भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

( ३४३ ) (वाद) कहते हैं कि-आनंदमय जीव से भिन्न नहीं है, क्यों कि मयट् प्रत्यय का प्रयोग विकार अर्थ में किया जाता है। “मयट् वैतयो- र्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः "अर्थात् अभक्ष्य और आच्छादन को छोड़कर प्रकृतिमात्र में वैकल्पिक मयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है। तथा “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” (वृद्धशर आदि में नित्यमयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है इन दो पाणिनीय व्याकरण सूत्रों में विकारार्थक मयट् प्रत्यय का विधान किया गया है । आनंदमय शब्द वृद्ध संज्ञक है । ननु-प्राचुर्येऽपि मयडस्ति “तत्प्रकृतवचने मयट्” इति स्मृतेः । यथा “अन्नमयो यज्ञः” इति । स एवायम् भविष्यति । नैवम् अन्न- मय इत्युपक्रमे विकारार्थत्वं दृष्टम् अत श्रौचित्यादस्यापि विकारा- र्थत्वमेव युक्तम् । (विवाद) नहीं- प्राचुर्य्य अर्थ में भी मयट् प्रत्यय होता है, “तत्प्र- कृतवचने मयट्” ( प्राचुर्य्य प्रतिपादक अर्थ में मयट् होता है ) ऐसा पाणिनीय सूत्र है “अन्नमय यज्ञ” ऐसा प्राचुर्य्यार्थक प्रयोग भी होता है, उसी प्रकार आनंदमय में भी होगा । (वाद) ऐसा नहीं है, “अन्नमय विज्ञानमय” आदि के उपक्रम में स्पष्ट विकारार्थ की प्रतीति हो रही है, उचित भी यही है कि, शब्द से जो प्राथमिक वाच्यार्थलब्ध हो उसे ही अन्ततः माना जाय, इसलिए आनंदमय में विकारार्थ ही युक्ति संगत है । किं च-प्राचुर्य्यार्थत्वेऽपि जीवादन्यत्वं न सिध्यति, तथाहि आनंद प्रचुर इत्युक्ते दुःखमिश्रत्वमवर्जनीयम् । आनंदस्य हि प्राचुर्यं दुःखस्याल्पत्वमवगमयति । दुःखमिश्रत्वमेव हि जीवत्वम् । अर्थ श्रौचित्यप्राप्त विकारार्थत्वमेव युक्तम् । यदि ऐसा न भी मानें, प्राचुर्य्य अर्थ ही मानलें, तब भी जीव की परमात्मा से भिन्नता सिद्ध नहीं होती प्रचुर आनंद कहने से दुःख मिश्रण अनिवार्य हो जाता है, आनंद की प्रचुरता दुःख की अल्पता बतलाती । दुःख मिश्रता ही जीवत्व है । इसलिए विकारार्थ ही उचित है । ankurnagpal108@gmail.com