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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ३२० ) सेत्स्यति। यद्येकविज्ञानं परमार्थविषयम्, तच्चैव सर्वविज्ञानमपि यदि परमार्थविषयम् तदन्तर्गतं च तदा तत् ज्ञानेन सर्वविज्ञानमिति- शक्यते वक्तुम् न हि परमार्थशुक्तिका ज्ञानेन तदाश्रयमपरमार्थं रजतं ज्ञातं भवति । ( विवाद ) ऐसी शास्त्र विरुद्ध और युक्ति विरुद्ध कल्पना करना ठीक नहीं है। यदि हेयगुण संबंध को परमार्थिक तथा कल्याणैकतान स्वभावता को अपारमार्थिक मान लेंगे तो, त्रितापतापित चेतन जीवों की शांति के लिए जो उपाय शास्त्रों में बतलाए गए हैं, उनका क्या समाधान होगा ? क्या तापत्रयाभिहति को ही पारमार्थिक तथा कल्याण स्वभाव वस्तु को भ्रांति कल्पित मानना उचित होगा ? यदि उक्त दोष के परिहार के लिए, ब्रह्म के निर्विशेष चैतन्य स्वरूप के विरोधी जीवत्व, दुःखित्व आदि धर्म तथा सत्यसंकल्पत्व, कल्याणगुणाकरत्व, जगत्कारणत्व आदि सभी मिथ्या हैं, ऐसी परिकल्पना करते हैं, तो आपकी वाक्यपर्या- लोचना के कौशल की बलिहारी है। वाह, समस्त वस्तु के मिथ्या हो जाने पर कोई ज्ञातव्य विषय ही न रह जायगा, तथा एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है, यह नियम भी व्यर्थ हो जायगा । जब एक वस्तु संबंधी ज्ञान परमार्थ विषयक होगा तभी, समस्त विषयक ज्ञान पारमार्थिक हो सकता है तभी यह नियम लागू हो सकेगा कि—एक की जानकारी से समस्त की जानकारी होती है। अन्यथा, सीप का सही ज्ञान और चांदी संबंधी ज्ञान जो कि सीप नहीं है तथा सीप के समान सही भी नहीं है, उन दोनों को एक मानना पड़ेगा। पारमार्थिक सीप संबंधी ज्ञान से, सीप के आश्रित अपारमार्थिक रजत, की प्रतीति नहीं हो सकती । अथोच्येत — एक विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाः, अयमर्थः “निर्विशेषवस्तु मात्रमेव सत्यम्” इति । न तर्हि “येन अश्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतम्, अविज्ञातं विज्ञातं” इति श्रूयेत् । येन श्रुतेन अश्रुतमपि श्रुतं भवतीत हि अस्य वाक्यस्यार्थः । कारणतयोपल- क्षितनिर्विशेषवस्तुमात्रस्यैव सद्भावश्चेत्प्रतिज्ञातः “यथा सौम्येकेन ankurnagpal108@gmail.com

( ३२१ ) मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातम्” इति दृष्टान्तोऽपि न घटते । मृत्पिण्ड विज्ञानेन हि तद्विकारस्य ज्ञातता निदर्शिता । तत्रापि विकारस्यासत्यताऽभिप्रेतेति चेत्, मृद्विकारस्य रज्जुसर्पादिवद- सत्यत्वं शुश्रूषोरसिद्धमिति प्रतिज्ञातार्थ संभावना प्रदर्शनाय “यथा सोम्य” इति प्रसिद्धवदुपन्यासो न युज्यते । न च तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्यज्ञानोत्पत्तेः प्राग्विकारजातस्य असत्यतामापादयत् तर्कानु- गृहीतं वा प्रमाणमुपलभामह इति । अयमर्थः “तदन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्य” इत्यत्र वक्ष्यते । जो यह कहो कि—एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा का तात्पर्य है कि “निर्विशेष वस्तु मात्र ही सत्य है ।” सो यह कथन भी ठीक न होगा ।” जिससे अश्रुत श्रुत-अमत, मत तथा अज्ञात, ज्ञात होता है” इस वाक्य का सही अर्थ यह है कि—जिससे अश्रुत पदार्थ भी परिश्रुत होता है । यदि, एकमात्र कारणताविशिष्ट को ही शास्त्र में सत्य माना गया होता तो, “सोम्य ! एक मृत्पिण्ड से सारे मृण्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है” यह दृष्टान्त संगत नहीं हो सकता । इस उदाहरण में मृत्पिण्ड से विकारता दिखलाई गई है । इस पर भी कहें कि—यहाँ भी, विकार की असत्यता ही कही गई है, तो भी मिट्टी के निर्मित घड़े आदि, रस्सी में सर्प की भ्रान्ति की तरह, असत्य तो प्रतीत होते नहीं । अनुभूत पदार्थ की सत्यता के प्रतिपादन की संभावना मात्र के लिए ही केवल, “हे सौम्य !” इत्यादि वाक्य में प्रसिद्ध नियम का व्याख्यान किया गया हो, ऐसा समझ में नहीं आता । न “तत्त्वमसि” आदि वाक्यजन्य ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व का कोई ऐसा तर्कानुमोदित प्रामाणिक वाक्य ही मिलता है, जिससे विकृत पदार्थों की असत्यता सिद्ध हो सके । इस सारे तात्पर्य को सूत्रकार—तदन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ सूत्र में बतलाते हैं । तथा—“सदेवसोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयं”तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति, तत्तेजोऽसृजत्”—“हन्त इमास्तिस्रो देवता, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—“सन्मूलाः सौम्येमाः ankurnagpal108@gmail.com

( ३२२ ) सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः...—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" इत्यादिना अस्य जगतः सदात्मकता, सृष्टे पूर्वकाले नामरूप विभागप्रहाणम्, जगदुत्पत्तौ सच्छब्दवाच्यस्यब्रह्मणः, स्वव्यतिरिक्त- निमित्तान्तरा म पे क्ष त्वं सृष्टिकाले अहमेव अनंतस्थिरत्रसरूपेण “बहुस्याम्” इति अनन्यसाधारणसंकल्पविशेषः, यथा संकल्पमनंत विचित्र तत्त्वानां विलक्षणक्रमविशेषविशिष्टासृष्टि. समस्तेषु अचेतनेषुवस्तुषु स्वात्मकजीवानुप्रवेशेनैवानंतनामरूपव्याकरणं, स्व- व्यतिरिक्तस्य समस्तस्य स्वमूलत्वम्, स्वायत्ततत्वं, स्वप्रवर्त्त्यत्वं, स्वेनैव जीवनम्, स्वप्रतिष्ठत्वमित्याद्यनंतविशेषाः शास्त्रैकसमधिगम्याः प्रतिपादिताः । तत्संबंधितया प्रकरणान्तरेष्वप्यपहतपाप्मत्वा- दिनिरस्तनिखिलदोषतासर्वज्ञतासर्वेश्वरत्वसत्यकामत्वसत्य

