श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) “परमार्थस्त्वयमेवैकः” इत्याद्यपि न कृत्स्नस्यापारमार्थ्यं- वदति। अपितु कृत्स्नस्य तदात्मकतया तद्व्यतिरेकेणावस्थितस्य अपारमार्थ्यम्। तदेवोपपादयति-“तवैव महिमा येन व्याप्तमेतच्च- राचरम्” इति। येन त्वयेदम् चराचरं व्याप्तं, अतस्त्वदात्मकमेवेदं सर्वमिति त्वदन्यः कोऽपि नास्ति। अतः सर्वात्मकतया त्वमेवैकः परमार्थः। अत इदमुच्यते--तवैष महिमा, या सर्वव्याप्तिः इति। अन्यथा तवैषा भ्रांतिरिति वक्तव्यम्। जगतः पते त्वमित्यादीनां पदानां लक्षणा न स्यात्। लीलया महीमुद्धरतो भगवतो महावराह- स्य स्तुतिप्रकरणविरोधश्च। यतःकृत्स्नं जगत् ज्ञानात्मना त्वया- ऽत्मतया व्याप्तत्वेन तव मूर्त्तम्। तस्मात्त्वदात्मकत्वानुभवसाधन- योगविरहिण एतत् केवलदेवमनुष्यादिरूपमितिभ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ती- त्याह “यदेतद्दृश्यते” इति। “एक मात्र आप ही परमार्थ हैं” इत्यादि श्लोक भी समस्त जगत् को असत्य नहीं बतलाता। अपितु समस्त जगत् ब्रह्मात्मक है, इस तादात्म्य भाव को छोड़ने से ही मिथ्या प्रतीति होती है इसी बात का उपपादन करता है। “हे प्रभु ! आप की ही महिमा समस्त चराचर में व्याप्त है”- अर्थात् आप से यह चराचर व्याप्त है। इसीलिए यह सब कुछ त्वदात्मक है। आपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सर्वात्मक होने से एक आप ही सत्य हैं। इसी लिए यह कहा गया कि-तुम्हारी ही यह महिमा है जिससे सब जगत् व्याप्त है। यदि श्लोक का उक्त तात्पर्य न होता तो; उक्त बात (तवैष सर्वव्याप्ति) के बजाय “तवैषा भ्रांति” (यह तुम्हारी भ्रांति) ही कहा जाता। ‘जगत्पते त्वम्’ इत्यादि पदों का लाक्षणिक अर्थ नहीं किया जा सकता, वैसा करने से, लीला ही लीला में पृथिवी को उठाने वाले भगवान महावाराह की स्तुति का सारा प्रकरण ही विरुद्ध सिद्ध होगा। “यदेतद् दृश्यते” का तात्पर्य है कि-सारा जगत् ज्ञानात्मक आप से, आत्मभाव रूप से व्याप्त है, अतएव आपका ही मूर्त्त रूप है, आपके त्वदात्मकभाव की अनुभूति का साधन एकमात्र भक्ति योग है। भक्ति