श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३५१ ) कुतश्चन न बिभेति" इत्युच्यते । किं च अस्य मांत्रवर्णिकस्य विपश्चितः "सोऽकामयत" इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्वसंकल्पावकॢप्त- जगज्जन्मस्थितिजगदन्त रात्मत्वादेर्मुक्तात्मस्वरूपादन्यत्वंसुस्पष्टमेव । शतगुणितोत्तर क्रम से सर्वाधिक ब्रह्मानंद ही अतिशय इयत्ता रहित निस्सीम है, इसीलिए वाक्य और मन उसकी थाह न पाकर निवृत्त हो जाते हैं, यही “यतो वाचो” वाक्य का तात्पर्य है । ऐसे निस्सीम ब्रह्म के लिए ही कहा गया कि “जो उसे जानता है वह किसी से भयभीत नहीं होता ।” मंत्राक्षरों के उल्लेख्य “विपश्चित्” की 'सोऽकामयत्” से लेकर स्वसंकल्प संपादित जगत सृष्टि स्थिति और जगदन्तर्यामिता पर्यन्त छवि बतलाकर, जीव के स्वरूप से सुस्पष्ट भिन्नता बतलाई गई है । इतश्चोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽन्य आनंदमयः बद्ध-मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से आनंदमय इसलिए भी भिन्न हैं कि— भेदव्यपदेशाच्च १।१।१८॥ “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः” इत्यारभ्य मांत्रवर्णिकं ब्रह्म व्यंजयद्वाक्यमन्नप्राणमनोभ्य इव जीवादपि तस्य भेदं व्यपदि शति “तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्मानंद- मयः “इति । अतोजीवाद्भेदस्य व्यपदेशाच्चायं मांत्रवर्णिक आनंदमयोऽ न्य एवेति ज्ञायते । “उसी आत्मा से यह आकाश हुआ” ऐसा प्रारंभ करके मांत्रवर्णिक ब्रह्मबोधक “उस आनंदमय से विज्ञानमय आदि भिन्न हैं” इस वाक्य में प्राणमय आदि से जैसे आनंदमय की भिन्नता दिखलाई गई है, वैसे ही जीवात्मा से भी भेद का उल्लेख होने से, मंत्रवर्णोक्त आनंदमय निश्चित ही भिन्न प्रतीत होता है । इतश्च जीवान्य = इसलिए भी वह जीवात्मा से भिन्न है कि— कामाच्च नानुमानापेक्षा १।१।१९॥ जीवस्याविद्यापरवशस्य जगतकारणत्वे ह्यवर्जनाया आनुमानिक ankurnagpal108@gmail.com
( ३५२ ) प्रधानादि शब्दाभिधेयाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा, तथैव हि चतुर्मुखादीनां कारणत्वं, इह च “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेय” इत्यचित्'संगं रहितस्य स्वकामादेव विचित्रचिदचिद्वस्तुनः सृष्टिः “इदं सर्वम- सृजत यदिदं किं च” इत्याम्नायते । अतोऽस्यानंदमयस्य जगत् सृजतो नानुमानिकाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा प्रतीयते । ततश्च जीवा- दन्य आनन्दमयः । प्रधान आदि शब्द वाच्य आनुमानिक जड प्रकृति की अपेक्षा तो अविद्याऽधीन जीवात्मा को ही जगत् का कारण मानना पड़ेगा, इसीलिए जीव विशेष ब्रह्मा आदि को जगत् कर्त्ता माना भी गया । किंतु इस प्रसंग में ‘सोऽकामयत’ वाक्य से जड़संसर्ग रहित केवल ब्रह्म से ही जड़ चेतनात्मक समस्त सृष्टि ‘इदं सब’ इत्यादि से बतलाई गई है । प्रसंग से तो आनंदमय की जगत्सर्जन्ता, आनुमानिक जड प्रधान ( प्रकृति ) संसर्गसापेक्ष ज्ञात नहीं होती । इससे भी जीव से भिन्न आनंदमय सिद्ध होता है । इतश्च—इससे भी भिन्नता सिद्ध होती है कि-- अस्मिन्नस्य च तद्योगंशास्ति ।१।१।२०।। अस्मिन्-आनन्दमये, अस्य-जीवस्य, तद्योगम्-आनन्द योगम्, शास्ति-शास्त्रम्—“रसोवैसः रसं ह्येवायंलब्ध्वानन्दी भवति” इति । रसशब्दाभिधेयानन्दमयलाभादयं जीवशब्दाभिलपनीय आनन्दी भवतीत्युच्यमाने यल्लाभादानन्दी भवति स एव इत्यनुन्मत्तः को ब्रवीतीत्यर्थः । “वह रस स्वरूप है—यह जीव उस रस का आस्वादन करके आनंदित होता है” इत्यादि प्रसिद्ध मंत्र इस जीव का, आनंदमय से आनंद संबंध बतलाता है । इस वाक्य में “रस” का अर्थ आनंदमय तथा “अयं” का अर्थ जीव है । यह जीव, आनंदमय रस को प्राप्त कर आनंदित होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख होने पर भी, जिसकी प्राप्ति से जो