( ३२३ ) विलीन हो जाती है"—यह सारा ही जगत ब्रह्मात्मक है।" इत्यादि शास्त्र वाक्यों में, जगत की सदात्मकता, सृष्टि के पूर्व नाम रूप विभाग का निराकरण, तथा सृष्टि कालिक अनंत स्थावर जंगम रूपों में व्यक्त होने का ब्रह्म का अनन्य असाधारण संकल्प विशेष, संकल्पानुरूप विलक्षण क्रम विशेष, विचित्र विशिष्ट सृष्टि रचना, एवं समस्त अचेतन वस्तुओं में जीवरूप से प्रवेश कर नाम रूप व्याकृति, अपने में ही समस्त जीवों की लीनता, इत्यादि ब्रह्म की अनंत विशेषताओं का प्रतिपादन किया गया है। उन्हीं विशेषताओं से संबंधित अन्य प्रकरणों में भी, निष्पापता, निर्दोषता, सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सत्यकामता, सत्यसंकल्पना, सर्वानंद- कारिता, अत्यानंदमयता, इत्यादि अनेक प्रामाणिक सहस्रों विशेषताओं का भी प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार असाधारण अगोचर, अनंत विशेषण विशिष्ट ज्ञेय ब्रह्म के बोधक "तत्" शब्द की निर्विशेष (सामान्य) वस्तुओं से समता नितान्त असंगत प्रतीत होनी है, यह तो प्रमत्तों का सा प्रलाप है। "त्वं" पद संसारी विशिष्ट जीवात्मा का बोधक है उसकी भी यदि निर्विशेष ( सामान्य ) रूप से कल्पना की जाय तो, "त्वं" पद के वास्तविक अर्थ का गला घोटना मात्र है। वह निर्विशेष प्रकाशस्वरूप वस्तु अविद्या से आवृत हो जाती है इसलिए उसके वास्तविक स्वरूप का नाश हो जाता है; यह संभावना भी असंभव है, ऐसा पहिले ही कह चुका हूँ। यदि ऐसा मान लेंगे तो, सामानाधिकरण्य बोध्य तत् त्वं दोनों ही पदों के मुख्यार्थ का त्याग करके लक्षणा का आश्रय लेना पड़ेगा। अथोच्येत—सामानाधिकरण्यवृत्तानामेकार्थप्रतिपादनपरतया विशेषणांशे तात्पर्या संभवादेव विशेषणनिवृत्तेर्वस्तुमात्रैकत्वप्रति- पादनान्नलक्षणा प्रसंगः । यथा “नीलमुत्पलम्” इति पदद्वयस्य विशेष्यैकत्वप्रतिपादनपरत्वेन नीलत्वोत्पलत्वस्वरूपविशेषणद्वयं न विवक्ष्यते । तद्विवक्षायां हि नीलत्वविशिष्टाकारेणोत्पलत्व- विशिष्टाकारस्यैकत्वप्रतिपादनं प्रसज्यते । तत्तु न संभवति न हि नैल्यविशिष्टाकारेण तद्वस्तूतपलपदेन विशेष्यते, जातिगुणयोरन्योन्य समवायप्रसंगात् । अतो नीलत्वोत्पलक्षितवस्त्वेकत्वमात्रं सामाना-

( ३२४ ) धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । तथा-“सोऽयं देवदत्तः” इत्यतीतकाल विप्र- कृष्टदेशविशेषस्य तेनैव रूपेण सन्निहितदेशवर्त्तमानकालविशिष्टतया प्रतिपादनानुपपत्ते रुभयदेशकालोपलक्षितस्वरूपमात्रैक्यं सामाना- धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । यद्यपि नीलमित्याद्येकपदश्रवणे प्रतीयमानं विशेषणं सामानाधिकरण्यवेलायां विरोधान्न प्रतिपाद्यते । तथाऽपि वाच्येऽर्थे प्रधानांशस्य प्रतिपादनान्न लक्षणा । अपितु विशेषणांशस्या विवक्षामात्रम् सर्वत्र सामानाधिकरण्यस्यैष एव स्वभाव इति न कश्चिद्दोष इति । यदि कहो कि-समानता बतलाने वाले शब्दों का तात्पर्य अभेद प्रतिपादन ही है, इसलिए यहाँ-जीव, ब्रह्म का विशिष्ट अंश है-ऐसा अर्थ नहीं हो सकता । समानता के प्रसंग में विशेषता का प्रश्न स्वतः ही निवृत्त हो जाता है तथा वस्तुगत एकत्व मात्र की प्रतीति होती है इसलिए लक्षणा द्वारा अर्थ करने की बात ही उपस्थित नहीं होती [अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा की विशेषताओं को हटाकर उनकी वास्तविक एकता को समझ लिया जावे तो-वह और तू का भेद, जो कि औपचारिक अर्थ है-समाप्त हो जायगा । लक्ष्यार्थ करने की क्या आवश्यकता है ?] जैसे कि-“नीलोत्पल” वाक्य मे दो पदों द्वारा विशेष्य और विशेषण का प्रतिपादन किया गया है, न कि नीलत्व और उत्पलत्व दो विशेषणों की योजना है। यदि इन दोनों को अलग-अलग विशेषण रूप से कहा गया होता तो नीलत्व विशिष्टाकार से, उत्पलत्व विशिष्टाकार की एकता का प्रतिपादन हो जाता । सो तो संभव हो नही सकता, क्यों उत्पलत्व, नीलत्व का विशेषण होगा नही। ऐसा होने से तो जाति और गुण का अन्योन्य समवाय संबंध हो जायगा । इसलिए समझना चाहिए कि-नीलत्व और उत्पलत्व धर्मद्वयविशिष्ट वस्तुओं की, सामानाधिकरण्य द्वारा ही, एकता बतलाई गई है । तथा “यह वही देवदत्त है” इस वाक्य में भी, अतीत काल और स्थान विशेष में देखे गए, देवदत्त को देखकर वर्त्तमान काल में जो उपलब्धि होती है, उसमें, रूप सामानाधिकरण्य ही, कारण है । इसी से एकता की प्रतीत होती है ।

