श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभिचाकशीति”—“ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहांप्रविष्टौ परमे परार्ध्ये, छाया तपौ ब्रह्मविदो वदंति पंचाग्नयो येच त्रिणाचिकेताः” —“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” इत्याद्याः । अस्मि- न्नपि शास्त्रे “ससर्वभूतं प्रकृतिं विकारान् गुणादि दोषश्च मुने व्यतीतः, अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनाऽस्तृतं यद्भुवनान्तराले” —“समस्त कल्याण गुणात्मकोऽसौ”—“परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादयस्संति परावरेशे”—“अविद्या कर्म संज्ञाऽन्या तृतीया शक्ति- रिष्यते, ययाक्षेत्रज्ञ शक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा” इति भेदव्यपदे- शात् । “उभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते”—“भेदव्यपदेशाच्चान्यः” —“अधिकंतुभेद निर्देशात्” इत्यादि सूत्रेषु च । “य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा नवेद, यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति “प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तः”—“प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः” इत्यादिभिः उभयोरन्योन्यप्रत्यनीकाकारेण स्वरूप निर्णयात् ।
“विभेदजनके ज्ञाने” इत्यादि वाक्य भी जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का प्रतिपादक नहीं है । और न जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का उक्त कथनानुसार निषेध ही होता है । जीवात्मा परमात्मा की स्वरूपगत एकता देह और आत्मा की तरह नहीं हो सकती । श्रुति का भी उक्त मत है—“दो पक्षी एक वृक्ष पर बैठे हैं, जो कि सहचर सखा हैं, उनमें से एक (जीव) परिपक्व (भोग के उपयुक्त) पिप्पल (कर्म) फल का भोग करता है, और दूसरा (परमात्मा) भोग नहीं करता केवल देखता (साक्षी) मात्र है ।” ब्रह्मविद और पंचाग्नि साधक लोग तथा तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करने वालों ने कहा है कि-इस लोक (देह) में पुण्य फल भोक्ता छाया और आतप के समान दो स्वरूप (जीवात्मा और परमात्मा) बुद्धि रूप उत्तम गुहा में स्थित हैं । “वह सर्वात्मक सभी के अन्तःकरण में स्थित होकर शासन करता है ।” इत्यादि । और शास्त्र (विष्णुपुराण) में भी इसी प्रकार का उपदेश है—“वह (परमात्मा) समस्त भूतों के उपादान प्रकृति और उसके