श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३४५ ) औचित्यात् प्रयोग प्रौढ्याच मयटो विकारार्थत्वमर्थविरोधान्न संभवति । किंच औचित्यं प्राणमय एव परित्यक्तम् तत्र विकारा- र्थत्वासंभवात् । अतस्तत्र पंचवृत्तेर्वायोः प्राणवृत्तिमत्तामात्रेण प्राणमयत्वम्, प्राणापानादिषु पंचषु वृत्तिषु प्राणवृत्तेः प्राचुर्याद्वा । न च प्राचुर्ये मयट् प्रत्ययस्य प्रौढिर्नास्ति “अन्नमयो यज्ञः, शकटमयी यात्रा” इत्यादिषु दर्शनात् । औचित्य और प्रयोग प्रौढ़ि से भी मयट् का विकारार्थत्व, अर्थ विरोध होने से, संभव नहीं है। प्राणमय में तो प्रचुरार्थ मानना ही उचित था, जिसकी आपने अवहेलना कर दी, वहाँ विकारार्थ किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकता। पंचवृत्ति वाले वायु में प्राणवृत्तिमत्ता श्रेष्ठ और विशिष्ट है इसलिए तथा प्राण, अपान आदि पांचवृत्तियों में प्राण वृत्ति की प्रचुरता होने से ही उसकी प्राणमयता है। यह भी नहीं कह सकते कि—मयट् प्रत्यय के प्राचुर्यार्थक प्रयोग अधिक नहीं देखे जाते, जिससे प्राचुर्यार्थ की प्रौढ़ि सिद्ध हो सके, “अन्नमय यज्ञ” “शकटमयी यात्रा” आदि अनेक प्राचुर्यार्थक प्रयोग होते हैं। यदुक्तमानंदप्राचुर्यमल्पदुःखसद्भावमवगमयतीति, तदसत् तत्प्रचुरत्वं हि तत्प्रभूतत्वम् तच्चेतरस्य सत्तां नावगमयति, अपितु तस्याल्पत्वं निवर्तयति इतरसद्भावासद्भावौतु प्रमाणान्तरावसेयौ; इह च प्रमाणान्तरेण तदभावोऽवगम्यते “अपहतपाप्मा” इत्यादिना तत्रैतावदेववक्तव्यं, ब्रह्मानंदस्य प्रभूतत्वमन्यानन्दस्याल्पत्वपेक्षत इति । उच्यते च तत् “स एको मानुष आनंदः” इत्यादिना जीवा- नन्दापेक्षया ब्रह्मानंदो निरतिशयदशापन्नः प्रभूत् इति । जो यह कहा कि प्राचुर्य आनंद अर्थ करने से अल्प दुःख की प्रतीति होती है, सो यह कथन भी असत् है। आनंद की प्रचुरता, प्रभूतत्व का बोध कराती है उसके अतिरिक्त उसमें दूसरे की सत्ता की प्रतीति नहीं होती अपितु उसकी अल्पता का निराकरण करती है। दूसरी वस्तुओं के सद्- ankurnagpal108@gmail.com
( ३४६ ) भाव और असद्भाव का निराकरण तो प्रमाणान्तरों पर आधारित होता है, पर इसमें प्रमाणान्तरों से अभाव की ही प्रतीति होती है "अपहत- पाप्मा" इत्यादि प्रमाण दुःख के अभाव के ही परिचायक हैं, यहाँ केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि—ब्रह्मानंद की जो प्रभूतता है वह अन्यान्य आनंदों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ, है उसके समक्ष सारे आनंद अल्प हैं—इसके लिए कहा भी गया है कि—"मानुष आनंद एक अंश मात्र है।" जीव नद की अपेक्षा ब्रह्मानंद अत्यन्त आनंदपूर्ण हैं। यच्चोक्तं जीवस्यानंदविकारत्वं संभवतीति, तदपि नोपपद्यते, जीवस्य ज्ञानानन्दस्वरूपस्य केनचिदाकारेण मृद इव घटाद्या- कारेण परिणामः सकल श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धः संसारदशायां तु कर्मण ज्ञानानंदौ सकुचितावित्युपपादयिष्यते। अतश्चानन्दमयो जीवादन्यः परब्रह्म । जो यह कहते हो कि—जीव की विकारता ही संभव है सो यह कथन भी असंगत है, मिट्टी का जैसा घट आदि आकार वाला विकृत परिणाम होता है, वैसा ज्ञान और आनंद स्वरूप जीव का भी संभव हो, ऐसा श्रुति स्मृति और युक्ति से विरुद्ध है। संसार दशा में कर्म से, ज्ञान और आनंद संकुचित हो जाते हैं, इसका विवेचन आगे करेंगे। जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः परंब्रह्म इसलिए भी जीव से भिन्न परब्रह्म आनंदमय है कि— तद्धेतुव्यपदेशाच्च १।१।१५। “को ह्येवान्यात् को प्राण्यात् यदेष आकाश आनंदो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति” इति। एष एव जीवानन्दयतीति। जीवानन्द हेतुरयं व्यपदिश्यते। अतश्चानन्दयितव्याज्जीवादानंदयिताऽयमन्य आनंदमयः परमात्मेति विज्ञायते। आनंदमय एवात्र आनंद शब्देनो- क्त इति चानन्तरमेव वक्ष्यते। ankurnagpal108@gmail.com
( ३४७ ) “यदि यह आकाश (ब्रह्म) आनंद (जीवान्तरवर्त्ती दहराकाश) न होता तो कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता” इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि—परमात्मा ही जीवो के आनंद का हेतु और जीवों का आनंददाता है। आनंद करने वाले जीवात्मा से, आनंद- दाता ब्रह्म भिन्न ही है, जो कि—आनंदमय शब्द से जाना जाता है। उक्त उदाहरण में आनंद शब्द से आनंदमय की ही व्याख्या की गई है, और उसकी भिन्नता बतलाई गई है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः— इसलिए भी आनंदमय जीव से भिन्न है कि— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते १।१।