( ३२५ ) यद्यपि केवल एक पद "नील" को सुनकर यही ज्ञात होता है कि, यह किसी वस्तु की विशेषता का बोधक है, पर जब उसकी समानता की जाती है तब विरोधी तत्त्व होने के कारण उसकी वैसी प्रतीति नही होती, किन्तु वाच्यार्थ में प्रधान अंश का प्रतिपादन ज्ञात होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं होती अपितु विशेषणांश के जानने मात्र की आवश्यकता होती है । सभी जगह सामानाधिकरण्य का ऐसा ही विधान है इसलिए कोई दोष नहीं है । तदिदमसारं—सर्वेष्वेववाक्येषु पदानां व्युत्पत्तिसिद्धार्थ संसर्ग विशेषमात्रं प्रत्याय्यम् । तत्र समानाधिकरणवृत्तानामपि नीलादि- पदानां नैल्यादिविशिष्टएवार्थो व्युत्पत्ति सिद्धः, पदान्तरार्थं संसृष्टो- ऽभिधीयते । यथा "नीलमुत्पलमानय" इत्युक्ते नीलिमादिविशिष्ट- मेवानीयते । यथा च "विन्ध्याटव्यां मदमुदितो मातंगगणः तिष्ठति" इति पदद्वयावगतविशेषणविशिष्ट एवार्थः प्रतीयते । एवं वेदांत वाक्येष्वपि समानाधिकरणनिर्देशेषु तत्तद्विशेषणविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् । न च विशेषण विवक्षायामितरविशिष्टाकारं वस्त्व- न्येन विशेष्टव्यम् । अपितु सर्वै विशेषणैः स्वरूपमेव विशेष्यम् । (वाद) ऊपर कही गई सारी युक्तियाँ असंगत हैं । प्रायः सभी वाक्यों में पद समूहों का केवल व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ का विशेष संबंध ही, प्रतीति-गम्य होता है । सामानाधिकरण्य में प्रवृत्त, "नील" पद का विशिष्ट अर्थ "नीलिमा" ही व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ है । जो कि अन्य पदार्थ से संबंधित हो सकता है जैसे कि—नीलकमल लाओ" कहने पर नीलिमा गुण विशिष्ट कमल ही लाया जाता है । तथा "इस विन्ध्याटवी में मदोन्मत्त हाथियों के झुंड रहते हैं" इस वाक्य में भी, मदोन्मत्त और हस्ति समूह इन दो पदों में विशेषण और विशिष्ट अर्थ की प्रतीति होती है । इसी प्रकार समानाधिकरण्य बोधक वेदांत वाक्यों में भी, विशेषण और विशिष्ट भाव से ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है । जहाँ कहीं भी,

( ३२६ ) विशेषण द्वारा विशेषता बतलाने की चेष्टा की गई है, वहां विशिष्टाकार- वाली किसी अन्य वस्तु की विशेषता नहीं बतलाई गई है । अपितु सभी विशेषणों से स्वरूप की ही विशेषता बतलाई गई है । तथा हि “भिन्नप्रवृत्तिनिवृत्तानां शब्दानामेकस्मिन्नर्थे वृत्तिः सामानाधिकरण्यम्” इति अन्वयेन निवृत्त्या वा पदान्तर प्रतिपाद्या- दाकारादाकारान्तर युक्ततया तस्यैव वस्तुनः पदान्तर प्रतिपाद्यत्वं सामानाधिकरण्यकार्यम् । यथा-“देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षोऽ दीनोऽकृपणोऽनवद्यः” इति यत्र त्वेकस्मिन्वस्तुनि समन्वयायोग्यं विशेषणद्वयं समानाधिकरणपदनिर्दिष्टम् तत्राप्यन्यतरत्पदममुख्य- वृत्तमाश्रीयते, न द्वयम् । यथा “गौर्वाहीकः' इति । नीलोत्पलादिषु तु विशेषणद्वयान्वयाविरोधादेकमेवोभयविशिष्टं प्रतिपाद्यते । तथा--“विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की जो एक मात्र अर्थ- बोधकता है उसे ही सामानाधिकरण्य कहते है इस नियम के अनुसार, अन्वय द्वारा हो या अन्यार्थ बोध द्वारा हो, दोनों ही स्थिति में, पदान्तर प्रतिपाद्य विषय में अर्थगत पार्थक्य नहीं होता । एक ही वस्तु को विभिन्न पदों से प्रतिपादन करना ही समानाधिकरण्य का कार्य है । जैसे कि- “देवदत्त श्यामवर्णवाला युवक रक्तनेत्र, अदीन अकृपण और अनवद्य है”—इस वाक्य में सामानाधिकरण्य के नियम से अनेक गुणों वाला एक ही देवदत्त है। जहाँ एक ही वस्तु में समन्वय के अयोग्य, दो विशेषण, सामानाधिकरण्य भाव से प्रयुक्त होते हैं, वहाँ पर भी एक पद का गौण अर्थ स्वीकारना होगा, दोनों का मुख्य अर्थ नहीं होगा। जैसे कि 'भार वाही बैल” इसमें एक का मुख्य और दूसरे का गौण अर्थ है। 'नीलोत्पल" में तो दो विशेषणों के समन्वय में विरोध होने से एकता है इसलिए दोनों में विशिष्टता का प्रतिपादन हो जाता है । अथ मनुषे—एकविशेषणप्रतिसंबन्धित्वेन निरूप्यमाणं विशेष- णान्तरप्रतिसंबन्धित्वात् विलक्षणम्-इति-घटपटयोरिवैकविभक्ति निर्देशेऽप्यैक्यप्रतिपादनासंभवात् सामानाधिकरणशब्दस्य न ankurnagpal108@gmail.com

( ३२७ )

