श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५१ ) कुतश्चन न बिभेति" इत्युच्यते । किं च अस्य मांत्रवर्णिकस्य विपश्चितः "सोऽकामयत" इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्वसंकल्पावकॢप्त- जगज्जन्मस्थितिजगदन्त रात्मत्वादेर्मुक्तात्मस्वरूपादन्यत्वंसुस्पष्टमेव । शतगुणितोत्तर क्रम से सर्वाधिक ब्रह्मानंद ही अतिशय इयत्ता रहित निस्सीम है, इसीलिए वाक्य और मन उसकी थाह न पाकर निवृत्त हो जाते हैं, यही “यतो वाचो” वाक्य का तात्पर्य है । ऐसे निस्सीम ब्रह्म के लिए ही कहा गया कि “जो उसे जानता है वह किसी से भयभीत नहीं होता ।” मंत्राक्षरों के उल्लेख्य “विपश्चित्” की 'सोऽकामयत्” से लेकर स्वसंकल्प संपादित जगत सृष्टि स्थिति और जगदन्तर्यामिता पर्यन्त छवि बतलाकर, जीव के स्वरूप से सुस्पष्ट भिन्नता बतलाई गई है । इतश्चोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽन्य आनंदमयः बद्ध-मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से आनंदमय इसलिए भी भिन्न हैं कि— भेदव्यपदेशाच्च १।१।१८॥ “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः” इत्यारभ्य मांत्रवर्णिकं ब्रह्म व्यंजयद्वाक्यमन्नप्राणमनोभ्य इव जीवादपि तस्य भेदं व्यपदि शति “तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्मानंद- मयः “इति । अतोजीवाद्भेदस्य व्यपदेशाच्चायं मांत्रवर्णिक आनंदमयोऽ न्य एवेति ज्ञायते । “उसी आत्मा से यह आकाश हुआ” ऐसा प्रारंभ करके मांत्रवर्णिक ब्रह्मबोधक “उस आनंदमय से विज्ञानमय आदि भिन्न हैं” इस वाक्य में प्राणमय आदि से जैसे आनंदमय की भिन्नता दिखलाई गई है, वैसे ही जीवात्मा से भी भेद का उल्लेख होने से, मंत्रवर्णोक्त आनंदमय निश्चित ही भिन्न प्रतीत होता है । इतश्च जीवान्य = इसलिए भी वह जीवात्मा से भिन्न है कि— कामाच्च नानुमानापेक्षा १।१।१९॥ जीवस्याविद्यापरवशस्य जगतकारणत्वे ह्यवर्जनाया आनुमानिक ankurnagpal108@gmail.com