श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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जगत्” इति। अतः शास्त्रेषु न निर्विशेष वस्तुप्रतिपादनमस्ति। नाप्यर्थजातस्य भ्रांतत्वप्रतिपादनम्। नापि चिदचिदीश्वराणां स्वरू- पभेद निषेधः। “क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो” इस भगवद् वाक्य में अन्तर्यामी रूप से परमात्मा के सर्वात्म भाव ऐक्य को बतलाया गया है; यदि ऐसा नहीं मानेगे तो, “सभी भूतों को क्षर, कूटस्थ आत्मा को अक्षर तथा इनसे भिन्न श्रेष्ठ उत्तम पुरुषोत्तम है “इत्यादि वाक्य से विरुद्ध होगा। अन्तर्यामी रूप से सभी की आत्मता को गीता मे स्वयं भगवान् ने स्वीकारा है- “अर्जुन ! समस्त प्राणियो के अन्तः करण में ईश्वर विराजमान है “सभी के अन्तः करणों में, मै प्रविष्ट हूँ “इत्यादि ।” गुडाकेश! समस्त प्राणियो के अन्तःकरण में स्थित मैं आत्मा हूँ” इत्यादि में भी वही बात कही गई है। भूत शब्द आत्मा के देह तक सभी का द्योतक है। जैसे परमात्मा सभी के अन्तर्यामी आत्मा है, उसी प्रकार सारा ही भूतवर्ग उनका शरीर स्थानीय है ,इसलिए समस्त भूतों से उनकी पृथक्ता का निषेध किया गया है। “जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे परमात्मा से भिन्न कहा जा सके” यह भगवद् विभूति के उपसंहार का वाक्य है, अतः इसे ही प्रकरण का तात्पर्य मानना चाहिए। इस पर ही कहा गया कि-“जो जो विभूतिमान तथा अलौकिक प्रभा संपन्न हैं ,उन्हें मेरे तेजांश से ही प्रकट समझो, एक अंश से मै ही सारे जगत मे व्याप्त हूँ ।” इत्यादि से ज्ञात होता है कि- शास्त्रों में निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन नही है और न समस्त जागतिक विषयों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन है ' जड चेतन ईश्वरीय विभूतियों के स्वरूप भेद का भी निषेध नही है। यदप्युच्यते-निर्विशेषे स्वयंप्रकाशे वस्तुनि दोषपरिकल्पित- मीशेशितव्याद्यनन्तविकल्पं सर्वं जगत्। दोषश्च स्वरूपतिरोधान विविधविचित्र विक्षेपकारी सदसदनिर्वचनीयाऽनाद्यविद्या। सा च अवश्याभ्युपगमनीया; “अनृतेन हि प्रत्यूढाः “इत्यादिभिः श्रुतिभिः, ब्रह्मादस्तत्त्वमस्यादिवाक्यसामानाधिकरण्यावगतजीवैक्यानुपपत्त्या च सातु न सती, भ्रांतिबाधयोरयोगात्। नाप्यसती, ख्यातिबाधयोश्चा- ankurnagpal108@gmail.com