भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

२१ २. (सिद्धान्त)—अव्यक्त शब्द से रथरूप से परिकल्पित शरीर के निर्देश से, अव्यक्त शब्द की सूक्ष्म शरीरता का समर्थन तथा रथरूपक की सार्थकता का विवेचन ज्ञेयता के अभाव में प्रधान का निराक- रण। प्रधान में ज्ञेयता की सम्भावना का खंडन करते हुए प्राज्ञ आत्मा की ज्ञेयता की पुष्टि। परम पुरुष, उसके उपासक तथा उपासना प्रणाली संबंधी प्रश्नोत्तरों का उल्लेख। महत् शब्द के दृष्टान्त से सांख्योक्त प्रधान की सम्भावना का निराकरण। —पृ० ५५०-६५ २ चमसाधिकरण सूत्र (८ १०) १. पूर्वपक्ष—वेदोक्त अजा शब्द की सांख्योक्त प्रधाना- र्थता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—चमस दृष्टान्त से प्रधान के अपरिग्रह का निरूपण। ब्रह्मोत्पन्न अजा ग्रहण के हेतु तथा आदित्य की मधुत्व कल्पना के समान, ब्रह्मकारणिका प्रकृति की अजत्व कल्पना की संगति का प्रदर्शन। अजा शब्द की शांकर मतोक्त तेज, जल और अन्नार्थ प्रतिपादकता का निराकरण। —पृ० ५६५-७६ ३. संख्योपसंग्रहाधिकरण सूत्र (११-१३) १. पूर्वपक्ष—"पंच पंचजना." श्रुति से सांख्योक्त प्रधान के पचीस तत्त्वों की परिकल्पना। २. (सिद्धान्त) श्रौत और सांख्य के पच्चीस तत्त्वों की नितान्त भिन्नता से उक्त मत का निराकरण। पंचजन शब्द से प्राण आदि पांच का तथा काण्व शाखा के अनुसार ज्योति शब्द से विषय प्रकाशिका इन्द्रियों की पंच संख्या का निरूपण ! —पृ० ५७६-८२ ४. कारणत्वाधिकरण सूत्र (१४-१५) १. पूर्वपक्ष—"तदैक्षत" श्रुति की प्रधान कारणपरता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—आकाश आदि की कारणता के रूप से अवधारित, परब्रह्म की जगत्कारणता का समर्थन ankurnagpal108@gmail.com