( ३५३ ) आनंदित होता है वे भिन्न दो प्राप्य-प्रापक, एक हैं, ऐसा पागल के अति- रिक्त कोई और तो कह नहीं सकता । एवमानन्दमयः परंब्रह्मेति निश्चितेसति "यदेष आकाश आनन्दः" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादिष्वानन्दशब्देनानन्दमय एव परामृश्यते, यथा विज्ञान शब्देन विज्ञानमयः । अतएव "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्" इति व्यतिरेक निर्देशः । अतएव च "आनन्दमय- मात्मानमुपसंक्रामति" इति फलनिर्देशश्च । उत्तरेचानुवाके पूर्वानु- वाकोक्तानामन्नमयादीनां "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् प्राणोब्रह्मेति व्यजानात्"-मनोब्रह्मेति व्यजानात्-"विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्" इति प्रतिपादनात् "आनन्दो ब्रह्म" इत्यप्यानन्दमयस्यैव प्रतिपाद- नमिति विज्ञायते, तत एव च तत्रापि "आनन्दमयमात्मानमुप संक्रम्य" इत्युपसंहृतम् । अतः प्रधानशब्दाभिप्रेयादर्थान्तरभूतस्य परस्यब्रह्मणो जीव- शब्दाभिलपनीयादपि वस्तुनोऽर्थान्तरत्वं सिद्धम् । आनंदमय तत्त्व परब्रह्म ही है, ऐसा निश्चित हो जाने पर "विज्ञान" शब्द से जैसे विज्ञानमय अर्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार "यदेष आकाश आनंदः" "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" इत्यादि वाक्योक्त "आनंद" शब्द से आनंदमय अर्थ की प्रतीति होती है । "आनंद ब्रह्मणो विद्वान्" वाक्य में ज्ञाता ज्ञेय का भेद दिखलाया गया है, तथा "आनंद- मयमात्मानमुपसंक्रामति" में आनंदमय आत्मा की प्राप्ति रूप फल का निर्देश है । परवर्त्ती अनुवाक ( परिच्छेद ) में, पूर्व अनुवाक में बतलाये गए अन्नमय आदि को-अन्न ब्रह्म है-प्राण ब्रह्म है-मन ब्रह्म है-विज्ञान ( जीव ) ब्रह्म है" जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है उससे निश्चित होता है कि-"आनंद ब्रह्म है" इस वाक्य का उल्लेख "आनंद" शब्द भी आनंदमय शब्द का प्रतिपादक है । इसीलिए उक्त प्रकरण के अन्त में "आनंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य" ऐसा आनंदमय निर्देशक उपसंहार किया गया है । ankurnagpal108@gmail.com
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इस प्रकार प्रधान शब्द वाच्य प्रकृति से भिन्न परब्रह्म की, जीवा- त्मा से भी भिन्नता सिद्ध होती है। ७. अधिकरणः— यद्यपि मन्दपुण्यानां जीवानां कामाज्जगत्सृष्टिरतिशयिता- नन्दयोगो भयाभय हेतुत्वमित्यादि न संभवत्येवेतीमामाशंकां निरा- करोति । यद्यपि अल्पपुण्य वाले जीवों में संकल्पमात्र से सृष्टि, अतिशय आनंद योग, भय या अभय देने की शक्ति आदि संभव नहीं है, फिर भी विलक्षण पुण्यवान जीवविशेष आदित्य, इन्द्र प्रजापति आदि में तो ये संभव हैं फिर परमात्मा ही जगत् के कारण हैं ऐसा क्यों कहते हैं ? इस शंका का निराकरण करते हैं— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् १।१।१२ ॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः तस्य यथा कप्या
