भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १४२ ) भावनाओं से रहित आत्मा भी उसी प्रकार प्रापणीय है।' परब्रह्म के ध्यान से जीवात्मा परब्रह्म के समान समस्त भावनाओं से शून्य हो जाता है। भावनाये तीन प्रकार की है, कर्मभावना (शुभाशुभ संस्कार) ब्रह्म भावना तथा कमब्रह्म उभयभावना। इन तीनो प्रकार की भावनाओं से रहित होना ही अभिधेय है। ऐसी स्थिति की प्राप्ति को बतलाकर “क्षेत्रज्ञ जीवात्मा करणी (उपासक) तथा उपासना करण (उपास) है, इसके द्वारा मुक्ति कार्य का संपादन कर कृतकृत्य होना चाहिए।” इस वाक्य मे परब्रह्म ध्यान रूप करण से पूर्वोक्त भावनात्रय रहित आत्म- स्वरूप प्राप्ति की कृतार्थता बतलाई गई है। सिद्ध किया गया है कि- जब तक फल सिद्धि न हो जाय तब तक अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। इसके बाद-“तद्भाव को प्राप्त यह उपासक, परमात्मा के साथ अभिन्न हो जाता है, उस स्थिति मे अज्ञान कृत भेद भी रहता है।” इस वाक्य मे मुक्तात्मा का स्वरूप बतलाया गया है तद्भाव का तात्पर्य है, ब्रह्म का भाव अर्थात् स्वभाव। तद्भाव का तात्पर्य स्वरूपैक्य नहीं है। “तद्भावभावभापन्नः” इस वाक्य में द्वितीय भाव शब्द का उक्त प्रकार का अन्वय नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त अर्थ से विरुद्ध होगा। ब्रह्म की जैसी समस्त भावना रहित स्थिति रहती है वैसे ही मोक्षावस्था में जीवात्मा की भी हो जाती है, यही तद्भावभावापत्ति का तात्पर्य है। जीवात्मा उस स्थिति को प्राप्त कर ही परमात्मा के साथ अभिन्न हो पाता है, अर्थात् भेद भाव रहित हो जाता है। मुक्तपुरुष एक मात्र ज्ञानमय आकार प्राप्त कर ही परमात्मा के आकार का होता है, फिर भी देव मनुष्यादि रूप से उसका भेद रहता है उसकी यह भेदावस्था कर्ममय अज्ञान जन्य होती है, स्वरूपतः नहीं होती। जिस समय परब्रह्म के ध्यान से, भेद- कारक अज्ञानरूपी कर्म विनष्ट हो जाता है, उस समय कारण के अभाव से, कार्यरूप देव आदि भेद भी लुप्त हो जाते हैं। वही अभेदरूपता की स्थिति होती है। जैसा कि कहते हैं-“आत्मा स्वरूपतः एक है, केवल वाह्य देहादिकृत कर्ममय आवरण से आवृत्त होने से उसका भेद होता है, देवादि भेदों के नष्ट हो जाने पर आभ्यन्तर आवरण भी नष्ट हो जाता है।” एतदेव विवृणोति-“विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते, आत्मनो ब्रह्मणोभेदमसन्तं कः करिष्यति “इति। विभेदः विविधो ankurnagpal108@gmail.com