विशिष्ट प्रतिपादनपरत्वं, अपितु विशेषणमुखेन स्वरूपमुपस्थाप्य तदैक्यप्रतिपादनपरत्वमेव इति । यदि यह मानें कि--कोई वस्तु एक विशेषण से विशेषित होने पर, दूसरी विशेषण विशिष्ट वस्तु से निश्चित ही विलक्षण या भिन्न होगी । जैसे, घट पट आदि में समान विभक्ति के होते हुए भी, एकता संभव नहीं हैं । वैसे ही अन्यत्र भी समान विभक्ति का निर्देश होने पर विभिन्न विशेषण विशिष्ट पदार्थों का ऐक्य नहीं होगा इसलिए समाना- धिकरण शब्द का विशिष्टार्थ प्रतिपादन में तात्पर्य नहीं होता, अपितु विशेषण के रूप से वस्तु के स्वरूप का उपस्थापन या बोध संपादन कराकर उन सबका ऐक्य प्रतिपादन करना ही उसका कार्य होता है । स्यादेतदेवम्—यदि विशेषणद्वयप्रतिसंबन्धित्वमात्रमेवैक्यं निरु- न्ध्यात् । न चैतदस्ति, एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुमयोग्यधर्मद्वय- विशिष्टत्वमेव हि एकत्वं निरुणद्धि । अयोग्यता च प्रमाणान्तर- सिद्धाघटत्वपटत्वयोः । “नीलमुत्पलम्” इत्यादिषु तु दण्डित्व- कुण्डलित्वावद्रूपवत्त्वरसवत्त्वगन्धवत्त्वादिष्वच्च विरोधो नोप- लभ्यते । न केवलमविरोध एव, प्रवृत्तिनिमित्तभेदेनैकार्थनिष्ठत्व- रूपं सामानाधिकरण्यमुपपादयत्येव धर्मद्वयविशिष्टताम् । अन्यथा स्वरूपमात्रैक्ये अनेकपदप्रवृत्तौ निमित्ताभावात् सामानाधिकरण्य- मेव न स्यात् । विशेषणानां स्वसंबंधानादरेण वस्तुस्वरूपोपलक्षण परत्वे सत्येकेनैवस्तूपलक्षितमित्युपलक्षणान्तरमनर्थकमेव, उपलक्ष- णान्तरोपलक्ष्याकारभेदाभ्युपगमे तेनाकारेण सविशेषत्वप्रसंगः । हो सकता है, ऐसा हो, पर केवल दो विशेषणों का संबंध ही अभेद का निरोधक हो, ऐसा नहीं है, अपितु एक धर्मी (विशेष पदार्थ) से दो विभिन्न धर्मों वाले विशेषणों का संबंध सर्वथा अयोग्य है वही एकता का विरोधी है । घटत्व और पटत्व में जो इस प्रकार की अयोग्यता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध होती है । “नील उत्पल” इस उदाहरण में

( ३२८ ) “दण्डित्व, कुण्डलित्व” की तरह रूपत्व, रसत्व और गंधवत्व आदि होते हुए भी एकता के विरुद्ध नही है । इस प्रकार केवल विरोध का अभाव ही नही है, अपितु प्रवृत्ति निवृत्ति के भेदानुसार जो सामानाधिकरण्य का नियम है, उसके अनुसार भी दो धर्मों वाली विशेषताओं का उपपादन हो जाता है । केवल वस्तु स्वरूप की एकता के बतलाने, या अनेक पदों के प्रयुक्त होने पर भी उपयुक्त कारण न होने से सामानाधिकरण्य का नियम लागू नहीं हो सकता । विशेष्य के साथ विशेषणों का संबंध स्वीकार न करके, केवल वस्तुमात्र बोधकता ही स्वीकारी जाय, तब भी, एक विशेषण से ही जब वस्तु की विशेषता उपलक्षित हो जाती है, तब अन्यान्य विशेषण स्वतः ही व्यर्थ हो जाते हैं । अन्यान्य विशेषणों द्वारा यदि उपलक्ष्य वस्तु का, आकार भेद ही माना जावे, तब भी उन विशे- षणों से वस्तु की सविशेषता सिद्ध हो जाती है । “सोऽयं देवदत्तः” इत्यत्रापि लक्षणा गन्धो न विद्यते, विरोधा- भावात् । देशान्तरसंबंधतयाऽतीतस्य सन्निहितदेशसंबंधतया वर्त्तमानत्वाविरोधात् । अतएव हि “सोऽयम्” इति प्रत्यभिज्ञा कालद्वयसंबंधिनोवस्तुन ऐक्यमुपपाद्यते वस्तुनः स्थिरत्ववादिभिः । अन्यथा प्रतीतिविरोघे सति सर्वेषां क्षणिकत्वमेव स्यात् । देश- द्वयसंबंधविरोधस्तु कालभेदेन परिह्रियते । “यह वही देवदत्त है” इस उदाहरण में भी किसी प्रकार की लक्षणा की संभावना नही है । क्योंकि—लक्षणा का कारणीभूत किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है । अतीत और स्थानान्तर में दृष्ट व्यक्ति के वर्त्तमान में देखे जाने पर उस व्यक्ति में कोई अन्तर तो आ नहीं जाता; ‘यह वही है’ ऐसा जो स्मृति परक ज्ञान है, वह काल द्वय ( भूत और वर्त्तमान ) में दृष्ट एक ही व्यक्ति के अभेद का ही द्योतक है—ऐसा वस्तुस्थिरत्व वादियों का मत है । अन्यथा, प्रतीति के अनुसार भेद मान लेने से तो, सारी ही वस्तुएं क्षणिक माननी पड़ेंगी दो स्थानों की जो विभिन्नता है, वह कालभेद से निवृत्त हो जाती है । यतः समानाधिकरणपदानामेकविशेषणविशिष्टैकार्थवाचि-

( ३२६ ) त्वम्, अतः एव “अरुणयैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इत्या- रुण्यादिविशिष्टैकहायन्या क्रयः साध्यतया विधीयते । इससे सिद्ध होता है कि समानाधिकरण पदों की अनेक विशेषण विशिष्ट एकार्थ बोधकता है । जैसे कि-“रक्तवर्णा पिंगाक्षी एक वर्ष वाली गो के बदले वह सोम खरीदता है” इसमें अरुणत्वादिविशिष्ट गौ से सोमक्रय की साध्यता बतलाई गई है । तदुक्तम् ”अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरैककर्म्यान् नियमः स्यात्” इति । तत्रैवं पूर्वपक्षी मन्यते-यदप्यरुणयेति पदमाकृतेरिव गुणस्यापि द्रव्य- प्रकारतैकस्वभावत्वाद् द्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमभिदधाति, तथाऽ- प्येकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न संभवति, एकहायन्या क्रीणाति तच्चारुण्येत्यर्थद्वयविधानासम्भवात् । ततश्चारुण्येति वाक्यं भित्वा प्रकरणविहितसर्वद्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमविशेषेणाभिदधाति । अरुण्येति स्त्रीलिंगनिर्देशः प्रकरणविहित सर्वलिंगद्रव्याणां प्रदर्शनार्थः । तस्मादेकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न स्यात् इति । पूर्वमीमांसादर्शन में कहा गया है कि--“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( अर्थात् विशेष्य और विशेषण ) का एक कर्म से ही प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा नियम है ।” इस नियम के अनुसार पूर्व पक्षी ऐसा मानते हैं कि- आकृति के समान गुण भी जब द्रव्य का प्रकार ( विशेषण ) होता है तब आकृति और गुण एक स्वभाव के होते हैं “अरुणा” पद अरुणिमा युक्त द्रव्य का सही अर्थ “लाल गौ” ठीक ही करता है, फिर भी “अरुणिमा” की एकहायनीयता के साथ अन्वय की आवश्यकता सिद्ध नहीं हो पाती । “एकवर्षीया से खरीदत। है” और वह भी “लाल रंग वाली से” ये दो भिन्न विशेषताओं को बतलाने वाले, समानता के विपरीत विशेषण हैं । इन दोनों को मानने से ‘अरुणा’ इत्यादि वाक्य से, प्रकरणस्थ सभी द्रव्यों का अरुणिमा से संबंध हो जाता है । अरुणया” पद में जो स्त्रीलिंग का निर्देश किया गया है, वह प्रकरणस्थ

