भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

२० दहर की जीवोल्लेखना का निरूपण। अल्पत्व श्रुति के आधार पर अब्रह्मभाव संबन्धी शंका का समा- धान। दहर के अनुरूप अवस्था वाले जीव को ही दहर स्वीकारने का निराकरण तथा स्मृत्यानुसार भी दहर की ब्रह्मरूपकता का निरूपण। —पृ०४८७-५०६ ६. प्रमिताधिकरण [सूत्र २३-४१] १. पूर्वपक्ष--अंगुष्ठ परिमित पुरुष की जीवात्मकता और परमात्मकता के विचार में जीवात्मकता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)---श्रंगुष्ठ परिमित पुरुष की परमात्मकता का उपस्थापन तथा मानव हृदय के परिमाणानुसार पुरुष की अंगुष्ठ परिमिति की सिद्धि। —पृ०५०६-६ १. प्रासंगिक देवताधिकरण [सूत्र २५-२६] १. पूर्वपक्ष--मनुष्य भिन्न जीवों का उपासना में अन- धिकार प्रदर्शन। २, (सिद्धान्त)—मनुष्येतर देवतादिकों के उपासनाधि- कार का प्रतिपादन तथा उनकी शरीरता का सम- र्थन। देवताओं की शरीरता स्वीकारने में, अनेकों यज्ञों में उनकी युगपद् उपस्थिति की असंभावना का निराकरण तथा वैदिक शब्द के विरोध का परिहार। देवादिसृष्टि की शब्द पूर्वकता का प्रतिपादन तथा मंत्रमय वेद की नित्यता का समर्थन। प्रत्येक प्रलय के अन्त में समानाकार सृष्टि का समर्थन। —पृ०५०६-२१ (ii) प्रासंगिक मध्वधिकरण (सूत्र ३०-३२) १. पूर्वपक्ष-मधु आदि विद्याओं में, वसु आदि देवताओं के उपासना अधिकार के असंभव होने से जैमिनी के मतानुसार उपासना में देवताओं के अनधिकार का विवेचन। ज्योतिर्मय ब्रह्मोपासना मात्र में अधिकार का ज्ञापन। ankurnagpal108@gmail.com