श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरूपपिण्डसंसर्गकृतमात्मसु देवाद्याकारेण द्वैतदर्शनमतथ्यं इत्युच्यते पिण्डगतमात्मगतमपि द्वैतं न प्रतिषिध्यते । देवमनुष्यादिविविध- विचित्रपिण्डेषु वर्त्तमानं सर्वमात्मवस्तु सममित्यर्थः । यच्चोक्तं भगवता "शुनिचैवश्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः"—"निर्दोषं हि समम् ब्रह्म" इत्यादिषु; "तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽपि" इति देहातिरिक्ते वस्तुनि स्वपरविभागस्योक्तत्वात् । "वह दूसरे शरीरो मे आत्मरूप से व्याप्त होते हुए भी एक है" इस वाक्य का तात्पर्य है कि—सभी आत्माओं में ज्ञानैकाकार रूप से वह ब्रह्म समान भाव से व्याप्त है, फिर भी, प्राकृत परिणाम देव मनुष्य आदि विविध विचित्र देहो को जो लोग ब्रह्म से पृथक देखते हैं, वह उनका मिथ्या ज्ञान है। यहाँ पिण्डगत और आत्मगत भेद का प्रतिषेध नही किया गया है। देव मनुष्य आदि विविध विचित्र शरीरों में वर्त्तमान सभी आत्माए समान है, जैसा कि-भगवान् कृष्ण ने गीता मे कहा भी है "आत्म तत्त्वज्ञ, कुत्ता और चाण्डाल में समदृष्टि रखते है" ब्रह्म निर्दोष और सर्वत्र समान है " इत्यादि । "तस्यात्मपरदेहेषुसतोऽपि" इस वाक्य मे देह से अतिरिक्त आत्म वस्तु मे स्व पर विभाग दिखलाया गया है । "यद्यन्योऽस्तिपरः कोऽपि" इत्यत्रापि नात्मैक्यं प्रतीयते, यदि- मत्तः परः कोऽपि अन्यः इति एकस्मिन्नर्थे पर शब्दान्यशब्दयोः प्रयो- गायोगात् तत्र परशब्दः स्वव्यतिरिक्तात्मवचनः । अन्यशब्दः तस्यापि ज्ञानैकाकारत्वादन्यकारत्व प्रतिषेधार्थः । एतदुक्तंभवति—यदिमद्- व्यतिरिक्तः कोऽप्यात्मा मदाकारभूतज्ञानाकारादन्याकारोऽस्ति, तदा- ऽहमेवमाकारः, अन्यंच अन्यादृशाकारः, इति शक्यते व्यपदेष्टुम्, न चैवमस्ति; सर्वेषाम् ज्ञानैकाकारत्वेन समानत्वादेवेति । "यदि कोई दूसरी अन्य वस्तु भी है" इस वाक्य से भी आत्मैक्य प्रतीति नहीं होती 'यदि मुझसे अतिरिक्त कोई अन्य है," इसकथन में