( ३५५ ) पुंडरीक के समान रमणीक नेत्रों वाला है उसका नाम “ओत” है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त है, उस निष्पाप को जो जानता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है। ऋक् और साम में उसी का गान किया गया है वही अधिदेव है।” इसके बाद इसी का अध्यात्म रूप भी जैसे—“जो यह आँखों में पुरुष दीखता है; ऋक्-साम-उक्थ (सामवेदीय स्तोत्र विशेष) यजु और ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित पूर्व पुरुष का जैसा रूप है, यह वैसे ही रूपवाला है, उसका जैसा गान करते हैं, इसका भी वैसा ही गान करते हैं, उसका जो नाम है, इसका भी वही नाम है।” उक्त विषय में संशय होता है कि—उक्त आदित्य और नेत्र स्थित पुरुष, क्या अधिक पुण्यशाली ऐश्वर्यवान् सूर्यमंडल को प्राप्त करने वाला जीवात्मा ही है ? अथवा उससे भिन्न परमात्मा है ? किसको मानना उचित होगा ? उपचितपुण्यो जीव एवेति । कुतः ? स शरीरत्वश्रवणात् शरीरसंबंधो हि जीवानामेव संभवति । कर्मानुगु णप्रिययोगाय हि शरीर संबंधः । अतएव हि कर्मसंबंधरहितस्यमोक्षस्य प्राप्यत्वम शरीरत्वेनोच्यते “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । संभवति च पुण्यातिशयात् ज्ञानाधिक्यम्, शक्त्याधिक्यंच । अतएवं लोककामेश- त्त्वादि तस्यैवोपपद्यते । ततएव चोपास्यत्वम्, फलदायित्वम्, पाप- क्षपणकत्वेन मोक्षोपयोगित्वं च । मनुष्येष्वप्युपचितपुण्याः केचित् ज्ञानशक्त्यादिभिरधिकतरा दृश्यन्ते, ततश्च सिद्धगंधर्वादयः ततश्च देवाः ततश्चेंद्रादयः । अतो ब्रह्मादिष्वन्यतमएवैकैकस्मिन्कल्पे पुण्यविशेषेणैवम्भूतमैश्वर्यम्प्राप्तो जगत्सृष्ट्याद्यपि करोतीति जगत्का- रणत्वजगदन्तरात्मत्वादिवाक्यमस्मिन्नेवौपचितपुण्यविशेषे सर्वज्ञे सर्वशक्तौ वर्त्तते । अतो न जीवादतिरिक्तः परमात्मा नाम कश्चि- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५६ ) दस्ति । एवं च सति “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्” इत्यादयो जीवात्मन्- स्वाभिप्राया भवंति मोक्षशास्त्राण्यपि तत्स्वरूपतत्प्राप्त्युपायोपदेश- पराणि-इति ' विशेष पुण्यवान जीव ही उक्त पुरुष हो सकता है क्यों उसके शरीर का वर्णन किया गया है, शरीर संबंध तो जीवो का ही हो सकता है । शुभाशुभ कर्म और गुण के संयोग से ही शरीर संबंध होता है । तभी कर्म संबंध रहित शरीर हीन मोक्ष की प्राप्ति कही गई है— “शरीराभिमान के रहते पाप पुण्य नष्ट नहीं होते, शरीराभिमान शून्य हो जाने पर पाप पुण्य स्पर्श नहीं कर सकते ।” इत्यादि । पुण्य की अधिकता से अधिक ज्ञान और अधिक शक्ति संपन्न होना भी संभव है, लोकेश कामेश इत्यादि उपाधियां भी जीवात्मा के लिए ही प्रयुक्त होती हैं । उपास्यता, फलदातृता, पापप्रक्षालनता और मोक्षदातृता आदि क्षमतायें भी उसमें हो सकती हैं । मनुष्यों में ही प्रायः अधिक पुण्यवान और ज्ञान शक्ति संपन्न महापुरुष देखे जाते हैं, सिद्ध, गंधर्व, देव तथा देवाधिदेव इन्द्र उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । मनुष्य से ब्रह्मा पर्यन्त में से कोई विशेष पुण्यवान महापुरुष एक- एक कल्प तक ऐश्वर्य संपन्न होकर जगत् सृष्टि आदि का संपादन करते हैं । जगत्कारणता और जगदन्तरात्मकता के बोधक वाक्य भी ऐसे ही सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न महापुरुष के लिए घटित होते हैं । इसलिए जीवात्मा से अतिरिक्त परमात्मा नामक कोई विशेष नहीं है । “अस्थूल, अनणु-अह्रस्व’ इत्यादि विशेषण भी जीवात्मा बोधक ही सिद्ध होते हैं तथा मोक्षोपदेशक