१६ “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति मंत्रवर्णोदितं ब्रह्मैवानंदमय इति गीयते । तत्तु जीवस्वरूपादन्यत् परंब्रह्म “ब्रह्म विदाप्नोति परं” इति जीवस्य प्राप्यतया ब्रह्म निर्दिष्टम् । ‘ सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इस मंत्र में उल्लेख्य ब्रह्म को ही बार-बार “आनंदमय” नाम से बतलाया गया है। इसलिए जीव स्वरूप से भिन्न परब्रह्म है, ऐसा निश्चित होता है। “ब्रह्मवेत्ता ही परब्रह्म को प्राप्त करता है” इस मंत्र में भी जीव के प्राप्य ब्रह्म का निर्देश किया गया है। “तदेषाभ्युक्ता” इति तत् ब्रह्म अभिमुखीकृत्य प्रतिपाद्यतया परिगृह्य, ऋगेषा अध्येतृभिरुक्ता । ब्राह्मणोक्तस्यार्थस्य वैशद्यमनेन मंत्रेण क्रियत इत्यर्थः, जीवस्योपासकस्य प्राप्यं ब्रह्म तस्माद् विलक्षणमेव अनंतरंच “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” इत्यारभ्य उत्तरोत्तरैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रैश्च तदेव विशदो क्रियते । अतो जीवादन्य आनंदमयः । “तदेषाभ्युक्ता” ( तत् = ब्रह्म को अभिमुख करके एषा = ऋक् मन्त्र + उक्ता = पाठकों द्वारा कहा गया ) इस मंत्र में ब्रह्म को प्रतिपाद्य ankurnagpal108@gmail.com
( ३४८ ) मानकर पाठकों ने उसका विश्लेषण किया है यह मंत्र उपरोक्त ब्राह्मण मंत्र का ही परिष्कृत अर्थ है। इससे निश्चित होता है कि—उपासक जीव का उपास्य ब्रह्म जीव से निश्चित ही विलक्षण है। अन्य प्रकरण में भी जैसे—'इसी आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से प्रारंभ करके उत्त- रोत्तर ब्राह्मण और वैदिक मंत्रों में इसी तथ्य को विशद किया गया है इसलिए जीव से भिन्न ही आनंदमय है, ऐसा सिद्ध होता है। अत्राह-यद्यप्युपासकात्प्राप्यस्य भेदेन भवितव्यम् । तथापि न वस्त्वंतरं जीवान्मान्त्रवर्णिकं ब्रह्म, किन्तु तस्यैवोपासकस्य निरस्त- समस्ताविद्यागंधनिविशेषचिन्मात्रैकरसंशुद्ध'स्वरूपं तदेव "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति मंत्रेण विशोध्यते । तदेव च "यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" इति वाङ्मनसागोचरतया निर्वि- शेषमिति मन्यते । अतस्तदेव मांन्त्रवर्णिकमिति तस्मादनतिरिक्त आनन्दमय इति । अत उत्तरं पठति— उक्त मत पर विपक्षी कहते हैं कि—उपासक से उपास्य का भेद होना चाहिए परन्तु मंत्रोक्त ब्रह्म, जीव से भिन्न नहीं है, उपासक का जो अविद्या रहित निर्विशेष चिन्मात्र एकरस शुद्ध स्वरूप है उसी को "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" मंत्र द्वारा बतलाया गया है। उसी का "यतो वाचो" आदि मंत्र से अवाङ् मनस अगोचर प्रतिपादन किया गया है, शुद्धावस्था- पन्न जीव ही मंत्रों का प्रतिपाद्य है, उससे भिन्न कोई अन्य आनंदमय नहीं है। इस कथन का उत्तर देते हैं— नेतरोऽनुपपत्तेः १।१।१७ परमात्मन इतरो जीवशब्दाभिलप्यो मुक्तावस्थोऽपि न भवति मांन्त्रवर्णिकः । कुतः ? अनुपपत्तेः । तथाविधस्यात्मनो निरुपाधिकं विपश्चित्वं "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इति सत्यसंकल्पत्व प्रदर्शनेन विवरिष्यते । विविधं पश्यंश्चित्वं हि विपश्चित्त्वम् ।
( १४६ ) पृषोदरादित्वात्पश्यच्छब्दावयवस्य यच्छब्दस्यलोपं कृत्वा व्युत्पादितो विपश्चिच्छब्दः । यद्यपि मुक्तस्य विपश्चित्वं संभवति, तथापितस्यै- वात्मनः संसारदशायामविपश्चित्वमप्यस्तीत निरुपाधिकं विपश्चित्त्वं नोपपद्यते । निर्विशेषचिन्मात्रतापन्नस्यमुक्तस्य विविध दर्शनाभावा- त्सुतरांविपश्चित्त्वं न संभवतीति न केनापि प्रमाणेन निर्विशेषवस्तु प्रतिपाद्यत इति च पूर्वमेवोक्तम् । परमात्मा से भिन्न जीव, मुक्तावस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता । मंत्रों से उसकी अभिज्ञता सिद्ध नहीं होती । उसका अभिन्न रूप से किसी भी मंत्र में उल्लेख नहीं मिलता । निर्विशेष विशुद्ध स्वरूप आत्मा का निरुपाधिक विपश्चित्व “सोऽकामयत" इत्यादि मंत्र में सत्य संकल्पत्व के रूप से बतलाया गया है । अनेक तत्त्वों की युगपत दर्शन शक्ति को ही विपश्चित्त्व कहते हैं । "पृषोदरादि" व्याकरणोय सूत्र से पश्यत् पद के अवयव यत् अंश को लुप्त करके विपश्चित् शब्द बनाया जाता है । यद्यपि मुक्त जीवात्मा में भी विपश्चित्व हो सकता है, उसी आत्मा का संसार दशा में अविपश्चित्व भी संभव है, उसमें निरुपाधिक विपश्चित्त्व नहीं हो सकता । निर्विशेष चिन्मात्र अवस्था वाले मुक्तात्मा में एक साथ सब कुछ जान लेने की क्षमता भी नहीं है, इसलिए उसमें विपश्चित्त्व नहीं हो सकता, और न किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु प्रमाणित की जा सकती है, ऐसा हम पहिले ही बतला चुके हैं । “यतो वाचो निवर्तन्ते" इति च वाक्यं यदि वाङ्मनसयोर्ब्रह्मणो निवृत्तिमभिदधीत, न ततो निर्विशेषतां वस्तुनोऽवगयितुं शक्नुयात् । अपितु वाङ्मनसयोस्तत्राप्रमाणतां वदेत्, तथा च सति तस्य तुच्छ- त्वमेवापद्यते । “ब्रह्मविदाप्नोति” इत्यारभ्य ब्रह्मणोविपश्चित्त्वं जगत्- कारणत्वं ज्ञानानन्दैकतानतामितरान्प्रत्यानंदयितृत्वं कामादेव चिद- चिदात्मकस्यकृत्स्नस्य स्रष्टृत्वं सृज्यवर्गानुप्रवेशकृततदात्मकत्वं भयाभयहेतुत्वं वाग्वादित्यादीनां प्रशासितृत्वं शतगुणितोत्तरक्रमेण निरतिशयानंदत्वमन्यच्चानेकं प्रतिपाद्य वाङ्मनसयोः ब्रह्मणि प्रवृत्त्य-
