भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 193

( १३३ ) भाव हीन व्यक्ति ही इस जगत् को केवल देवमनुष्यादि रूप वाला देखते हैं। उनका ऐसा ज्ञान भ्रांति मात्र है। न केवलं वस्तुतस्त्वदात्मकं जगदेव देवमनुष्याद्यात्मकमिति दर्शनमेव भ्रमः; ज्ञानाकाराणामात्मनां देवमनुष्याद्यर्थाकारत्व दर्शनमपि भ्रम इत्याह “ज्ञानस्वरूपमखिलम्” इति। केवल ब्रह्मात्मक जगत् को देव मनुष्य आदि वाला जानना ही भ्रम नहीं है, अपितु देव मनुष्य आदि के ज्ञानात्मक आत्माओं को देव मनुष्य ही के आत्मा के रूप में देखना भी भ्रम है; इस भाव को “यह सब कुछ ज्ञान स्वरूप है” इस श्लोक में दिखलाया गया है। ये पुनर्बुद्धिमन्तो ज्ञानस्वरूपात्मविदः सर्वस्य भगवदात्मकत्वा- नुभवसाधनयोग्यपरिशुद्धमनश्च, ते देव मनुष्यादिप्रकृति- परिणामविशेषशरीररूपमिदम् अखिलं जगत् शरीरातिरिक्त ज्ञानस्वरूपात्मकं त्वच्छरीरं च पश्यन्ति इत्याह “ये तु ज्ञानविदः” इति। अन्यथा श्लोकानां पौनरुक्त्यं, पदानां लक्षणा, अर्थविरोधः, प्रकरणविरोधः, शास्त्रतात्पर्यविरोधश्च। और जो लोग सद्बुद्धि, ज्ञानमय आत्मतत्त्व के ज्ञाता तथा जगत् को भगवद्भाव में देखने के लिए भक्ति योग की साधना में संलग्न और शुद्धचित्त हैं, वे प्राकृत परिणाम देव मनुष्य आदि शरीर रूप समस्त जगत् को ज्ञानस्वरूप परमात्मा के शरीर के रूप में ही दर्शन करते हैं— ऐसा “जो ज्ञानविद् हैं” इत्यादि श्लोक का तात्पर्य है। श्लोकों का अर्थ उक्त क्रम से न करने से, पुनरुक्त दोष, अर्थ-विरोध, प्रकरण-विरोध, तथा शास्त्रतात्पर्य-विरोध होगा, साथ ही पदों का लाक्षणिक अर्थ करना पड़ेगा। “तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकमयम्” इत्यत्र सर्वेष्वात्मसु ज्ञानैकाकारतया समानेषु सत्सु देवमनुष्यादि प्रकृतिपरिणाम विशेष

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक) · पृष्ठ 193, कुल 696 में से · BharatKosha