श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५३ ) आनंदित होता है वे भिन्न दो प्राप्य-प्रापक, एक हैं, ऐसा पागल के अति- रिक्त कोई और तो कह नहीं सकता । एवमानन्दमयः परंब्रह्मेति निश्चितेसति "यदेष आकाश आनन्दः" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादिष्वानन्दशब्देनानन्दमय एव परामृश्यते, यथा विज्ञान शब्देन विज्ञानमयः । अतएव "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्" इति व्यतिरेक निर्देशः । अतएव च "आनन्दमय- मात्मानमुपसंक्रामति" इति फलनिर्देशश्च । उत्तरेचानुवाके पूर्वानु- वाकोक्तानामन्नमयादीनां "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् प्राणोब्रह्मेति व्यजानात्"-मनोब्रह्मेति व्यजानात्-"विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्" इति प्रतिपादनात् "आनन्दो ब्रह्म" इत्यप्यानन्दमयस्यैव प्रतिपाद- नमिति विज्ञायते, तत एव च तत्रापि "आनन्दमयमात्मानमुप संक्रम्य" इत्युपसंहृतम् । अतः प्रधानशब्दाभिप्रेयादर्थान्तरभूतस्य परस्यब्रह्मणो जीव- शब्दाभिलपनीयादपि वस्तुनोऽर्थान्तरत्वं सिद्धम् । आनंदमय तत्त्व परब्रह्म ही है, ऐसा निश्चित हो जाने पर "विज्ञान" शब्द से जैसे विज्ञानमय अर्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार "यदेष आकाश आनंदः" "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" इत्यादि वाक्योक्त "आनंद" शब्द से आनंदमय अर्थ की प्रतीति होती है । "आनंद ब्रह्मणो विद्वान्" वाक्य में ज्ञाता ज्ञेय का भेद दिखलाया गया है, तथा "आनंद- मयमात्मानमुपसंक्रामति" में आनंदमय आत्मा की प्राप्ति रूप फल का निर्देश है । परवर्त्ती अनुवाक ( परिच्छेद ) में, पूर्व अनुवाक में बतलाये गए अन्नमय आदि को-अन्न ब्रह्म है-प्राण ब्रह्म है-मन ब्रह्म है-विज्ञान ( जीव ) ब्रह्म है" जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है उससे निश्चित होता है कि-"आनंद ब्रह्म है" इस वाक्य का उल्लेख "आनंद" शब्द भी आनंदमय शब्द का प्रतिपादक है । इसीलिए उक्त प्रकरण के अन्त में "आनंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य" ऐसा आनंदमय निर्देशक उपसंहार किया गया है । ankurnagpal108@gmail.com