संपूर्ण लिंगक द्रव्यों का बोधक है, यह भी मानना पड़ेगा । “अरुणिमा” के साथ “एक वर्षीया” का संबंध हो ही ऐसा कोई नियम नहीं है । अत्राभिधीयते “अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरेककर्म्यान्नियमः स्यात्” –“अरुणयैकहायन्या” इत्यारुणयविशिष्टद्रव्यैकहायनीद्रव्यवाचिप- दयोः सामानाधिकरण्येनाऽर्थैकत्वे सिद्धे सत्येकहायनीद्रव्यारुण्य- गुणयोररुणयेति पदेनैव विशेषणविशेष्यभावेन संबंधिताऽभिहितयोः क्रयाख्यैक कर्मान्वयाविरोधादरुणिम्नः क्रयसाधनभूतैकहायन्यन्वय नियमः स्यात् । इस पर यजुर्वेद ६।१।६ में निर्णय किया गया है कि—“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( विशेषण-विशेष्य ) दोनों का एक कर्म से प्रयोजन सिद्ध होगा” “अरुण्यैकहायन्या” इस उदाहरण में अरुण्यत्व विशिष्ट द्रव्यवाची अरुण शब्द और एकहायनी द्रव्यवाची एकहायनी शब्द की सामानाधिकरण्य के नियम से एकार्थ प्रतिपादनता जब

( ३३१ ) 'एकहायनी' पद की सामानाधिकरण्य के नियम से एकहायनीयता मात्र ही प्रतीत होती है, गुण संबंध तो प्रतीत होता नहीं। विशिष्ट द्रव्यों की एकता करना ही सामानाधिकरण्य का कार्य है। जैसा कि—कैय्यट ने वृद्ध्याह्निक पर लक्षण बतलाया कि—"विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की एक मात्र अर्थ बोधकता ही सामानाधिकरण्य है।" [अर्थात्--एक- हायनी शब्द गाय का विशेषण नहीं है अपितु उसकी उम्र का बोधकमात्र है, जब कि अरुणिम शब्द उसकी वर्ण विशेषता का परिचायक है; एक हायनी के बदले सोमक्रय करना कोई विशेषता नहीं रखता अपितु अरुणिम होने से गाय की विशिष्टतापरक बहुमूल्यता सिद्ध होती है। इसलिए एकहायनी और अरुणिमा का कोई साथ नहीं है, अतः उनका अभेद संबंध भी नही हो सकता ] अतएव हि 'रक्तः पटो भवति' इत्यादिष्वैकार्थ्यादेकवाक्य- त्वम् । पटस्यभवनक्रियासंबंधे हि वाक्यव्यापारः रागसंबंधस्तु रक्तपदेनैवाभिहितः, रागसंबंधिद्रव्यं पट इत्येतावन्मात्रं सामाना- धिकरण्यावसेयम् । एकमेकेनगुणेन द्वाभ्यां बहुभिर्वा तेन तेन पदेन समस्तेन व्यस्तेन वा विशिष्टमुपस्थाप्य सामानाधिकरण्येन सर्वं विशेषणविशिष्टोऽर्थ एक इति ज्ञापयित्वा तस्य क्रिया संबंधाभि- धानमविरुद्धम् । "देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षो दंडी कुंडली तिष्ठति," शुक्लेन वाससा यवनिकां संपादयेत् "नीलमुत्पलमानय" “नीलोत्पलमानय,” गामानय शुक्लां शोभनाक्षीम् “अग्नये पथिकृते पुरोडाशमष्टकपालं निर्वपेत्” इति। एवम्--"अरुण्यैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इति। 'कपड़ा लाल होता है' इस उदाहरण में अर्थगत ऐक्य होने से, एक वाक्यता है वस्त्र का होना क्रिया से संबंध दिखलाना ही वाक्य का प्रयोजन है। उसके रंग का संबंध तो रक्तवर्ण से ही प्रतीत होता है "राग संबंधी द्रव्य पट है" केवल इतना अर्थ ही सामानाधिकरण्य से ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्यान्य सामानाधिकरण्य के प्रसंगों में प्रयुक्त ankurnagpal108@gmail.com

( ३३२ ) पदसमूह समष्टि रूप हों अथवा पृथक्-पृथक् हों, दोनों ही स्थिति में, एक दो या अनेक गुण विशेषित वस्तु का बोध कराकर, सामानाधिकरण्य से समस्त विशेषणों से विशिष्ट वस्तु एक है, यही प्रतिपादन किया जाता है। इसलिए समस्त विशेषण विशिष्ट वस्तु का जो क्रिया विशेष के साथ संबंध दिखलाया जाता है उसमें कोई विरोध नहीं है। "श्यामवर्ण- वाला युवा रतनारे नैन का कुण्डलधारी देवदत्त लाठी लेकर खड़ा है", "धवल वस्त्र से परदा बनावेगा" "नीले रंग का कमल लाओ", श्वेत आँखों वाली गाय लाओ", "पथिकृत अग्नि के लिए अष्टकपाल ( आठपात्रों मे क्षोधित ) पुरोडाश ( पिष्टक के प्रकरण का एक खाद्य विशेष ) दूँगा" इत्यादि उदारहणों की तरह "रक्तवर्णा, एकहायनी, कपिलनेत्री गाय से सोम खरीदता है" इस उदाहरण मे भी सामानाधिकरण्य विशिष्ट का एकत्व प्रतिपादन करना चाहिये। एतदुक्तं भवति-यथा-"काष्ठैःस्थाल्यामोदनंपचेत्" इत्यनेक- कारकविशिष्टैकाक्रिया युगपत् प्रतीयते, तथा समानाधिकरण- पदसंघाताभिहितमेकैकंकारकं तत्तत्कारकप्रतिपत्तिवेलायामेवानेक- विशेषणविशिष्टं युगपत् प्रतिपन्नं क्रियायामन्वेतीति न कश्चिद् विरोधः "खादिरैः शुष्कैः काष्ठैः समपरिमाणे भाण्डे पायसं शाल्यो- दनं समर्थः पाचकः पचेत्, इत्यादिषु" इति। कथन यह है कि- "सूखी लकड़ियों से बटुये में चावल पकाता है" इस उदाहरण में जैसे एक साथ ही काष्ठादि अनेक कारक विशिष्ट एक क्रिया का ज्ञान होता है, सामानाधिकरण्य के प्रसंग में भी वैसे ही, पद समूह में प्रयुक्त एक-एक कारक की जब प्रतिपत्ति की जाती है, तब उन सबका एक साथ अनेक विशेषण विशिष्ट क्रिया में, निर्विरोध समन्वय हो जाता है। जैसे कि-"सूखी लकड़ियों मे उचित परिमाण वाले पात्र में शाली के चावल की खीर चतुर रसोइया पकाता है" इत्यादि में एक क्रिया से संबंद्ध कारकों में कोई विरोध नहीं है। यत्तूपात्तद्रव्यकवाक्यस्थगुणशब्दः केवल गुणाभिधायीत्यरुण- येति पदेन केवलगुणस्यैवाभिधानमिति तन्नोपपद्यते, लोकवेदयो-

