भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३२० ) सेत्स्यति। यद्येकविज्ञानं परमार्थविषयम्, तच्चैव सर्वविज्ञानमपि यदि परमार्थविषयम् तदन्तर्गतं च तदा तत् ज्ञानेन सर्वविज्ञानमिति- शक्यते वक्तुम् न हि परमार्थशुक्तिका ज्ञानेन तदाश्रयमपरमार्थं रजतं ज्ञातं भवति । ( विवाद ) ऐसी शास्त्र विरुद्ध और युक्ति विरुद्ध कल्पना करना ठीक नहीं है। यदि हेयगुण संबंध को परमार्थिक तथा कल्याणैकतान स्वभावता को अपारमार्थिक मान लेंगे तो, त्रितापतापित चेतन जीवों की शांति के लिए जो उपाय शास्त्रों में बतलाए गए हैं, उनका क्या समाधान होगा ? क्या तापत्रयाभिहति को ही पारमार्थिक तथा कल्याण स्वभाव वस्तु को भ्रांति कल्पित मानना उचित होगा ? यदि उक्त दोष के परिहार के लिए, ब्रह्म के निर्विशेष चैतन्य स्वरूप के विरोधी जीवत्व, दुःखित्व आदि धर्म तथा सत्यसंकल्पत्व, कल्याणगुणाकरत्व, जगत्कारणत्व आदि सभी मिथ्या हैं, ऐसी परिकल्पना करते हैं, तो आपकी वाक्यपर्या- लोचना के कौशल की बलिहारी है। वाह, समस्त वस्तु के मिथ्या हो जाने पर कोई ज्ञातव्य विषय ही न रह जायगा, तथा एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है, यह नियम भी व्यर्थ हो जायगा । जब एक वस्तु संबंधी ज्ञान परमार्थ विषयक होगा तभी, समस्त विषयक ज्ञान पारमार्थिक हो सकता है तभी यह नियम लागू हो सकेगा कि—एक की जानकारी से समस्त की जानकारी होती है। अन्यथा, सीप का सही ज्ञान और चांदी संबंधी ज्ञान जो कि सीप नहीं है तथा सीप के समान सही भी नहीं है, उन दोनों को एक मानना पड़ेगा। पारमार्थिक सीप संबंधी ज्ञान से, सीप के आश्रित अपारमार्थिक रजत, की प्रतीति नहीं हो सकती । अथोच्येत — एक विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाः, अयमर्थः “निर्विशेषवस्तु मात्रमेव सत्यम्” इति । न तर्हि “येन अश्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतम्, अविज्ञातं विज्ञातं” इति श्रूयेत् । येन श्रुतेन अश्रुतमपि श्रुतं भवतीत हि अस्य वाक्यस्यार्थः । कारणतयोपल- क्षितनिर्विशेषवस्तुमात्रस्यैव सद्भावश्चेत्प्रतिज्ञातः “यथा सौम्येकेन ankurnagpal108@gmail.com