श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४५ ) औचित्यात् प्रयोग प्रौढ्याच मयटो विकारार्थत्वमर्थविरोधान्न संभवति । किंच औचित्यं प्राणमय एव परित्यक्तम् तत्र विकारा- र्थत्वासंभवात् । अतस्तत्र पंचवृत्तेर्वायोः प्राणवृत्तिमत्तामात्रेण प्राणमयत्वम्, प्राणापानादिषु पंचषु वृत्तिषु प्राणवृत्तेः प्राचुर्याद्वा । न च प्राचुर्ये मयट् प्रत्ययस्य प्रौढिर्नास्ति “अन्नमयो यज्ञः, शकटमयी यात्रा” इत्यादिषु दर्शनात् । औचित्य और प्रयोग प्रौढ़ि से भी मयट् का विकारार्थत्व, अर्थ विरोध होने से, संभव नहीं है। प्राणमय में तो प्रचुरार्थ मानना ही उचित था, जिसकी आपने अवहेलना कर दी, वहाँ विकारार्थ किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकता। पंचवृत्ति वाले वायु में प्राणवृत्तिमत्ता श्रेष्ठ और विशिष्ट है इसलिए तथा प्राण, अपान आदि पांचवृत्तियों में प्राण वृत्ति की प्रचुरता होने से ही उसकी प्राणमयता है। यह भी नहीं कह सकते कि—मयट् प्रत्यय के प्राचुर्यार्थक प्रयोग अधिक नहीं देखे जाते, जिससे प्राचुर्यार्थ की प्रौढ़ि सिद्ध हो सके, “अन्नमय यज्ञ” “शकटमयी यात्रा” आदि अनेक प्राचुर्यार्थक प्रयोग होते हैं। यदुक्तमानंदप्राचुर्यमल्पदुःखसद्भावमवगमयतीति, तदसत् तत्प्रचुरत्वं हि तत्प्रभूतत्वम् तच्चेतरस्य सत्तां नावगमयति, अपितु तस्याल्पत्वं निवर्तयति इतरसद्भावासद्भावौतु प्रमाणान्तरावसेयौ; इह च प्रमाणान्तरेण तदभावोऽवगम्यते “अपहतपाप्मा” इत्यादिना तत्रैतावदेववक्तव्यं, ब्रह्मानंदस्य प्रभूतत्वमन्यानन्दस्याल्पत्वपेक्षत इति । उच्यते च तत् “स एको मानुष आनंदः” इत्यादिना जीवा- नन्दापेक्षया ब्रह्मानंदो निरतिशयदशापन्नः प्रभूत् इति । जो यह कहा कि प्राचुर्य आनंद अर्थ करने से अल्प दुःख की प्रतीति होती है, सो यह कथन भी असत् है। आनंद की प्रचुरता, प्रभूतत्व का बोध कराती है उसके अतिरिक्त उसमें दूसरे की सत्ता की प्रतीति नहीं होती अपितु उसकी अल्पता का निराकरण करती है। दूसरी वस्तुओं के सद्- ankurnagpal108@gmail.com