श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४४ ) किंच-लोके मृण्मयं हिरण्मयं दारुमियमित्यादिषु वेदे च "पर्णमयी जुहू" शमीमयी अ्रसस्तु च "दर्भमयी रसना" इत्यादिषु मयटो विकारार्थे प्रयोग बाहुल्यत्वात् स एव प्रथमतरां धियमधि- रोहति । जीवस्य चानंदविकारत्वमस्त्येव । तस्य स्वत आनंद- रूपस्य सतः संसारितावस्था तद्विकार एवेति । अतो विकार वाचिनो मयट् प्रत्ययस्य श्रवणादानंदमयो जीवादनतिरिक्त इति । तदेतदनुभाष्य परिहरति । तथा-"मृन्मय" हिरण्मय "दारुमय' इत्यादि लौकिक तथा "पर्णमयी जुहू" शमीमय श्रुवाये "दर्भमयी रसना' इत्यादि वैदिक प्रयोगो में विकारार्थ का ही बाहुल्य मिलता है, इसलिए मयट् का विकारार्थ ही सबसे प्रथम बुद्धि में आरूढ होता है। जीव का आनंद विकृत ही है, स्वभावतः जीव आनंद स्वरूप है, संसारदशा में वह आनंद विकृत हो जाता है इसलिए विकारवाची मयट् प्रत्यय का वर्णन होने से निश्चित होता है कि—"आनन्दमय" तत्त्व जीव से अभिन्न वस्तु है। इस प्रकार के मत का विवेचन करते हुए परिहार करते है— विकार शब्दान्नेतिचेन्न प्राचुर्यात् १।१।१४ नैतद्युक्तं, कुतः ? प्राचुर्यात्-परस्मिन् ब्रह्मण्यानन्दप्राचुर्यात् । प्राचुर्यार्थे च मयटस्संभवात् । एतदुक्तं भवति-शतगुणितोत्तरक्रमे- णाभ्यस्यमानस्यांनंदस्य जीवाश्रयत्वासंभवात् ब्रह्माश्रयोऽयमानंद इतिनिश्चिते सति तस्मिन् ब्रह्मणि विकारासंभवात् प्राचुर्येऽपि मयड्विधिसंभवाच्चानंदमयः परंब्रह्म-इति । यह कहना ठीक नही है कि-जीवात्मा ही आनंदमय है, क्यों कि- परब्रह्म में आनंद की प्रचुरता है, इसलिए यह शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त किया गया है। प्राचुर्यार्थ में भी मयट् होता है। शतगुणितोत्तर क्रम से बार बार जिस आनंद की अनुवृत्ति की गई है, वह जीव में कदापि संभव नहीं है। वह तो ब्रह्म में ही संभव है, उस ब्रह्म में विकार की शून्यता तथा प्राचुर्यार्थ में भी मयट् विधि के होने से यह निश्चित होता है कि-परब्रह्म ही आनंदमय है। ankurnagpal108@gmail.com