श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवंगतः । एवं सति विज्ञानमयस्य यः शारीर आत्मा स एव आनन्द- मयस्यापि शारीर आत्मेत्युक्ते आनन्दमयस्य अभ्यासावगतपरमात्म- भावस्य परमात्मनः स्वयमेवात्मेत्यवगम्यते । एवं च व्यतिरिक्तं चेतनाचेतनवस्तुजातं स्वशरीरमिति स एव निरुपाधिकः शारीर आत्मा श्रतएवेदं परं ब्रह्माधिकृत्य प्रवृत्तं शास्त्रं शारीरकमित्यभि- युक्तैरभिधीयते । श्रतो विज्ञानमयाज्जीवादन्य एव परमात्मा आनन्दमयः ।
“तस्माद्वा” इत्यादि उदाहरण में उल्लेक्ष्य अन्नमय के शारीर आत्मा परमात्मा ही ज्ञात होते हैं । प्राणमय के शरीरी भी परमात्मा हैं, ऐसा “तस्यैष एव आत्मा” श्रुति में बतलाया गया है । इस श्रुति का तात्पर्य है कि—“जो पूर्व कोष अन्नमय के शारीर आत्मा हैं जो कि- अन्यान्य श्रुतियों में परमकारणभूत परमात्मा के नाम से अभिव्यक्त हैं वे ही उस प्राणमय के शरीर आत्मा हैं ।” ऐसा ही मनोमय और विज्ञानमय के लिए भी समझना चाहिए । आनंदमय प्रकरण में तो “यही” शब्द उनके अन्यात्मत्व का निर्देशक है । विज्ञानमय प्रकरण में भी पूर्वोक्त नीति के अनुसार परमात्मा ही शारीर आत्मा ज्ञात होते हैं इसी प्रकार जो विज्ञानमय का शारीर आत्मा है वही आनंदमय का भी शारीर आत्मा है, आनन्दमय का बार-बार उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि- परमात्मभाव को प्राप्त स्वयं परमात्मा ही अपने आत्मा हैं । परमात्मा से भिन्न चेतन अचेतन सभी वस्तुएं उनकी शरीर स्थानीय हैं, वे ही सब के निरुपाधि (स्वाभाविक) शारीर आत्मा है । इसी लिए परब्रह्म के प्रतिपादक इस शास्त्र को विद्वद्गण ‘शारीरक मीमांसा’ नाम से परिचय कराते हैं । इससे निश्चित होता है कि-विज्ञानमय जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है ।
आह—नायमानंदमयो जीवादन्यः विकार शब्दस्य मयट् प्रत्य- यस्य श्रवणात् “मयड्वैतयोः” प्रकृत्य “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” इति विकारार्थे मयट् स्मर्यते । वृद्धश्चायमानन्दशब्दः ।