( ३३३ ) द्रव्यवाचिपद समानाधिकरणस्य गुणवाचिनः क्वचिदपि केवल- गुणाभिधानादर्शनात् । उपस्थितद्रव्यवाक्यस्थं गुणपदं केवलगुणाभि- धायोत्यप्यसंगतम् । "पटः शुक्लः" इत्यादिषूपात्तद्रव्यकेऽपि गुण- विशिष्टस्यैवाभिधानात् । "पटस्य शुक्लः" इत्यत्र शौक्ल्यविशिष्ट पटाप्रतिपत्तिरसमानविभक्ति निर्देशकृता, न पुनरुपात्तद्रव्यकत्व कृता तत्रैव "पटस्य शुक्लो भागः" इत्यादिषु समानविभक्तिनिर्देशे शोक्ल्यविशिष्ट द्रव्यं प्रतीयते । यत्पुनः क्रयस्यैक हायन्यवरुद्धतयाऽ- रुणिम्नः क्रयान्वयो न संभवतीति, तदपि विरोधिगुणरहित द्रव्य- वाचिपद समानाधिकरणगुणपदस्य तदाश्रयगुणाभिधानेन क्रिया- पदान्वयाविरोधादसङ्गतम् । राद्धान्ते चोक्तन्यायेनारुणिम्नः शब्दे द्रव्यान्वये सिद्धे द्रव्यगुणयोः क्रमसाधनत्वानुपपत्त्या अर्थात् परस्परा- न्वयः सिद्ध्यतीत्यप्यसंगतम् । अतोयथोक्त एवार्थः । और जो यह कहते हैं कि-जिस वाक्य में द्रव्यवाचक पद का उल्लेख होता है, उस वाक्य का गुणवाचक शब्द, उस गुण का ही बोधक होता है, इसलिए 'अरुणया' पद से केवल गुण का ही अनुमान करेंगे ( उसको द्रव्य की विशेषता नहीं मानेंगे ) ( मेरी दृष्टि में ) ऐसा मानना संगत् न होगा, क्योंकि लौकिक व्यवहार या वैदिक भाषा में कहीं भी, द्रव्य वाचक शब्द के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त गुणवाचक पद को, केवल गुणमात्र ही माना गया हो, ऐसा उदाहरण नहीं मिलता । द्रव्यवाचक पद वाले वाक्य में आए हुये गुणवाचक पद की, एकमात्र गुणबोधकता असंगत भी है। द्रव्यवाचक पद घटित "सफेद वस्त्र" इस वाक्य में भी गुणविशिष्टार्थ का प्रतिपादन किया गया है ।" कपड़े की सफेदी" इस वाक्य में, शुक्ल गुण विशिष्ट पद की प्रतीत नहीं होती, क्योंकि—इसमें असमान विभक्ति दीखती है। द्रव्य संबंध से यहाँ गुण विशिष्टता की प्रतीति न हो रही हो, सो बात नहीं है । कपड़े का सफेद हिस्सा इस वाक्य में समान विभक्ति है, इसमें शुक्ल गुण विशिष्ट द्रव्य की प्रतीति होती है । ankurnagpal108@gmail.com

( ३३४ )

और फिर जो यह कहा कि—समीपवर्त्ती "एकहायनी" पद के साथ "क्रय ' का संबंध हो सकता है "अरुणिम" पद के साथ नहीं हो सकता, सो यह भी असंगत बात है, क्योंकि—यह नियम है कि—गुण- वाची पद के साथ यदि द्रव्यवाची पद का सामानाधिकरण्य होता है और उस द्रव्य का किसी अन्य विरुद्ध गुण का संबंध नहीं होता तो सामाना- धिकरण विशिष्ट गुणवाची पद की आश्रित जो गुण बोधकता है, उसका क्रियापद से निर्विरोध समन्वय हो जाता है । उपर्युक्त नियमानुसार सिद्धान्त "अरुणिमा" शब्द का अन्वय सिद्ध हो जाने पर भी, द्रव्य और गुण दोनों का क्रय साधनता में समन्वय न मानें, अर्थात् परस्पर समन्वय की बात सिद्ध हो जाने पर भी, यह असंभावना बनी रहे, यह भी असंगत बात है [ निर्णयपूर्वक सिद्ध हो जाने पर भी यह कहते रहें कि— द्रव्य और गुण का क्रय साधन में समन्वय नहीं हो सकता, यह हठवाद मात्र है ] उपर्युक्त बात ही यथार्थ है ।