( ३५० )
भावेन निष्प्रमाणकं ब्रह्मेत्युच्यत इति भ्रान्तजल्पितम् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इति यच्छब्दनिर्दिष्टमर्थम् “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” इत्यानन्दशब्देन प्रतिनिर्दिश्य तस्य ब्रह्म संबन्धित्वं ब्रह्मण इति व्यति- रेकनिर्देशेन प्रतिपाद्य तदेव वाङ्मनसगोचर “विद्वान्” इति तद्वेद- नमभिदधद्वाक्यं जरद्गवादिवाक्यवदनर्थकं वाच्यानंतर्गतं च स्यात् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इस वाक्य को यदि, वाणी और मन से निवृत्ति प्रतिपादक मान लें तो भी निर्विशेष वस्तु की प्रतीति उक्त वाक्य से नहीं होगी। अपितु वाणी और मन से उसकी अप्रामाणिकता ज्ञात होती है, यदि वाणी और मन से उसे अज्ञात मानकर निर्विशेष बतलाने की चेष्टा करेंगे तो ब्रह्म में तुच्छता आ जायगी । “ब्रह्मविदाप्नोति परं” वाक्य से प्रारंभ करके ब्रह्म की विपश्चित्त्व, जगत्कारणता, आनंदैकान्ता आनंददातृता, संकल्प मात्र से जड चेतन संपूर्ण जगत सृष्टि की शक्तिमत्ता, सृष्टि जगत में अनुस्यूत होकर तदात्मकता, भय अभय की कारणता, वायु आदि की शासकता, निरतिशय आनंदमयता आदि अनेक शतगुणितोत्तर क्रम से वर्णित गुणों का प्रति- पादन करके अन्त में यह कह दिया जाय कि उक्त वाक्य ब्रह्म की निर्वि- शेषता का प्रतिपादक है, तो ऐसा कथन नितान्त भ्रामक है । “यतो वाचो” वाक्य मे “यत्” पद जिस तत्त्व का निर्देश करता है “आनंद ब्रह्मणो” वाक्य “आनंद” पद से उसी तत्त्व का प्रतिनिर्देश करके ‘ब्रह्मणः’ पद से उसका संबंध बतलाता है, यदि उसी वाङ्मनसातीत को “विद्वान्” पद वाच्य ज्ञाता कहा जाय तो उक्त वाक्य ‘जरद्गव” इत्यादि वाक्य की तरह निरर्थक हो जायगा (अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का स्पष्ट भेदोल्लेख होते हुए भी उसे अभिन्न बतलाना क्लिष्ट कल्पना मात्र है । अतः शतगुणितोत्तरक्रमेण ब्रह्मानन्दस्यातिशयेयत्तांवक्तुमुद्यम्य तद्ध्येयत्ता या अभावादेव वाङ्मनसयोस्ततो निवृत्तिः “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इत्युच्यते । एवमियत्ता रहितं “ब्रह्मण आनन्दं विद्वान्
( ३५१ ) कुतश्चन न बिभेति" इत्युच्यते । किं च अस्य मांत्रवर्णिकस्य विपश्चितः "सोऽकामयत" इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्वसंकल्पावकॢप्त- जगज्जन्मस्थितिजगदन्त रात्मत्वादेर्मुक्तात्मस्वरूपादन्यत्वंसुस्पष्टमेव । शतगुणितोत्तर क्रम से सर्वाधिक ब्रह्मानंद ही अतिशय इयत्ता रहित निस्सीम है, इसीलिए वाक्य और मन उसकी थाह न पाकर निवृत्त हो जाते हैं, यही “यतो वाचो” वाक्य का तात्पर्य है । ऐसे निस्सीम ब्रह्म के लिए ही कहा गया कि “जो उसे जानता है वह किसी से भयभीत नहीं होता ।” मंत्राक्षरों के उल्लेख्य “विपश्चित्” की 'सोऽकामयत्” से लेकर स्वसंकल्प संपादित जगत सृष्टि स्थिति और जगदन्तर्यामिता पर्यन्त छवि बतलाकर, जीव के स्वरूप से सुस्पष्ट भिन्नता बतलाई गई है । इतश्चोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽन्य आनंदमयः बद्ध-मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से आनंदमय इसलिए भी भिन्न हैं कि— भेदव्यपदेशाच्च १।१।१८॥ “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः” इत्यारभ्य मांत्रवर्णिकं ब्रह्म व्यंजयद्वाक्यमन्नप्राणमनोभ्य इव जीवादपि तस्य भेदं व्यपदि शति “तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्मानंद- मयः “इति । अतोजीवाद्भेदस्य व्यपदेशाच्चायं मांत्रवर्णिक आनंदमयोऽ न्य एवेति ज्ञायते । “उसी आत्मा से यह आकाश हुआ” ऐसा प्रारंभ करके मांत्रवर्णिक ब्रह्मबोधक “उस आनंदमय से विज्ञानमय आदि भिन्न हैं” इस वाक्य में प्राणमय आदि से जैसे आनंदमय की भिन्नता दिखलाई गई है, वैसे ही जीवात्मा से भी भेद का उल्लेख होने से, मंत्रवर्णोक्त आनंदमय निश्चित ही भिन्न प्रतीत होता है । इतश्च जीवान्य = इसलिए भी वह जीवात्मा से भिन्न है कि— कामाच्च नानुमानापेक्षा १।१।१९॥ जीवस्याविद्यापरवशस्य जगतकारणत्वे ह्यवर्जनाया आनुमानिक ankurnagpal108@gmail.com
( ३५२ ) प्रधानादि शब्दाभिधेयाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा, तथैव हि चतुर्मुखादीनां कारणत्वं, इह च “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेय” इत्यचित्'संगं रहितस्य स्वकामादेव विचित्रचिदचिद्वस्तुनः सृष्टिः “इदं सर्वम- सृजत यदिदं किं च” इत्याम्नायते । अतोऽस्यानंदमयस्य जगत् सृजतो नानुमानिकाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा प्रतीयते । ततश्च जीवा- दन्य आनन्दमयः । प्रधान आदि शब्द वाच्य आनुमानिक जड प्रकृति की अपेक्षा तो अविद्याऽधीन जीवात्मा को ही जगत् का कारण मानना पड़ेगा, इसीलिए जीव विशेष ब्रह्मा आदि को जगत् कर्त्ता माना भी गया । किंतु इस प्रसंग में ‘सोऽकामयत’ वाक्य से जड़संसर्ग रहित केवल ब्रह्म से ही जड़ चेतनात्मक समस्त सृष्टि ‘इदं सब’ इत्यादि से बतलाई गई है । प्रसंग से तो आनंदमय की जगत्सर्जन्ता, आनुमानिक जड प्रधान ( प्रकृति ) संसर्गसापेक्ष ज्ञात नहीं होती । इससे भी जीव से भिन्न आनंदमय सिद्ध होता है । इतश्च—इससे भी भिन्नता सिद्ध होती है कि-- अस्मिन्नस्य च तद्योगंशास्ति ।