भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३४० ) गुणाकरं निरस्तसमस्तहेयगन्धंपरमात्मानमाचष्टे, त्वमिति च तमेव सशरीर जीव शरीरकमाचष्ट इति सामानाधिकरण्यं मुख्यवृत्तम्, प्रकरणविरोधः सर्वश्रुत्यविरोधो ब्रह्मणि निरवद्ये कल्याणैकताने अविद्यादिदोषगंधाभावश्च। अतोजीव सामाना- धिकरण्यमपि विशेषणभूताज्जीवात् अन्यत्वमेवापादयतीति विज्ञान- मयाज्जीवादन्य एव आनंदमयः परमात्मा। इस प्रकार अचिद् विशिष्ट जीव जो कि परमात्मा का शरीर है, वह उसकी प्रकारता (धर्म स्वरूप) का बोधक है, और ऐसा मानने पर अचिद् विशिष्ट जीव निर्देशक "मैं और तुम" इत्यादि संबोधन भी परमात्मा के ही बोधक हैं। ऐसा ही "तत्त्वमसि" इस सामानाधिकरण्य वाक्य में भी है। ऐसा मानने से, देह स्वरूप जीव के धर्म शरीरी परमात्मा का स्पर्श नहीं कर सकते जैसे कि-बचपन, जवानी बुढापा आदि शरीरिक धर्म जीव को स्पर्श नहीं करते। "तत्त्वमसि" वाक्य में "तत्" शब्द जगत के कारण सत्यसंकल्प सर्वकल्याणगुणाकर निर्दोष परमात्मा का बोधक है तथा "त्वम्" पद भी उसी जीव रूपी शरीर वाले शरीरी परमात्मा का ही बोधक है। इस प्रकार सामानाधिकरण्य निर्बाध रूप से सिद्ध हो जाता है तथा निर्दोष, सर्व कल्याण प्रवण ब्रह्म के विषय में प्रकरण या श्रुति विरोध भी नहीं होता। सामानाधिकरण्य में विशेषणीभूत जीव से परमात्मा की भिन्नता भी प्रतिपादित हो जाती है, इससे सिद्ध होता है कि विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। यदुक्तम्—"तस्यैष एव शारोर आत्मा" इत्यानंदमयस्य शारोरत्व श्रवणाज्जीवादन्यत्वं न संभवति-इति, तदयुक्तम्, अस्मिन् प्रकरणे सर्वत्र "तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य" इति परमात्मन एव शारीरात्मत्वाभिधाने कथं 'तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन् आकाशः संभूतः" इत्याकाशादिसृज्यवर्गस्य परमकारणत्वेन ankurnagpal108@gmail.com