भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३१७ ) इत्युपदिश्यत इति तदयुक्तम्, जीवस्य चेतनत्वे सत्यपि "तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्" इतिस्वसंकल्पपूर्वकानन्तविचित्र सृष्टियोगानुपपत्तेः । शुद्धावस्थस्यापि हि तस्य सर्गादिजगद्व्यापार- संभवो-"जगद्व्यापारवर्जम्" भोगमात्रसाम्यलिंगात्" इत्यत्रोपपा- दयिष्यते । जो यह कहते हैं कि—जगत कारण रूप से निर्दिष्ट "मैं ही जीव रूप से इसमें प्रवेशकर" तथा "तू वही है" इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा और परमात्मा का जो सामानाधिकरण्य अभेद संबंध बतलाया गया है, वह-जीव के अतिरिक्त परमात्मा कोई अन्य वस्तु नहीं है, ऐसा बतलाता है तथा जीव के ही स्वरूप को 'ब्रह्मवेत्ता परतत्त्व को पा जाता है" इस वाक्य में, परतत्त्वता को प्राप्त, दुःख से अनावृत आनंदमय कहा गया है । सो आपका यह कथन भी असंगत है--क्योंकि—"उसने विचार किया कि बहुत होकर प्रकट होऊँ" उसने तेज की सृष्टि की "इत्यादि वाक्यों में जिस स्वसंकल्पात्मिका विविधरूपा सृष्टि का वर्णन किया गया है, वह चेतनता होते हुए भी, जीव के सामर्थ्य के बाहर की बात है ।' विशुद्धावस्थापन्न जीव से भी ऐसी जागतिक सृष्टि संभव नहीं है । ऐसा ही—सूत्रकार—"जगद्व्यापारवर्जम् "तथा" भोगमात्र साम्यलिंगाच्च" सूत्रों में बतलाते हैं । कारणभूतस्य ब्रह्मणो जीवस्वरूपत्वानभ्युपगमे "अनेन जीवेना- त्मना" तत्त्वमसीति सामानाधिकरण्यनिर्देशः कथमुपपद्यत इति चेत्—कथं वा निरस्तनिखिलदोषगंधस्य सत्य- संकल्पस्य सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रनवधिकातिशया संख्येयकल्याणगुणगणस्य सकलकारणभूतस्यब्रह्मणः नानाविधानन्तदुःखाकरकर्माधीन चिन्तितनिमिषितादिसकलप्रवृत्तिजीवस्वरूपत्वम् ? अन्यतरस्य मिथ्यात्वेनोपपद्यत इति चेत्, कस्य भोः ? किं हेयसंबन्धस्य ? किं वा हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानस्वभावस्य हेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानस्य ब्रह्मणोऽनाद्यविद्याश्रयत्वेन हेयसंबंध मिथ्याप्रति- ankurnagpal108@gmail.com