१।१।२०।। अस्मिन्-आनन्दमये, अस्य-जीवस्य, तद्योगम्-आनन्द योगम्, शास्ति-शास्त्रम्—“रसोवैसः रसं ह्येवायंलब्ध्वानन्दी भवति” इति । रसशब्दाभिधेयानन्दमयलाभादयं जीवशब्दाभिलपनीय आनन्दी भवतीत्युच्यमाने यल्लाभादानन्दी भवति स एव इत्यनुन्मत्तः को ब्रवीतीत्यर्थः । “वह रस स्वरूप है—यह जीव उस रस का आस्वादन करके आनंदित होता है” इत्यादि प्रसिद्ध मंत्र इस जीव का, आनंदमय से आनंद संबंध बतलाता है । इस वाक्य में “रस” का अर्थ आनंदमय तथा “अयं” का अर्थ जीव है । यह जीव, आनंदमय रस को प्राप्त कर आनंदित होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख होने पर भी, जिसकी प्राप्ति से जो
( ३५३ ) आनंदित होता है वे भिन्न दो प्राप्य-प्रापक, एक हैं, ऐसा पागल के अति- रिक्त कोई और तो कह नहीं सकता । एवमानन्दमयः परंब्रह्मेति निश्चितेसति "यदेष आकाश आनन्दः" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादिष्वानन्दशब्देनानन्दमय एव परामृश्यते, यथा विज्ञान शब्देन विज्ञानमयः । अतएव "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्" इति व्यतिरेक निर्देशः । अतएव च "आनन्दमय- मात्मानमुपसंक्रामति" इति फलनिर्देशश्च । उत्तरेचानुवाके पूर्वानु- वाकोक्तानामन्नमयादीनां "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् प्राणोब्रह्मेति व्यजानात्"-मनोब्रह्मेति व्यजानात्-"विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्" इति प्रतिपादनात् "आनन्दो ब्रह्म" इत्यप्यानन्दमयस्यैव प्रतिपाद- नमिति विज्ञायते, तत एव च तत्रापि "आनन्दमयमात्मानमुप संक्रम्य" इत्युपसंहृतम् । अतः प्रधानशब्दाभिप्रेयादर्थान्तरभूतस्य परस्यब्रह्मणो जीव- शब्दाभिलपनीयादपि वस्तुनोऽर्थान्तरत्वं सिद्धम् । आनंदमय तत्त्व परब्रह्म ही है, ऐसा निश्चित हो जाने पर "विज्ञान" शब्द से जैसे विज्ञानमय अर्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार "यदेष आकाश आनंदः" "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" इत्यादि वाक्योक्त "आनंद" शब्द से आनंदमय अर्थ की प्रतीति होती है । "आनंद ब्रह्मणो विद्वान्" वाक्य में ज्ञाता ज्ञेय का भेद दिखलाया गया है, तथा "आनंद- मयमात्मानमुपसंक्रामति" में आनंदमय आत्मा की प्राप्ति रूप फल का निर्देश है । परवर्त्ती अनुवाक ( परिच्छेद ) में, पूर्व अनुवाक में बतलाये गए अन्नमय आदि को-अन्न ब्रह्म है-प्राण ब्रह्म है-मन ब्रह्म है-विज्ञान ( जीव ) ब्रह्म है" जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है उससे निश्चित होता है कि-"आनंद ब्रह्म है" इस वाक्य का उल्लेख "आनंद" शब्द भी आनंदमय शब्द का प्रतिपादक है । इसीलिए उक्त प्रकरण के अन्त में "आनंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य" ऐसा आनंदमय निर्देशक उपसंहार किया गया है । ankurnagpal108@gmail.com
Here is the complete line-by-line transcription of the text from the image:
इस प्रकार प्रधान शब्द वाच्य प्रकृति से भिन्न परब्रह्म की, जीवा- त्मा से भी भिन्नता सिद्ध होती है। ७. अधिकरणः— यद्यपि मन्दपुण्यानां जीवानां कामाज्जगत्सृष्टिरतिशयिता- नन्दयोगो भयाभय हेतुत्वमित्यादि न संभवत्येवेतीमामाशंकां निरा- करोति । यद्यपि अल्पपुण्य वाले जीवों में संकल्पमात्र से सृष्टि, अतिशय आनंद योग, भय या अभय देने की शक्ति आदि संभव नहीं है, फिर भी विलक्षण पुण्यवान जीवविशेष आदित्य, इन्द्र प्रजापति आदि में तो ये संभव हैं फिर परमात्मा ही जगत् के कारण हैं ऐसा क्यों कहते हैं ? इस शंका का निराकरण करते हैं— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् १।१।१२ ॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः तस्य यथा कप्या
( ३५५ ) पुंडरीक के समान रमणीक नेत्रों वाला है उसका नाम “ओत” है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त है, उस निष्पाप को जो जानता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है। ऋक् और साम में उसी का गान किया गया है वही अधिदेव है।” इसके बाद इसी का अध्यात्म रूप भी जैसे—“जो यह आँखों में पुरुष दीखता है; ऋक्-साम-उक्थ (सामवेदीय स्तोत्र विशेष) यजु और ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित पूर्व पुरुष का जैसा रूप है, यह वैसे ही रूपवाला है, उसका जैसा गान करते हैं, इसका भी वैसा ही गान करते हैं, उसका जो नाम है, इसका भी वही नाम है।” उक्त विषय में संशय होता है कि—उक्त आदित्य और नेत्र स्थित पुरुष, क्या अधिक पुण्यशाली ऐश्वर्यवान् सूर्यमंडल को प्राप्त