स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंमोक्ष की शक्ति और सानन्द की उपलब्धि ५७ 'चेतन' और 'चैतन्य' का मूल शब्द 'चिति' है। इस 'चिति' शब्द का अर्थ चेतने की क्रिया है। यह चेतने की क्रिया संसार के प्रत्येक ग्राहक में सर्वसाधारण रूप में विद्यमान है। यदि^२ सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो सारे तथाकथित जड पदार्थों में भी इसका सद्भाव पाया जाता है। चेतने वाले को चेतन कहा जाता है अर्थात् जो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी वस्तु को जान सके या कर सके। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु फिर भी एक संसारी ग्राहक और विश्वात्मा के चेतने में क्या भेद है ? यदि कोई भेद नहीं है तो पूर्ण-स्वातन्त्र्य नहीं कहा जा सकता है। अतः^३ शैव दार्शनिकों ने इसकी भाववाचक संज्ञा बनाकर यह अभिप्राय निकाला है कि विश्वात्मकरूप में ज्ञानक्रियामयी चेतने की क्रिया का पूर्ण अधिकारात्मक और अनन्य- मुखापेक्षी कर्तृत्व ही पूर्ण स्वातन्त्र्य अथवा पारमेश्वर ऐश्वर्य है। यह कर्तृत्व अथवा स्वातन्त्र्य ऐसा है कि शाश्वतरूप में सत्तावान् होकर किसी भी देश, काल इत्यादि की संकुचित परिधि में सीमित नहीं है। विश्वात्मा प्रत्येक समय प्रत्येक बात को जानने या करने में स्वतन्त्र है फलतः^४ 'चैतन्य' शब्द से केवल और केवल ज्ञातृता-कर्तृता-रूप स्वातन्त्र्य को अभिव्यक्त किया गया है और यही स्वातन्त्र्य शाश्वत स्पन्दमय पतिप्रमाता का वास्तविक स्वरूप और सारे विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा चिन्त्यमान पदार्थवर्ग का आधार एवं अन्तिम विश्रान्तिस्थान भी है। इसी स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में सतत स्पन्दमयी-संवित् भी कहते हैं। इस विषय के अधिक स्पष्टीकरण के लिए पूर्वोक्त ज्ञानक्रियात्मक चितिक्रिया के स्वरूप को भी समझना आवश्यक है। जैसा पहले सूत्र के विवरण में भी स्पष्ट किया गया है कि चितिक्रिया का स्वरूप चलना, पकाना इत्यादि स्थूल क्रियाओं का जैसा नहीं अपितु आन्तर अनुसंधानात्मक अथवा मात्र संकल्पात्मक गतिमयता ही है जिसको शास्त्रीय शब्दों में अहं^५ प्रत्यवमर्शात्मक सामान्यस्पन्द कहते हैं। यह विमर्शात्मकता ही इसका एक अविच्छेद्य स्वभाव है जो इसको ^६जड़ से पृथक् करता है। ज्ञान और क्रिया अथवा प्रकाश और विमर्श दो अलग पदार्थ नहीं अपितु एक ही चितिशक्ति की द्विमुखी स्पन्दात्मकता के द्योतक हैं। क्रिया, ज्ञान की ही पल्लवित दशा है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्वरूप है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि प्रकाश अर्थात् शिव ही बहिर्मुखदशा में विमर्श अर्थात् शक्ति ही अन्तर्मुख दशा में प्रकाश अर्थात् शिव है। 'अहं' ही 'इदं' का बीजरूप और 'इदं' ही 'अहं' का विकसित १. 'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा' (शि० सू० वि०, १. १) २. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के १. १. ३ सूत्र पर भास्कराचार्य की टीका, (भास्करी, प्रथमभाग, पृष्ठ ६५) ३. चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियासम्बन्धमयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्। (शि० सू० वि०, १. १) ४. 'चैतन्यमिति भावन्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम्। अनाक्षिप्तविशेषं सदाह सूत्रे पुरातने। (तं०, १. २८) ५. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा। (ई० प्र०, १.५.१३) ६. तेन जडात् स हि विलक्षणः। (ई० प्र०, १. ५-१२)