श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१६ ) हैं, वह हेय प्रतिपक्षी कल्याणैकतान गुणों से विरुद्ध ही है, तभी तो त्याज्य है। किं कुर्मः ? “येनाश्रुतं श्रुतं भवति” इत्येकविज्ञानेन सर्व- विज्ञानं प्रतिज्ञाय “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिना निखिल- जगदेककारणतां, “तदैक्षत बहुस्याम्” इति सत्यसंकल्पतां च ब्रह्मणः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये नानंतदुःखाश्रयजीवैक्यं प्रतिपादितम्, तदन्यथानुपपत्त्या ब्रह्मण एवाविद्याश्रयत्वादि परि- कल्पनीयमिति चेत् । विवश होकर यदि कहो कि क्या करे ? “जिसके द्वारा अश्रुत भी श्रुत होता है” इस वाक्य से एक विज्ञान से समस्त विज्ञान की बात को बतलाकर “हे सौम्य यह सारा जगत् सन् ही था” इत्यादि वाक्य से ब्रह्म की सर्व जगत्कारणता मानकर “उसने विचार किया कि बहुत हो जाऊँ” इस वाक्य से ब्रह्म की सत्य संकल्पता का भी प्रतिपादन करके, उसी ब्रह्म की “तू वही है” इस वाक्य द्वारा अनंत दुःखाश्रयी जीव की सामानाधिकरण्य रूप एकता प्रतिपादित की गई है, इसलिए अगत्या हमें, ब्रह्म की परस्पर विरोधी असंगत ( बद्धता और मुक्तता ) बातों के परिहार के लिए, ब्रह्म मे ही अविद्याश्रयत्व आदि की परिकल्पना करनी पडती है । श्रुतोपपत्तयेऽप्यनुपपन्नं विरुद्धं च न कल्पनीयम् अथ हेय संबंध एव पारमार्थिकः, कल्याणैकस्वभावता तु मिथ्याभूता, हन्तैवं, तापत्रयाभिहतचेतनोज्जिजीविषया प्रवृत्तं शास्त्रं, तापत्रया- भिहतिरेव तस्य पारमार्थिकी, कल्याणैकस्वभावस्तु भ्रांतिपरि- कल्पित इति बोधयत् सम्यगुज्जीवयति । अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ब्रह्मणो निर्विशेषचिन्मात्रस्वरूपातिरिक्तजीवत्व दुःखित्वादिकं सत्यसंकल्पत्वकल्याणगुणाकरत्वाद्यपि मिथ्याभूतं कल्पनीयमिति चेत्; अहो भवतां वाक्यार्थपर्यालोचनकुशलता । एक विज्ञानेन सर्व- विज्ञानप्रतिज्ञान सवस्य मिथ्यात्वे सर्वस्य ज्ञातव्यस्याभावान्न ankurnagpal108@gmail.com