करने वाला जीवात्मा ही है ? अथवा उससे भिन्न परमात्मा है ? किसको मानना उचित होगा ? उपचितपुण्यो जीव एवेति । कुतः ? स शरीरत्वश्रवणात् शरीरसंबंधो हि जीवानामेव संभवति । कर्मानुगु णप्रिययोगाय हि शरीर संबंधः । अतएव हि कर्मसंबंधरहितस्यमोक्षस्य प्राप्यत्वम शरीरत्वेनोच्यते “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । संभवति च पुण्यातिशयात् ज्ञानाधिक्यम्, शक्त्याधिक्यंच । अतएवं लोककामेश- त्त्वादि तस्यैवोपपद्यते । ततएव चोपास्यत्वम्, फलदायित्वम्, पाप- क्षपणकत्वेन मोक्षोपयोगित्वं च । मनुष्येष्वप्युपचितपुण्याः केचित् ज्ञानशक्त्यादिभिरधिकतरा दृश्यन्ते, ततश्च सिद्धगंधर्वादयः ततश्च देवाः ततश्चेंद्रादयः । अतो ब्रह्मादिष्वन्यतमएवैकैकस्मिन्कल्पे पुण्यविशेषेणैवम्भूतमैश्वर्यम्प्राप्तो जगत्सृष्ट्याद्यपि करोतीति जगत्का- रणत्वजगदन्तरात्मत्वादिवाक्यमस्मिन्नेवौपचितपुण्यविशेषे सर्वज्ञे सर्वशक्तौ वर्त्तते । अतो न जीवादतिरिक्तः परमात्मा नाम कश्चि- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५६ ) दस्ति । एवं च सति “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्” इत्यादयो जीवात्मन्- स्वाभिप्राया भवंति मोक्षशास्त्राण्यपि तत्स्वरूपतत्प्राप्त्युपायोपदेश- पराणि-इति ' विशेष पुण्यवान जीव ही उक्त पुरुष हो सकता है क्यों उसके शरीर का वर्णन किया गया है, शरीर संबंध तो जीवो का ही हो सकता है । शुभाशुभ कर्म और गुण के संयोग से ही शरीर संबंध होता है । तभी कर्म संबंध रहित शरीर हीन मोक्ष की प्राप्ति कही गई है— “शरीराभिमान के रहते पाप पुण्य नष्ट नहीं होते, शरीराभिमान शून्य हो जाने पर पाप पुण्य स्पर्श नहीं कर सकते ।” इत्यादि । पुण्य की अधिकता से अधिक ज्ञान और अधिक शक्ति संपन्न होना भी संभव है, लोकेश कामेश इत्यादि उपाधियां भी जीवात्मा के लिए ही प्रयुक्त होती हैं । उपास्यता, फलदातृता, पापप्रक्षालनता और मोक्षदातृता आदि क्षमतायें भी उसमें हो सकती हैं । मनुष्यों में ही प्रायः अधिक पुण्यवान और ज्ञान शक्ति संपन्न महापुरुष देखे जाते हैं, सिद्ध, गंधर्व, देव तथा देवाधिदेव इन्द्र उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । मनुष्य से ब्रह्मा पर्यन्त में से कोई विशेष पुण्यवान महापुरुष एक- एक कल्प तक ऐश्वर्य संपन्न होकर जगत् सृष्टि आदि का संपादन करते हैं । जगत्कारणता और जगदन्तरात्मकता के बोधक वाक्य भी ऐसे ही सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न महापुरुष के लिए घटित होते हैं । इसलिए जीवात्मा से अतिरिक्त परमात्मा नामक कोई विशेष नहीं है । “अस्थूल, अनणु-अह्रस्व’ इत्यादि विशेषण भी जीवात्मा बोधक ही सिद्ध होते हैं तथा मोक्षोपदेशक शास्त्र वाक्य भी जीव स्वरूप निर्देशक एवं प्राप्ति उपाय के रूप में ही घटित होते हैं, ऐसा मानना होगा । सिद्धान्त—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्—अंतरादित्ये ऽन्तरक्षिणि च यः पुरुषः प्रतीयते, स जीवादन्यः परमात्मैव, कुतः ? तद्धर्मोपदेशात् जीवेष्वसंभवस्तदतिरिक्तस्यैव परमात्मनो धर्मोऽ- यमपहतपाप्मत्वादिः “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” इत्यादिना- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५७ ) पदिश्यते । अपहतपाप्मत्वम् हि अपहतकर्मत्वं, कर्मवश्यतागंधरहित- त्वमित्यर्थः । कर्माधीनसुखदुःख भागत्वेन कर्मवश्याः हि जीवाः । अतो अपहतपाप्मत्वं जीवादन्यस्य परमात्मन एव धर्मः । उक्त संशय के निराकरणार्थ ही सूत्रकार ने सिद्धांत निर्णय करते हुए “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात” सूत्र कहा है, जिसका तात्पर्य है कि—सूर्यं मंडल और नेत्र में जो पुरुष दीखता है वह जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही है । उसी की विशेषताओं का उपदेश वेद में किया गया है । जो जीवों में कभी संभव नहीं हैं उन्हीं निष्पापता आदि विशेषताओं का परमात्मा के लिए “स एष सर्वेभ्य” इत्यादि वाक्यों में किया गया है अपहतपापता का तात्पर्य है, निष्कर्मता, कर्मबन्धन शून्यता । कर्माधीन सुख दुःखानुसार कर्म के वशीभूत जीव ही है । निष्पापता आदि तो जीव से विलक्षण परमात्मा के ही धर्म हैं । यत्पूर्वकं स्वरूपोपाधिकं लोककामेशत्वम्, सत्यसंकल्पत्वादिकं सर्वभूतान्तरात्मत्वंच तस्यैवधर्मः । यथााह—‘‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः’’ इति तथा ‘एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेवएको नारायणः’’ इति । ‘‘सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति’’ इत्यादि सत्यसंकल्पत्वपूर्वकसमस्तचिदचिद्वस्तुसृष्टियोगो निरूपाधिक भया- भय हेतुत्वं, वाङ्मनसपरिमितकृतपरिच्छेदराहितानवधिकाति- शयानन्दयोग इत्यादयोऽकर्मसंपाद्यास्वाभाविकाधर्मा जीवस्य न संभवंति । उसी प्रकार लोकेशता, कामेश्वरता, सत्य संकल्पता, सर्वभूतान्त रात्मकता, आदि स्वाभाविक धर्म भी परमात्मा के ही हैं। ऐसा ही— “यह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप, जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है” इस वाक्य से ज्ञात होता है । तथा “ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव स्वरूप एकमात्र नारायण ही हैं” उन्होंने संकल्प किया कि एक से अनेक हो जाऊँ “इत्यादि में वर्णित सत्य ankurnagpal108@gmail.com