तस्मात् तत्त्वमस्यादि सामानाधिकरण्ये पदद्वयाभिहित [L15

( ३३५ ) यदि कहें कि-यदि ऐसा मानने पर भी, समानाधिकरण पदों के समस्त विशेषण विशिष्ट पदार्थों की एकता होने से, "त्वं" पदवाची जीवात्मा के संपूर्ण दोष परमात्मा में भी प्रसक्त हो जावेंगे ? नहीं "त्वं" पद से भी, जीवान्तर्यामी परमात्मा ही मान लें तो, दोष प्रसक्ति का प्रश्न ही नहीं उठेगा । एतदुक्तं भवति सच्छब्दाभिहितं निरस्तनिखिलदोषगन्धं सत्यसंकल्पमिश्रानवधिकातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणं समस्त कारणभूतं परंब्रह्म "बहुस्याम्" इति संकल्प्य तेजोबन्नप्रमुखं कृत्स्नं जगत् सृष्ट्वा तस्मिन् देवादि विचित्रसंस्थानसंस्थिते जगति चेतनं जीववर्गं स्वकर्मानुगुणेषु शरीरेष्वात्मतया प्रवेश्य स्वयं च स्वेच्छयैव जीवान्तरात्मतयाऽनुप्रविश्य एवम्भूतेषुश्वपर्यन्तेषुदेवाद्याकारेषु- संघातेषु नामरूपे व्याकरोत् । एवं रूपं संघातस्यैव वस्तुत्वं शब्द वाच्यत्व चाकरोदित्यर्थः । अनेनजीवेनात्मना जीवेनात्मेति निर्देशो जीवस्य ब्रह्मात्मकत्वं दर्शयति । ब्रह्मात्मकत्वं च जीवस्य जीवान्त- रात्मतया ब्रह्मणोऽनुप्रवेशादित्यवगम्यते "इदसर्वमसृजत् यदिदं किं च तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत तदनु प्रविश्य सच्चत्यच्चा- भवत् ।" इति अत्रेदं सर्वमिति निर्दिष्टं चेतनाचेतनवस्तुद्वयं सत्यच्छब्दाभ्यां विज्ञानाविज्ञानशब्दाभ्यां च विभज्य निर्दिश्य चिद् वस्तुन्यपि ब्रह्मणोऽनुप्रवेशाभिधानात् । अतएव नामरूप व्याकर- णात् सर्वे वाचकाः शब्दाः, अचिज्जीवविशिष्टपरमात्मवाचिन् इत्यवगतम् । कथन यह है कि-समस्त दोषों से रहित, अवधि और संख्या रहित, सर्वाधिक, सत्य संकल्प इत्यादि कल्याणमय गुणों से युक्त, सर्व- कारण वह ब्रह्म "सत्" शब्द से संबोधित किये गए हैं, उन्होंने 'एक से अनेक हो जाऊँ" इस संकल्प से तेज जल आदि समस्त जगत की सृष्टि करके, देवता आदि विभिन्न रूपों वाले शरीरों में, चेतन जीवों के गुण- कर्मानुसार आत्मा रूप से प्रविष्ट कराके स्वयं ही स्वेच्छा से, जीवों में

( ३३६ ) अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर देवता आदि जीवों और स्वयं अपने भी नामरूप को व्यक्त किया। अर्थात् जड़ चेतन और ईश्वरात्मक जगत् समष्टि की सत्ता की वस्तुता और शब्दवाच्यता का संपादन किया। ‘इस जीवात्म रूप में अपने को ही’ इत्यादि श्रौतवाक्य में भी जीव का ब्रह्मात्मभाव दिखलाया गया है। जीवान्तरात्मा के रूप में ब्रह्म के अनु- प्रवेश से ही जीव के ब्रह्मात्म भाव का स्पष्ट ज्ञान होता है। जैसा कि- श्रौतवाक्यों से भी स्पष्ट है—‘सृष्टि करके वे उसी में प्रविष्ट हो गए” “प्रविष्ट होकर वे सत् और त्यत् हो गए” इत्यादि। यहाँ “इदं सर्वम्” का तात्पर्य जड चेतन दोनों से है। सत् और त्यत् शब्द से भी विज्ञान और अविज्ञान के भेद को बतला कर चिद् (जीव) में ब्रह्म के अनुप्रवेश का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-नाम रूप के बोधक सारे शब्द, अचित् जीवविशिष्ट परमात्मा के बोधक हैं। किञ्च “ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इति चेतन मिश्रं प्रपंचं इदं सर्वमिति निर्दिश्य “तस्यैष आत्मा” इति प्रतिपादितम्। एवं च सर्वचेतनाचेतनंप्रति ब्रह्मण आत्मत्वेन सर्वं अचेतनं जगत् तस्य- शरीरं भवति। तथा च श्रुत्यन्तराणि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम् यः पृथिवीमन्तरो यमयति। स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः “इति आरभ्य” य आत्मनि तिष्ठन् आत्म- नोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽत्मा शरीरम्, य आत्मानमंतरो यमयति, स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्यादि। “यः पृथिवीमंतरे संचरन्, यस्य पृथिवी शरीरम्। योऽपामन्तरे संचरन् यस्यापश्- शरीरं” इत्यारभ्य ‘योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरम्, यमक्षरं न वेद, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इत्यादीनि सचेतनं जगत् तस्य शरीरत्वेन निर्दिश्य तस्यात्मत्वेन परमात्मानमुपदिशन्ति, अतश्चेतन वाचनोऽपि शब्दाः चेतनस्याप्या त्मभूतं चेतनशरीरकम् परमात्मानमेवाभिदधति। यथा अचेतन

( ३३७ ) देवादिसंस्थानपिण्डवाचिनः शब्दाः तच्छरीरकजीवात्मन एव वाचकाः “चत्वारः पंचदशरात्रात् देवत्वं गच्छन्ति” इत्यादिषु, देवा भवन्ति इत्यर्थः । अधिक क्या—"यह सब ब्रह्मात्मक है" इस वाक्य से चेतन मिश्रित प्रपंच जगत को "इदंसर्वम्" द्वारा बतलाकर "वही इसका आत्मा है" ऐसा ब्रह्मात्मभाव का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार सारा चेतन अचेतन जगत ब्रह्मात्मक होने से सचेतन है और उस ब्रह्म का शरीर है । तथा अन्य श्रौत वाक्य भी—'वही जन समूह के अन्तस्थ शासक और सर्वात्मा हैं, जो कि पृथिवी में अन्तर्यामी रूप से नियमन करते हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पृथिवी उनका शरीर है, वही अमृत स्वरूप परमात्मा तुम्हारे अन्तर्यामी हैं” “जो आत्मा में विराजते हैं, आत्मा से भिन्न हैं, आत्मा उन्हें नहीं जानता, आत्मा ही उनका शरीर है, जो अन्तर्यामी रूप से आत्मा का संयमन करते हैं, वही अमृत स्वरूप, तुम्हारे अन्तर्यामी आत्मा है ।” तथा— 'जो पृथिवी में संचरण करते हैं, पृथिवी उनका शरीर है, जो जल में संचरण करते हैं, जल उनका शरीर है” “जो अक्षर (जीव) में संचरण करते हैं, अक्षर ही उनका शरीर है, अक्षर जिन्हें नहीं जानता, वह नारायण ही सब भूतों के अंतरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, द्योतमान एक और अद्वितीय है” इत्यादि—सचेतन जगत को उनका शरीर बतलाकर उस जगत के आत्म स्वरूप परमात्मा का उपदेश दिया गया है । अचेतन वाचक शब्द समूह भी, चेतन शरीर धारी तथा चेतन के भी आत्मभूत परमात्मा के ही, अभिधायक हैं । जैसे कि—"पंद्रह दिन के अनुष्ठान से चारो देवत्व प्राप्त करते हैं" अर्थात् देवता होते हैं । इत्यादि । शरीरस्य शरीरिणंप्रति प्रकारत्वात् प्रकारवाचिनां च शब्दानां प्रकारिण्येव पर्यवसानात् शरीरवाचिनांशब्दानां शरीरि- पर्यवसानं न्याय्यम् । प्रकारो हि नाम इदमित्थमिति प्रतीयमाने वस्तुनि इत्थमिति प्रतीयमानोंऽशः । तस्य तद् वस्त्वपेक्षत्वेन तत्प्रती- तेस्तदपेक्षत्वात् तस्मिन्नेव पर्यवसानं युक्तमिति तस्य प्रतिपादकोऽपि

