श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१ २. (सिद्धान्त)--बादरायण के मतानुसार देवताओं के उपासनाधिकार का प्रतिपादन । --पृ०५२१-२५ (iii) प्रासंगिक अपशूद्राधिकरण (३३-३६) १. पूर्वपक्ष--ब्रह्मविद्या में शूद्रों के अधिकार का समर्थन २. (सिद्धान्त) - ब्रह्म विद्या में शूद्रों के अनधिकार का उपस्थापन, ब्रह्म विद्यार्थी जानश्रुति की क्षत्रियता का प्रतिपादन चित्ररथ वंशीय राजा अभिप्रतारी के साहचर्य निर्देश से जानश्रुति की क्षत्रियता की पुष्टि । ब्रह्मविद्या में उपनयन अपेक्षित होने से शूद्रों के वेद श्रवण, अध्ययन और अधिकार रहित होने की पुष्टि । स्मृति प्रमाणों से भी अनधिकार का समर्थन । निर्विशेष ब्रह्मवादी मत से शूद्र के अन- धिकार की अनुपपत्ति । अधिकरण की परि- समाप्ति-ज्योति शब्द से उल्लेख परिमित पुरुष की परब्रह्मता का प्रतिपादन तथा अन्य संभावना का निरास । --पृ०५२५-४३ ७ अर्थान्तरत्वाधिकरण (सूत्र ४२-४४) १. पूर्वपक्ष--नामरूप निर्वाहक आकाश शब्दोक्त आत्मा में मुक्तात्मा और परमात्मा की संभावना की तुलना में मुक्तात्मा का समर्थन । २ (सिद्धान्त) - सुषुप्ति और उत्क्रमण काल में आकाश और जीव के स्पष्ट भेद उल्लेख होने से तथा आकाश के लिए प्रयुक्त पति शब्द के प्रयोग से आकाश की परमात्मकता की पुष्टि । --पृ०५४३-४६ (चतुर्थपाद) १. आनुमानिकाधिकरण (सूत्र १-७) १. पूर्वपक्ष--कठोपनिद् के “महतः परमव्यक्तम्” मंत्र के आधार पर सांख्य परिकल्पित प्रधान की जगत्का- रणता की कल्पना । ankurnagpal108@gmail.com