( ३५८ ) संकल्प पूर्विका समस्त जड चेतनात्मक सृष्टि योग्यता, स्वाभाविक भय अभय देने की क्षमता, वाङ्मनसगोचरता, अतिशय आनंदमयता इत्यादि अकर्म संपाद्य स्वाभाविक धर्म जीव के नही हो सकते । यत्तुशरीरसंबंधान्न जीवातिरिक्त इत्युक्तम्, तदसत्, न हि सशरीरत्वं कर्मवश्यता साधयति, सत्यसंकल्पस्येच्छयाऽपि शरीर संबंधसंभवात्। अथोच्येत-शरीरं नाम त्रिगुणात्मक प्रकृति परिणाम- रूपभूत संघातः, तत्संबंधश्चापहतपाप्मनस्सत्यसंकल्पस्यपुरुषस्ये- च्छया न संभवति, अपुरुषार्थत्वात् । कर्मवश्यस्य तु स्वस्वरूपान- भिज्ञस्य कर्मानुगुणफलोपभोगायानिच्छतोऽपि तत्संबंधोऽवर्जनीयः, इति। स्यादेतदेवम्, यदि गुणत्रयमयः प्राकृतोऽस्यदेहस्स्यात्, स तु स्वाभिमतस्वानुरूपोऽप्राकृत एवेति सर्वमुपपन्नम् । जो यह कहते हो कि-शरीर संबंध होने से वह जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता, यह कथन भी असत् है, कर्मवश ही शरीर संबंध होता हो यह कोई आवश्यक नहीं है, सत्य संकल्पात्मिका इच्छा से भी आत्मा का शरीर संबंध होता है। यदि यह कहो कि- त्रिगुणात्मक प्रकृति भोग के परिणाम स्वरूप जो पंचमहाभूतों का संयोग होता है, उसे ही शरीर कहते हैं, ऐसे भौतिक शरीर का संबंध, निष्पाप सत्यसंकल्प पुरुष की इच्छामात्र से नहीं हो सकता, क्योंकि वह कभी धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि पुरुषार्थों का पालन नहीं करता । (अर्थात् पुरुषार्थ संबंधी भोगों में नहीं फँसता) अपने स्वरूप से अनभिज्ञ कर्मा- धीन जीव के न चाहते हुए भी, कर्मानुरूप फलभोग के लिए, देह संबंध अनिवार्य रूप से हो जाता है। हो सकता है आपका ही कथन ठीक हो आपके अनुसार जगत्सृष्टा का शरीर त्रिगुणमय प्राकृत हो सकता है पर हमारी दृष्टि में तो वह स्वेच्छा से अपने अनुरूप अप्राकृत देह धारण करके ही सृष्टि का कार्य संचालन करता है, ऐसा मानकर ही हम उक्त समस्या का समाधान कर पाते हैं। एतदुक्तं भवति-परस्यैव ब्रह्मणो निखिलहेयप्रत्यनीकानन्त ज्ञानानन्दैकस्वरूपतया सकलेतरविलक्षणस्य स्वाभाविकानवधिकाति-
( ३५६ ) शयासंख्येयकल्याणगुणगणाश्च संति। तद्वदेव स्वाभिमतानुरूपैक- रूपाचिन्त्यदिव्याद्भुत नित्यनिरवद्यनिरतिशयौज्वल्यसौन्दर्यसौगन्ध्यसौ- कुमार्यलावण्ययौवनाद्यनंतगुणगणनिधिदिव्यरूपमपि स्वाभाविक नास्ति। तदेवोपासकानुग्रहेण तत्तत्प्रतिपत्त्यनुरूप संस्थानं करोत्यपार- कारुण्यसौशील्यौदार्यजलनिधिः निरस्तनिखिलहेयगंधोऽपहतपाप्मा परंब्रह्म पुरुषोत्तमो नारायणः-इति । कथन यह है कि—हीनता रहित, अनंतज्ञान और आनंद स्वरूप होने से, समस्त पदार्थों से विलक्षण पर ब्रह्म ही, निरवधि, निरतिशय, असंख्य स्वाभाविक कल्याणमय गुणों की राशि हैं। तदनुरूप ही उनका स्वभावसिद्ध दिव्य रूप भी है। उसके अनुसार ही अचिन्त्य अलौकिक, अद्भुत, नित्य, निर्दोष, और सबका अतिक्रमण करने वाली औज्वल्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य ( सुयश ) सौकुमार्य लावण्य, यौवनादि अनंत गुण निधियां उनके दिव्य देह में स्वाभाविक रूप से रहती हैं। वे ही उपासकों की भावना के अनुरूप अनुग्रह करके अपने ऐसे दिव्य स्वरूप का चाक्षुष प्रत्यक्ष कराते हैं। अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य आदि गुणों के सागर, हीन दोषों से सर्वथा शून्य, निष्पाप, परब्रह्म पुरुषोत्तम नारायण ही जगत् सृष्टा हो सकते हैं। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते—सदेव सोम्येदमग्र आसीत्— आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः” इत्यादिषु निखिल जगदेक कारणतयाऽवगतस्यपरस्य ब्रह्मणः “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म—विज्ञानमानंदं ब्रह्म” इत्यादिष्वेवंभूतं स्वरूपमित्यवगम्यते । “निर्गुणं” निरंजनं—“अपहतपाप्माविजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः–न तस्य कार्यकरणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते—परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान बलक्रिया च–तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं दैवतानां परमं च दैवतम्—स कारणंकरणाधि ankurnagpal108@gmail.com
पाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते-वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्-सर्वेनिमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि” इत्यादिषु परस्यब्रह्मणःप्राकृत हेयगुणान् प्राकृतहेय देहसंबंधं तन्मूल कर्मवश्यतासबंधं च प्रतिषिध्य कल्याणगुणान् कल्याणरूपं च वदन्ति । “जिससे ये प्रपंच उत्पन्न होता है—हे सौम्य सृष्टि के पूर्व यह सारा विश्व सत् स्वरूप ही था—सृष्टि के पूर्व केवल परमात्मा ही था— एकमात्र नारायण ही थे, ब्रह्मा या शंकर नही थे।” इत्यादि वाक्यों में समस्त जगत् के एकमात्र कारण परब्रह्म का ही निरूपण ज्ञात होता है । तथा—‘‘ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है—परमात्मा विज्ञान और आनंद स्वरूप है ।” इत्यादि वाक्यों में उस परब्रह्म के स्वरूप का निरूपण किया गया है । “वह परब्रह्म निर्गुण, निरंजन, निष्पाप जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य सकल्प है । उसके कार्य ( शरीर ) और कारण ( इन्द्रियाँ ) नही हैं । उसके समान या अधिक कुछ भी दृष्टिगत नही होता । उसकी पराशक्ति स्वाभाविक ज्ञान-बल-क्रिया आदि विविध नामों वाली है । सर्वेश्वर देवाधिदेव ही सबके कारण तथा करणों ( इन्द्रियों ) के स्वामी ( ब्रह्मा आदि ) के भी अधिपति हैं । उनका जनक तथा स्वामी कोई नहीं है । जो धीरता पूर्वक समस्त रूप का विस्तार और नामों का विधान करके व्यावहारिक रूप से उसी में विराजते हैं, अज्ञानातीत आदित्यवर्ण उन महापुरुष को जानने की चेष्टा करो । समस्त निमेष ( स्फूर्तियाँ ) और विद्युत शक्तियाँ परंपुरुष से ही प्रकट होती हैं।” इत्यादि श्रुतियाँ परब्रह्म के प्राकृत तुच्छ गुण समूह, प्राकृत हेय देह संबंध, तदनुरूप कर्मवश्यता का खंडन करके कल्याणमय गुण और कल्याण- मय रूप का प्रतिपादन करती हैं । तदिदं स्वाभाविकमेवरूपमुपासकानुग्रहेण तत्प्रत्यनुगुणाकारं देवमनुष्यादिसंस्थानं, करोति स्वेच्छयैव परमकारुणिको भगवान् ।
( ३६१ ) तदिमाह श्रुतिः—“अजायमानो बहुधा विजायते” इति स्मृतिश्च— “अजोऽपि सन् अव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वाम- धिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां” इति । परम करुणामय भगवान्, दयावश स्वेच्छा से अपने स्वाभाविक दिव्यरूप को, उपासकों की क्षमता के अनुसार उनपर कृपा करने के लिए देव मनुष्य आदि सगुण प्राकृत देहों में परिणत कर देते हैं। जैसा कि श्रुति में—वह अजन्मा प्रायः प्रकट होता है "तथा स्मृति में भी"— अजन्मा और अविनाशी, सर्व नियामक मैं अपनी स्वाभाविक प्रकृति माया के आश्रय से प्रकट होता हूँ सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही मेरा अवतार होता है।" इत्यादि स्पष्ट कहा गया है। साधवो हि उपासकाः तत्परित्राणमेवोद्देश्यम् आनुषंगिकस्तु दुष्कृतां विनाशः संकल्पमात्रेणापि तदुत्पत्तेः । “प्रकृतिं स्वाम्” प्रकृतिः स्वभावः, स्वमेव स्वभावमास्थाय न संसारिणां स्वभावा- नित्यर्थः । आत्ममाययेति स्वसंकल्प रूपेण ज्ञानेन इत्यर्थः । “माया वयुनं ज्ञानं” इति ज्ञान पर्यायमपि माया शब्दं नैघण्टुका अधीयते । उक्त स्मृति वाक्य में साधु का तात्पर्य उपासक से है, उन्हीं के परित्राण के लिए प्रभु प्रकट होते हैं, दुष्टों के विनाश की बात तो प्रासं- गिक है, संकल्प मात्र ही प्रभु के अवतार में पर्याप्त है। “प्रकृतिं स्वाम्” में प्रकृति का तात्पर्य है स्वभाव, स्वाम् अर्थात् अपनी प्रकृति के आधार से ही प्रभु प्रकट होते हैं, संसारी स्वभाव प्राकट्य का आधार नहीं होता । आत्ममायया का तात्पर्य है, स्वसंकल्प रूप ज्ञान "ज्ञान के पर्याय रूप में माया शब्द का प्रयोग निघंटु में “मायावयुनं ज्ञानं" किया गया है । आह च भगवान पाराशरः “समस्ताश्शक्तयश्चैतानृप यत्र प्रति- ष्ठिताः, तद् विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद् हरेर्महत् । समस्त शक्ति ankurnagpal108@gmail.com
( ३६२ ) रूपाणि तत्करोति जनेश्वर, देवतिर्यङ्मनुष्याख्या चेष्टाय॑ते स्वलीलया । जगतामुपकाराय न सा कर्म निमित्तजा ।” इति महा- भारते चावताररूपस्याप्यप्राकृतत्वमुच्यते—“न भूत संघसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः” इति । अतः परस्यैव ब्रह्मण एवं रूपवत्वा- दयमपि तस्यैव धर्मः अत आदित्यमण्डलक्ष्यधिकरण आदित्यादि जीव व्यतिरिक्तः परमात्मैव । भगवान् पाराशर भी कहते हैं--“ये समस्त शक्तियाँ जहाँ प्रतिष्ठित हैं, वही परमात्मा का विश्वरूप है जो कि महान् और विलक्षण है । वह अपनी लीला से देवता पशु मनुष्य आदि चेष्टा वाले अपने शक्तिमय रूपों को प्रकट करते हैं । यह सब जगत के उपकार के लिए करते हैं, कर्मफल के भोग के लिए नहीं करते ।” महाभारत में भी प्रभु का अप्राकृत अवतार बतलाया गया है-“परमात्मा का यह देह पांचभौतिक नहीं है ।” इन सब प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-परमात्मा ही उक्त विशेषताओं वाले हैं उन्हीं के ये स्वाभाविक धर्म है । सूर्य और नेत्रों में वे ही विराज- मान हैं वे जीवों से सर्वथा विलक्षण हैं । भेदव्यपदेशाच्चान्यः १।१।२२ आदित्यादिजीवेभ्यो भेदोव्यपदिश्यतेऽस्य परमात्मनः “य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यश्शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयति”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”— योऽक्षरमन्तरे संचरन्यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं न वेद, योमृत्युमंतरे- संचरन् यस्य मृत्युः शरीरं यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूदन्तरात्माऽपहत- पाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इति चास्यापहतपाप्मनः पर- मात्मनस्सर्वान्जीवान् शरीरत्वेन व्यपदिश्य तेषामन्तरात्मत्वेनैनं व्यपदिशति । अतस्सर्वेभ्योहिरण्यगर्भादिजीवेभ्योऽन्य एव परमा- त्मेतिसिद्धम् । ankurnagpal108@gmail.com