( ३३८ )

शब्दस्तस्मिन्नेव पर्यवस्यति। अतएव "गौरश्वो मनुष्यः" इत्या- दिप्रकारभूताकृतिवाचिनः शब्दाः प्रकारिणि पिण्डे पर्यवस्यन्तः पिण्डस्यापि चेतन शरीरत्वेन तत्प्रकारत्वात् पिण्डशरीरक चेतन- स्यापि परमात्मप्रकारत्वाच्च परमात्मन्येव पर्यवस्यतीति सर्व- शब्दानां परमात्मैव वाच्य इति परमात्मवाचिशब्देन सामामाधि- करण्यं मुख्यमेव। शरीर शरीरी का एक ही प्रकार है अत. प्रकार वाचक शब्द का प्रकारी में ही पर्यवसित होना स्वाभाविक है, इसलिए शरीर वाचक शब्दों का शरीरी में ही पर्यवसान होना चाहिए। "यह ऐसा है" इस वाक्य में "ऐसा है" यह वाक्यांश वस्तु के प्रकार का ही बोधक है। प्रकार वस्तुसापेक्ष होता है। वस्तु की प्रतीति, प्रकार अपेक्षित होती है, इसलिए वस्तु में उसके प्रकारवाची शब्द का पर्यवसान स्वाभाविक ही है, उसका प्रतिपादक शब्द भी उसी में पर्यवसित हो जाता है। "गो- मनुष्य-अश्व" इत्यादि प्रकारभूत, आकृतिवाचक, प्रकारी के देहपिण्ड के अर्थ में पर्यवसित शब्द, उन शरीरों में जो चेतनता है उसके प्रकार का बोध कराते हैं। वह देह विशिष्ट चेतन, परमात्मा का प्रकार मात्र है, इसलिए शब्दों के अर्थों का पर्यवसान उस परमात्मा में ही है। सभी शब्दों का वाच्यार्थ परमात्मा ही है। इस प्रकार परमात्मवाची शब्दों के साथ जो सामानाधिकरण्य है, वह मुख्य ही है (गौण नहीं) ननु "खण्डो गौः खण्डः शुक्लः" इति जातिगुणवाचिनामेव पदानां द्रव्यवाचिपदैः सह सामानाधिकरण्यं दृष्टं, द्रव्याणांतु द्रव्यान्तर प्रकारत्वे मतुबर्थीयप्रत्ययो दृष्टः यथा-"दण्डी कुण्डली" इति, नैवम् जातिर्गुणो वा द्रव्यं वा नैतेष्वेकमेव सामानाधिकरण्ये प्रयोजकम्, अन्योन्यस्मिन् व्यभिचारात्, यस्य पदार्थस्य कस्यचित् प्रकारतयैव सद्भावः, तस्य तदपृथक् सिद्धिस्थितिप्रतीतिभिः तद् वाचिनां शब्दानां स्वाभिधेयविशिष्टद्रव्यवाचित्वात् धर्मान्तरविशिष्ट-

( ३३६ ) तद्द्रव्यवाचिनाशब्देन सामानाधिकरण्यं युक्तमेव । यत्र पुनः पृथक्सि- द्धस्य स्वनिष्ठस्यैव द्रव्यस्य कदाचित्क्वचिद्द्रव्यान्तरप्रकारत्व- मिष्यते, तत्र मत्वर्थीयप्रत्यय इति निरवद्यम् । संदेह होता है कि “खण्ड गौ, शुक्ल खण्ड” आदि वाक्यों में जाति गुणवाची (गो और शुक्ल) पदों के साथ सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख रहा है, किन्तु द्रव्यवाची पदों के अन्य प्रकारक द्रव्यों के साथ मत्वर्थीय प्रत्यय वाले “दण्डी-कुण्डली” ऐसे प्रयोग भी देखे जाते हैं [अर्थात् विशेषण विशेष्य के अलग-अलग होने पर तो दोनों पदों का सामानाधिकरण्य मुख्य होता ही है, परन्तु मत् प्रत्यय से निष्पन्न विशेषण-विशेष्य युक्त “दण्डी कुण्डली” आदि प्रयोगों में सामानाधिकरण्य मुख्य है या गौण ?] उत्तर-बात ऐसी नहीं है-अपितु जाति, गुण अथवा द्रव्य इन तीनों की एकता सामानाधिकरण्य में प्रयोजक नहीं है, क्यों कि इनमें परस्पर व्यभिचार रहता है। जिस पदार्थ की किसी अन्य प्रकार (विशेषण) से ही स्थिति ज्ञात होती है; उसकी उस प्रकार (विशेषण) से अपृथक् सिद्ध स्थिति, प्रतीति से भी अभिन्न ही रहती है [अर्थात् उस पदार्थ की सत्ता और प्रतीति विशेषण से ही होती है] प्रकार (विशेषण) द्वारा पदार्थ के बोधक शब्दों की अभिधेयविशिष्ट वाचकता होने से, अन्य विशिष्ट गुणों को धारण करने वाले, उसी द्रव्य के बोधक शब्दों के साथ सामानाधि- करण्य युक्ति संगत हैं, असंगत नहीं। जहाँ कभी, पृथक् सिद्ध स्वनिष्ठ द्रव्य की, अन्य द्रव्य की प्रकारता से ही प्रतीति होती है, वहाँ मत्वर्थीय प्रत्यय ही उचित अर्थ बोधक होता है । तदेवं परमात्मनः शरीरतया तत्प्रकारत्वादचिद्विशिष्ट जीवस्यापि जीवनिर्देशविशेषरूपा अहंत्वमित्यादि शब्दाः परमात्मा- नमेवाऽचक्षत इति । “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्येनोपसंहृतम्, एवं च सति परमात्मानं प्रति जीवस्य शरीरतयाऽन्वयाज्जीवगता धर्माः परमात्मानं न स्पृशन्ति । यथास्वशरीरगता बालत्वयुवत्व- स्थविरत्वादयो धर्माः जीवं न स्पृशन्ति । श्रतः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये तत्पदं जगत्कारणभूतं सत्यसंकल्पं सर्वकल्याण-