श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५२ ) प्रधानादि शब्दाभिधेयाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा, तथैव हि चतुर्मुखादीनां कारणत्वं, इह च “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेय” इत्यचित्'संगं रहितस्य स्वकामादेव विचित्रचिदचिद्वस्तुनः सृष्टिः “इदं सर्वम- सृजत यदिदं किं च” इत्याम्नायते । अतोऽस्यानंदमयस्य जगत् सृजतो नानुमानिकाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा प्रतीयते । ततश्च जीवा- दन्य आनन्दमयः । प्रधान आदि शब्द वाच्य आनुमानिक जड प्रकृति की अपेक्षा तो अविद्याऽधीन जीवात्मा को ही जगत् का कारण मानना पड़ेगा, इसीलिए जीव विशेष ब्रह्मा आदि को जगत् कर्त्ता माना भी गया । किंतु इस प्रसंग में ‘सोऽकामयत’ वाक्य से जड़संसर्ग रहित केवल ब्रह्म से ही जड़ चेतनात्मक समस्त सृष्टि ‘इदं सब’ इत्यादि से बतलाई गई है । प्रसंग से तो आनंदमय की जगत्सर्जन्ता, आनुमानिक जड प्रधान ( प्रकृति ) संसर्गसापेक्ष ज्ञात नहीं होती । इससे भी जीव से भिन्न आनंदमय सिद्ध होता है । इतश्च—इससे भी भिन्नता सिद्ध होती है कि-- अस्मिन्नस्य च तद्योगंशास्ति ।१।१।२०।। अस्मिन्-आनन्दमये, अस्य-जीवस्य, तद्योगम्-आनन्द योगम्, शास्ति-शास्त्रम्—“रसोवैसः रसं ह्येवायंलब्ध्वानन्दी भवति” इति । रसशब्दाभिधेयानन्दमयलाभादयं जीवशब्दाभिलपनीय आनन्दी भवतीत्युच्यमाने यल्लाभादानन्दी भवति स एव इत्यनुन्मत्तः को ब्रवीतीत्यर्थः । “वह रस स्वरूप है—यह जीव उस रस का आस्वादन करके आनंदित होता है” इत्यादि प्रसिद्ध मंत्र इस जीव का, आनंदमय से आनंद संबंध बतलाता है । इस वाक्य में “रस” का अर्थ आनंदमय तथा “अयं” का अर्थ जीव है । यह जीव, आनंदमय रस को प्राप्त कर आनंदित होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख होने पर भी, जिसकी प्राप्ति से जो