शास्त्र वाक्य भी जीव स्वरूप निर्देशक एवं प्राप्ति उपाय के रूप में ही घटित होते हैं, ऐसा मानना होगा । सिद्धान्त—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्—अंतरादित्ये ऽन्तरक्षिणि च यः पुरुषः प्रतीयते, स जीवादन्यः परमात्मैव, कुतः ? तद्धर्मोपदेशात् जीवेष्वसंभवस्तदतिरिक्तस्यैव परमात्मनो धर्मोऽ- यमपहतपाप्मत्वादिः “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” इत्यादिना- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५७ ) पदिश्यते । अपहतपाप्मत्वम् हि अपहतकर्मत्वं, कर्मवश्यतागंधरहित- त्वमित्यर्थः । कर्माधीनसुखदुःख भागत्वेन कर्मवश्याः हि जीवाः । अतो अपहतपाप्मत्वं जीवादन्यस्य परमात्मन एव धर्मः । उक्त संशय के निराकरणार्थ ही सूत्रकार ने सिद्धांत निर्णय करते हुए “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात” सूत्र कहा है, जिसका तात्पर्य है कि—सूर्यं मंडल और नेत्र में जो पुरुष दीखता है वह जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही है । उसी की विशेषताओं का उपदेश वेद में किया गया है । जो जीवों में कभी संभव नहीं हैं उन्हीं निष्पापता आदि विशेषताओं का परमात्मा के लिए “स एष सर्वेभ्य” इत्यादि वाक्यों में किया गया है अपहतपापता का तात्पर्य है, निष्कर्मता, कर्मबन्धन शून्यता । कर्माधीन सुख दुःखानुसार कर्म के वशीभूत जीव ही है । निष्पापता आदि तो जीव से विलक्षण परमात्मा के ही धर्म हैं । यत्पूर्वकं स्वरूपोपाधिकं लोककामेशत्वम्, सत्यसंकल्पत्वादिकं सर्वभूतान्तरात्मत्वंच तस्यैवधर्मः । यथााह—‘‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः’’ इति तथा ‘एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेवएको नारायणः’’ इति । ‘‘सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति’’ इत्यादि सत्यसंकल्पत्वपूर्वकसमस्तचिदचिद्वस्तुसृष्टियोगो निरूपाधिक भया- भय हेतुत्वं, वाङ्मनसपरिमितकृतपरिच्छेदराहितानवधिकाति- शयानन्दयोग इत्यादयोऽकर्मसंपाद्यास्वाभाविकाधर्मा जीवस्य न संभवंति । उसी प्रकार लोकेशता, कामेश्वरता, सत्य संकल्पता, सर्वभूतान्त रात्मकता, आदि स्वाभाविक धर्म भी परमात्मा के ही हैं। ऐसा ही— “यह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप, जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है” इस वाक्य से ज्ञात होता है । तथा “ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव स्वरूप एकमात्र नारायण ही हैं” उन्होंने संकल्प किया कि एक से अनेक हो जाऊँ “इत्यादि में वर्णित सत्य ankurnagpal108@gmail.com
( ३५८ ) संकल्प पूर्विका समस्त जड चेतनात्मक सृष्टि योग्यता, स्वाभाविक भय अभय देने की क्षमता, वाङ्मनसगोचरता, अतिशय आनंदमयता इत्यादि अकर्म संपाद्य स्वाभाविक धर्म जीव के नही हो सकते । यत्तुशरीरसंबंधान्न जीवातिरिक्त इत्युक्तम्, तदसत्, न हि सशरीरत्वं कर्मवश्यता साधयति, सत्यसंकल्पस्येच्छयाऽपि शरीर संबंधसंभवात्। अथोच्येत-शरीरं नाम त्रिगुणात्मक प्रकृति परिणाम- रूपभूत संघातः, तत्संबंधश्चापहतपाप्मनस्सत्यसंकल्पस्यपुरुषस्ये- च्छया न संभवति, अपुरुषार्थत्वात् । कर्मवश्यस्य तु स्वस्वरूपान- भिज्ञस्य कर्मानुगुणफलोपभोगायानिच्छतोऽपि तत्संबंधोऽवर्जनीयः, इति। स्यादेतदेवम्, यदि गुणत्रयमयः प्राकृतोऽस्यदेहस्स्यात्, स तु स्वाभिमतस्वानुरूपोऽप्राकृत एवेति सर्वमुपपन्नम् । जो यह कहते हो कि-शरीर संबंध होने से वह जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता, यह कथन भी असत् है, कर्मवश ही शरीर संबंध होता हो यह कोई आवश्यक नहीं है, सत्य संकल्पात्मिका इच्छा से भी आत्मा का शरीर संबंध होता है। यदि यह कहो कि- त्रिगुणात्मक प्रकृति भोग के परिणाम स्वरूप जो पंचमहाभूतों का संयोग होता है, उसे ही शरीर कहते हैं, ऐसे भौतिक शरीर का संबंध, निष्पाप सत्यसंकल्प पुरुष की इच्छामात्र से नहीं हो सकता, क्योंकि वह कभी धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि पुरुषार्थों का पालन नहीं करता । (अर्थात् पुरुषार्थ संबंधी भोगों में नहीं फँसता) अपने स्वरूप से अनभिज्ञ कर्मा- धीन जीव के न चाहते हुए भी, कर्मानुरूप फलभोग के लिए, देह संबंध अनिवार्य रूप से हो जाता है। हो सकता है आपका ही कथन ठीक हो आपके अनुसार जगत्सृष्टा का शरीर त्रिगुणमय प्राकृत हो सकता है पर हमारी दृष्टि में तो वह स्वेच्छा से अपने अनुरूप अप्राकृत देह धारण करके ही सृष्टि का कार्य संचालन करता है, ऐसा मानकर ही हम उक्त समस्या का समाधान कर पाते हैं। एतदुक्तं भवति-परस्यैव ब्रह्मणो निखिलहेयप्रत्यनीकानन्त ज्ञानानन्दैकस्वरूपतया सकलेतरविलक्षणस्य स्वाभाविकानवधिकाति-
( ३५६ ) शयासंख्येयकल्याणगुणगणाश्च संति। तद्वदेव स्वाभिमतानुरूपैक- रूपाचिन्त्यदिव्याद्भुत नित्यनिरवद्यनिरतिशयौज्वल्यसौन्दर्यसौगन्ध्यसौ- कुमार्यलावण्ययौवनाद्यनंतगुणगणनिधिदिव्यरूपमपि स्वाभाविक नास्ति। तदेवोपासकानुग्रहेण तत्तत्प्रतिपत्त्यनुरूप संस्थानं करोत्यपार- कारुण्यसौशील्यौदार्यजलनिधिः निरस्तनिखिलहेयगंधोऽपहतपाप्मा परंब्रह्म पुरुषोत्तमो नारायणः-इति । कथन यह है कि—हीनता रहित, अनंतज्ञान और आनंद स्वरूप होने से, समस्त पदार्थों से विलक्षण पर ब्रह्म ही, निरवधि, निरतिशय, असंख्य स्वाभाविक कल्याणमय गुणों की राशि हैं। तदनुरूप ही उनका स्वभावसिद्ध दिव्य रूप भी है। उसके अनुसार ही अचिन्त्य अलौकिक, अद्भुत, नित्य, निर्दोष, और सबका अतिक्रमण करने वाली औज्वल्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य ( सुयश ) सौकुमार्य लावण्य, यौवनादि अनंत गुण निधियां उनके दिव्य देह में स्वाभाविक रूप से रहती हैं। वे ही उपासकों की भावना के अनुरूप अनुग्रह करके अपने ऐसे दिव्य स्वरूप का चाक्षुष प्रत्यक्ष कराते हैं। अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य आदि गुणों के सागर, हीन दोषों से सर्वथा शून्य, निष्पाप, परब्रह्म पुरुषोत्तम नारायण ही जगत् सृष्टा हो सकते हैं। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते—सदेव सोम्येदमग्र आसीत्— आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः” इत्यादिषु निखिल जगदेक कारणतयाऽवगतस्यपरस्य ब्रह्मणः “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म—विज्ञानमानंदं ब्रह्म” इत्यादिष्वेवंभूतं स्वरूपमित्यवगम्यते । “निर्गुणं” निरंजनं—“अपहतपाप्माविजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः–न तस्य कार्यकरणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते—परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान बलक्रिया च–तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं दैवतानां परमं च दैवतम्—स कारणंकरणाधि ankurnagpal108@gmail.com
पाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते-वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्-सर्वेनिमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि” इत्यादिषु परस्यब्रह्मणःप्राकृत हेयगुणान् प्राकृतहेय देहसंबंधं तन्मूल कर्मवश्यतासबंधं च प्रतिषिध्य कल्याणगुणान् कल्याणरूपं च वदन्ति । “जिससे ये प्रपंच उत्पन्न होता है—हे सौम्य सृष्टि के पूर्व यह सारा विश्व सत् स्वरूप ही था—सृष्टि के पूर्व केवल परमात्मा ही था— एकमात्र नारायण ही थे, ब्रह्मा या शंकर नही थे।” इत्यादि वाक्यों में समस्त जगत् के एकमात्र कारण परब्रह्म का ही निरूपण ज्ञात होता है । तथा—‘‘ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है—परमात्मा विज्ञान और आनंद स्वरूप है ।” इत्यादि वाक्यों में उस परब्रह्म के स्वरूप का निरूपण किया गया है । “वह परब्रह्म निर्गुण, निरंजन, निष्पाप जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य सकल्प है । उसके कार्य ( शरीर ) और कारण ( इन्द्रियाँ ) नही हैं । उसके समान या अधिक कुछ भी दृष्टिगत नही होता । उसकी पराशक्ति स्वाभाविक ज्ञान-बल-क्रिया आदि विविध नामों वाली है । सर्वेश्वर देवाधिदेव ही सबके कारण तथा करणों ( इन्द्रियों ) के स्वामी ( ब्रह्मा आदि ) के भी अधिपति हैं । उनका जनक तथा स्वामी कोई नहीं है । जो धीरता पूर्वक समस्त रूप का विस्तार और नामों का विधान करके व्यावहारिक रूप से उसी में विराजते हैं, अज्ञानातीत आदित्यवर्ण उन महापुरुष को जानने की चेष्टा करो । समस्त निमेष ( स्फूर्तियाँ ) और विद्युत शक्तियाँ परंपुरुष से ही प्रकट होती हैं।” इत्यादि श्रुतियाँ परब्रह्म के प्राकृत तुच्छ गुण समूह, प्राकृत हेय देह संबंध, तदनुरूप कर्मवश्यता का खंडन करके कल्याणमय गुण और कल्याण- मय रूप का प्रतिपादन करती हैं । तदिदं स्वाभाविकमेवरूपमुपासकानुग्रहेण तत्प्रत्यनुगुणाकारं देवमनुष्यादिसंस्थानं, करोति स्वेच्छयैव परमकारुणिको भगवान् ।
( ३६१ ) तदिमाह श्रुतिः—“अजायमानो बहुधा विजायते” इति स्मृतिश्च— “अजोऽपि सन् अव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वाम- धिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां” इति । परम करुणामय भगवान्, दयावश स्वेच्छा से अपने स्वाभाविक दिव्यरूप को, उपासकों की क्षमता के अनुसार उनपर कृपा करने के लिए देव मनुष्य आदि सगुण प्राकृत देहों में परिणत कर देते हैं। जैसा कि श्रुति में—वह अजन्मा प्रायः प्रकट होता है "तथा स्मृति में भी"— अजन्मा और अविनाशी, सर्व नियामक मैं अपनी स्वाभाविक प्रकृति माया के आश्रय से प्रकट होता हूँ सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही मेरा अवतार होता है।" इत्यादि स्पष्ट कहा गया है। साधवो हि उपासकाः तत्परित्राणमेवोद्देश्यम् आनुषंगिकस्तु दुष्कृतां विनाशः संकल्पमात्रेणापि तदुत्पत्तेः । “प्रकृतिं स्वाम्” प्रकृतिः स्वभावः, स्वमेव स्वभावमास्थाय न संसारिणां स्वभावा- नित्यर्थः । आत्ममाययेति स्वसंकल्प रूपेण ज्ञानेन इत्यर्थः । “माया वयुनं ज्ञानं” इति ज्ञान पर्यायमपि माया शब्दं नैघण्टुका अधीयते । उक्त स्मृति वाक्य में साधु का तात्पर्य उपासक से है, उन्हीं के परित्राण के लिए प्रभु प्रकट होते हैं, दुष्टों के विनाश की बात तो प्रासं- गिक है, संकल्प मात्र ही प्रभु के अवतार में पर्याप्त है। “प्रकृतिं स्वाम्” में प्रकृति का तात्पर्य है स्वभाव, स्वाम् अर्थात् अपनी प्रकृति के आधार से ही प्रभु प्रकट होते हैं, संसारी स्वभाव प्राकट्य का आधार नहीं होता । आत्ममायया का तात्पर्य है, स्वसंकल्प रूप ज्ञान "ज्ञान के पर्याय रूप में माया शब्द का प्रयोग निघंटु में “मायावयुनं ज्ञानं" किया गया है । आह च भगवान पाराशरः “समस्ताश्शक्तयश्चैतानृप यत्र प्रति- ष्ठिताः, तद् विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद् हरेर्महत् । समस्त शक्ति ankurnagpal108@gmail.com