परमात्मा का आदित्य आदि जीवों से स्पष्ट भेद दिखलाया गया है—"जो आदित्य में रहते हुए भी आदित्य से भिन्न है, उसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य उसका शरीर है, वह आदित्य में बैठकर उसका संयमन् करता है—जो आत्मा में होते हुए भी उससे भिन्न है, उसे आत्ना नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है अन्तर्यामी रूप से वही आत्मा का संयमन करता है—जो अक्षर में संचरित है, अक्षर जिसका शरीर है अक्षर उसे नहीं जानता—जो मृत्यु ( जगत ) में संचरित है, मृत्यु उसका शरीर है, मृत्यु उसे नहीं जानता, वह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप दिव्य एकमात्र नारायण है।" इस वाक्य में निष्पाप परमात्मा का शरीर जीवों को बतलाकर, उनका अन्तर्यामित्व बतलाया गया है। इससे सिद्ध होता है कि- परमात्मा, हिरण्यगर्भ आदि जीवों से सर्वथा विलक्षण है। ८ अधिकरण :— "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति जगत् कारण ब्रह्मेत्यवगम्यते। किं तज्जगत्कारणमित्यपेक्षायां "सदेव सोम्येदमग्र आसीत तत्तेजोऽसृजत्-आत्मा इदमेव एवाग्र आसीत्-स इमांल्लो- कानसृजत् तस्माद् वा एतस्मादात्मन् आकाशस्सम्भूतः" इति साधा- रणैशब्दैर्जगत्कारणे निर्दिष्टे ईक्षणविशेषानन्दविशेषरूपविशेषार्थ स्वभावात् प्रधानक्षेत्रज्ञादिव्यतिरिक्तं ब्रह्मेत्युक्तम्। इदानीमाका- शादि विशेषशब्दैर्निर्दिश्य जगत्कारणत्वजगदैश्वर्यादिवादेऽप्याका- शादिशब्दाभिधेयतयाप्रसिद्धचिदचिद्वस्तुनोऽर्थान्तरमुक्तलक्षणमेव ब्रह्मे- ति प्रतिपाद्यते आकाशास्तल्लिङ्गात् इत्यादिना पादशेषेण— जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं"—इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि-जगत् के कारण परमात्मा ही हैं। उस जगत् के कारण का स्वरूप क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर निम्न श्रुतियाँ सामने आती हैं-"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एक सत् ही था—उसने तेजकी सृष्टि की-जगत् पहिले आत्मस्वरूप ही था-जिसने इन लोकों की सृष्टि की—उम आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ" इन श्रुतियों में साधारण शब्दों से जगत्कर्त्ता
( ३६४ ) का निर्देश किया गया है । बाद में ईक्षण विशेष, आनंद विशेष, और रूप विशेष बोधक शब्दों द्वारा प्रधान और क्षेत्रज्ञ से विलक्षण ब्रह्म का प्रति- पादन किया गया है । अब आकाश आदि विशेष शब्दों से निर्देश करके जगत्कारणत्व और जगदैश्वर्यवाद में भी, प्रसिद्ध जडचेतन विलक्षण ब्रह्म को ही आकाश शब्द से बतलाते हैं— आकाशस्तल्लिङ्गात् १।१।२३। इदमाम्नायते छांदोग्ये “अस्य लोकस्य का गतिरिति आकाश इति होवाच सर्वाणि हवा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते, आकाश प्रत्यस्त यंति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्” इति । तत्र संदेहः किं प्रसिद्धाकाश एवात्राकाशशब्देन अभिधीयते उतोक्तलक्षणमेव ब्रह्म इति । किं प्राप्तम् ? प्रसिद्ध आकाश इति कुतः ? शब्दैकसमधिगम्ये वस्तुनि य एवार्थो व्युत्पत्तिसिद्धशब्देन प्रतीयते स एव ग्रहीतव्यः । अतः प्रसिद्ध आकाश एव चराचरभूतजातस्य कृत्स्नस्य कारणम् अतस्तस्मादनतिरिक्तं ब्रह्म । छांदोग्योपनिषद में पाठ है कि-“इस लोक की गति क्या है ? उसने कहा आकाश, समस्तभूत समुदाय आकाश से ही उत्पन्न हुआ है और आकाश में ही विलीन हो जाता है, आकाश सभी भूतों से श्रेष्ठ है, यह सभी का आश्रय है ।” यहाँ संदेह होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही यहाँ आकाश शब्द से उल्लेख्य है अथवा उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म का निर्देश है ? (पूर्वपक्ष) प्रसिद्ध आकाश ही हो सकता है क्यों कि-एकमात्र शब्द गम्य विषय में, शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार शब्द से जो अर्थ प्रतीत होता है उसे ही मानना उचित होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में आकाश ही चराचर जगत् का कारण है, ब्रह्म भी वही है । नान्वीक्षापूर्वकं सृष्ट्यादिभिरचेतनाचेतनजीवाच्च व्यतिरिक्तं ब्रह्मेत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् अयुक्तं तु तत् । तथाहि “यतो वा इमानि ankurnagpal108@gmail.com