श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 401, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४१ )
प्रज्ञातजीवव्यतिरेकस्य परस्य ब्रह्मण आत्मत्वेन व्यपदेशात्तद्व्यतिरिक्ता- काशादीनामन्नमयपर्यन्तानां तच्छरीरत्वमवगम्यते । “यस्य पृथिवी शरीरं, यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः शरीरं, यस्यवायुः शरीरं, यस्याकाशः शरीरं, यस्याक्षरं शरीरं, यस्य मृत्युः शरीरं, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः” इति सुबालश्रुत्या सर्वतत्त्वानां परमात्म शरीरत्वं स्पष्टमभिधीयते । जो यह कहते हैं कि-“यह शरीर (जीव) ही आत्मा है” इस उदा- हरण में आनन्दमय को शरीरी रूप से वर्णन किया गया है, इसलिए जीवात्मा के अतिरिक्त दूसरा शरीरी नही हो सकता । यह कथन युक्ति- युक्त नहीं है, क्यों कि-आनन्दमय के प्रकरण में सभी जगह “यही उसका शरीर (शरीराभिमानी) आत्मा है, जो कि पूर्वतन का आत्मा है” इस प्रकार परमात्मा को ही शरीरी कहा गया है, “इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इस उदाहरण में सृज्यमान आकाश की तरह, आकाश से लेकर अन्नमय तक सभी पदार्थों को परमात्मा का शरीर बतलाया गया है जो कि-जीव से भिन्न, परम कारण परमात्मा की आत्मरूपता का द्योतक है । “पृथिवी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है तेज जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर है अक्षर (जीव) जिसका शरीर है, मृत्यु (पंचभूत) जिसका शरीर है, ऐसे सर्वान्तर्यामी निर्दोष निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं ।” ऐसी सुबाल श्रुति से, सभी तत्त्वों की परमात्म शरीरता स्पष्ट बतलाई गई है । अतः “तस्माद् वा एतस्मादात्मनः” इत्यत्रैवान्नमयस्य परमा- त्मैव शारीर आत्मेत्यवगतः । प्राणमयं प्रकृत्याह-“तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य’ इति । पूर्वस्यान्नमयस्य यः शारीर आत्मा श्रुत्यन्तरसिद्धः परमकारणभूतः परमात्मा, स एव तस्य प्राणमय स्यापि शारीर आत्मेत्यर्थः । एवं मनोमयविज्ञानमययोर्द्रष्टव्यम् आनंदमयेतु “एष एव” इति निर्देशः तस्य अनन्यात्मत्वं दर्शयितुं तत्कथंविज्ञानमयस्यापि पूर्वोक्त्या नीत्या परमात्मैव शारीर आत्मेत्य