भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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भासो मिथ्या रूप इति चेत्, विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते, ब्रह्मणो हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानत्वमनाद्यविद्याश्रयत्वेनानंतदुःखविषय मिथ्या- प्रतिभासाश्रयत्वं चेति । अविद्याश्रयत्वं तत्कार्यदुःखप्रति- भासाश्रयत्वं चैव हि हेय संबंधः । तत्संबन्धित्वं प्रत्यनीकत्वं च विरुद्धमेव । तथाऽपि तस्य मिथ्यात्वान्न विरोध इति मा वोचः । मिथ्याभूतमप्यपुरुषार्थ एव तन्निरसनाय सर्वेवेदांता आरभ्यंत इति ब्रूषे । निरसनीयापुरुषार्थयोगश्च हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानतया विरुध्यते । यदि आप पूछें कि—कारणभूत ब्रह्म की जीवस्वरूपता न मानने से "अनेन जीवेन" तथा "तत्त्वमसि" आदि वाक्यों से सम्मत सामाना- धिकरण रूप अद्वैत की बात कैसे बनेगी ? मैं पूछता हूं कि—समस्त दोषों से रहित, सत्य संकल्प, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, अनंत अपार असंख्य कल्याण गुणैकराशि, सभी के एकमात्र कारण ब्रह्म की, अनेक दुःखों की खान, कर्माधीन, चिन्तित, क्षणभंगुर प्रवृत्तिवाली जीव स्वरूपता कैसे संभव होगी ? आप कहें कि—जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता, मिथ्यात्व आभास मात्र है । तो वह मिथ्यात्व आप किसका मानते हैं ? जीवात्मा के हेयगुण संबंधों का, अथवा हेयगुणों के प्रतिपक्षी कल्याणगुण समन्वित परमात्मा के स्वभाव का ? यदि, हेयता रहित कल्याणैकतान ब्रह्म का, अनादि अविद्या के आश्रय से, हेय संबंध मिथ्या प्रतिभास है, तो एक ही ब्रह्म में, हीनता रहित कल्याणगुणैकतानता और अनादि अविद्याश्रित अनंत दुःखों का विषयता संबंधी मिथ्या प्रतिभासाश्रय, ये दोनों परस्पर विरोधी बातें कैसे संभव हैं ? अविद्या की आश्रयता, तथा उससे संभूत दुःख प्रतिभासाश्रयी हेयगुण संबंध, और ब्रह्म संबंधी हेयगुण प्रतिपक्षता, ये दोनों बातें विरुद्ध ही तो हैं । इस पर भी मिथ्याभास का आश्रय लेकर यह मत कहो कि—विरुद्धता नहीं होगी । मिथ्या होते हुए भी वह त्याज्य है, उसको हटाने के लिए सारे ही वेदांत वाक्य उपदेश देते हैं, ऐसा भी तुम्हीं स्वीकारते हो [अर्थात् मिथ्यात्व को, हेय और त्याज्य मानते हो तो उसे मिथ्याभास कैसे कह सकते हो ?] जिस वस्तु को त्याज्य मानते