श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३६ ) तद्द्रव्यवाचिनाशब्देन सामानाधिकरण्यं युक्तमेव । यत्र पुनः पृथक्सि- द्धस्य स्वनिष्ठस्यैव द्रव्यस्य कदाचित्क्वचिद्द्रव्यान्तरप्रकारत्व- मिष्यते, तत्र मत्वर्थीयप्रत्यय इति निरवद्यम् । संदेह होता है कि “खण्ड गौ, शुक्ल खण्ड” आदि वाक्यों में जाति गुणवाची (गो और शुक्ल) पदों के साथ सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख रहा है, किन्तु द्रव्यवाची पदों के अन्य प्रकारक द्रव्यों के साथ मत्वर्थीय प्रत्यय वाले “दण्डी-कुण्डली” ऐसे प्रयोग भी देखे जाते हैं [अर्थात् विशेषण विशेष्य के अलग-अलग होने पर तो दोनों पदों का सामानाधिकरण्य मुख्य होता ही है, परन्तु मत् प्रत्यय से निष्पन्न विशेषण-विशेष्य युक्त “दण्डी कुण्डली” आदि प्रयोगों में सामानाधिकरण्य मुख्य है या गौण ?] उत्तर-बात ऐसी नहीं है-अपितु जाति, गुण अथवा द्रव्य इन तीनों की एकता सामानाधिकरण्य में प्रयोजक नहीं है, क्यों कि इनमें परस्पर व्यभिचार रहता है। जिस पदार्थ की किसी अन्य प्रकार (विशेषण) से ही स्थिति ज्ञात होती है; उसकी उस प्रकार (विशेषण) से अपृथक् सिद्ध स्थिति, प्रतीति से भी अभिन्न ही रहती है [अर्थात् उस पदार्थ की सत्ता और प्रतीति विशेषण से ही होती है] प्रकार (विशेषण) द्वारा पदार्थ के बोधक शब्दों की अभिधेयविशिष्ट वाचकता होने से, अन्य विशिष्ट गुणों को धारण करने वाले, उसी द्रव्य के बोधक शब्दों के साथ सामानाधि- करण्य युक्ति संगत हैं, असंगत नहीं। जहाँ कभी, पृथक् सिद्ध स्वनिष्ठ द्रव्य की, अन्य द्रव्य की प्रकारता से ही प्रतीति होती है, वहाँ मत्वर्थीय प्रत्यय ही उचित अर्थ बोधक होता है । तदेवं परमात्मनः शरीरतया तत्प्रकारत्वादचिद्विशिष्ट जीवस्यापि जीवनिर्देशविशेषरूपा अहंत्वमित्यादि शब्दाः परमात्मा- नमेवाऽचक्षत इति । “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्येनोपसंहृतम्, एवं च सति परमात्मानं प्रति जीवस्य शरीरतयाऽन्वयाज्जीवगता धर्माः परमात्मानं न स्पृशन्ति । यथास्वशरीरगता बालत्वयुवत्व- स्थविरत्वादयो धर्माः जीवं न स्पृशन्ति । श्रतः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये तत्पदं जगत्कारणभूतं सत्यसंकल्पं सर्वकल्याण-