रूप में अवभासित करने की सूक्ष्म स्फुरणामयी अभिलाषा भी उस स्वरूप-स्वातन्त्र्य से ही उदित हो जाती है । इसप्रकार की अभिलाषा का उदित होना ही स्वरूप में अपूर्णता की प्राथमिक अनुभूति अर्थात् सब से पहला मल है क्योंकि जब सारी विश्वकल्पना स्वरूप में शाश्वत रूप में अवस्थित ही है तो उसको अपने से भेद में १. अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्रसमुल्लसितस्वरूपगोपनामात्रसतत्त्वम्.... (तं० वि० १.२३)