( ३६२ ) रूपाणि तत्करोति जनेश्वर, देवतिर्यङ्मनुष्याख्या चेष्टाय॑ते स्वलीलया । जगतामुपकाराय न सा कर्म निमित्तजा ।” इति महा- भारते चावताररूपस्याप्यप्राकृतत्वमुच्यते—“न भूत संघसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः” इति । अतः परस्यैव ब्रह्मण एवं रूपवत्वा- दयमपि तस्यैव धर्मः अत आदित्यमण्डलक्ष्यधिकरण आदित्यादि जीव व्यतिरिक्तः परमात्मैव । भगवान् पाराशर भी कहते हैं--“ये समस्त शक्तियाँ जहाँ प्रतिष्ठित हैं, वही परमात्मा का विश्वरूप है जो कि महान् और विलक्षण है । वह अपनी लीला से देवता पशु मनुष्य आदि चेष्टा वाले अपने शक्तिमय रूपों को प्रकट करते हैं । यह सब जगत के उपकार के लिए करते हैं, कर्मफल के भोग के लिए नहीं करते ।” महाभारत में भी प्रभु का अप्राकृत अवतार बतलाया गया है-“परमात्मा का यह देह पांचभौतिक नहीं है ।” इन सब प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-परमात्मा ही उक्त विशेषताओं वाले हैं उन्हीं के ये स्वाभाविक धर्म है । सूर्य और नेत्रों में वे ही विराज- मान हैं वे जीवों से सर्वथा विलक्षण हैं । भेदव्यपदेशाच्चान्यः १।१।२२ आदित्यादिजीवेभ्यो भेदोव्यपदिश्यतेऽस्य परमात्मनः “य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यश्शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयति”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”— योऽक्षरमन्तरे संचरन्यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं न वेद, योमृत्युमंतरे- संचरन् यस्य मृत्युः शरीरं यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूदन्तरात्माऽपहत- पाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इति चास्यापहतपाप्मनः पर- मात्मनस्सर्वान्जीवान् शरीरत्वेन व्यपदिश्य तेषामन्तरात्मत्वेनैनं व्यपदिशति । अतस्सर्वेभ्योहिरण्यगर्भादिजीवेभ्योऽन्य एव परमा- त्मेतिसिद्धम् । ankurnagpal108@gmail.com
परमात्मा का आदित्य आदि जीवों से स्पष्ट भेद दिखलाया गया है—"जो आदित्य में रहते हुए भी आदित्य से भिन्न है, उसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य उसका शरीर है, वह आदित्य में बैठकर उसका संयमन् करता है—जो आत्मा में होते हुए भी उससे भिन्न है, उसे आत्ना नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है अन्तर्यामी रूप से वही आत्मा का संयमन करता है—जो अक्षर में संचरित है, अक्षर जिसका शरीर है अक्षर उसे नहीं जानता—जो मृत्यु ( जगत ) में संचरित है, मृत्यु उसका शरीर है, मृत्यु उसे नहीं जानता, वह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप दिव्य एकमात्र नारायण है।" इस वाक्य में निष्पाप परमात्मा का शरीर जीवों को बतलाकर, उनका अन्तर्यामित्व बतलाया गया है। इससे सिद्ध होता है कि- परमात्मा, हिरण्यगर्भ आदि जीवों से सर्वथा विलक्षण है। ८ अधिकरण :— "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति जगत् कारण ब्रह्मेत्यवगम्यते। किं तज्जगत्कारणमित्यपेक्षायां "सदेव सोम्येदमग्र आसीत तत्तेजोऽसृजत्-आत्मा इदमेव एवाग्र आसीत्-स इमांल्लो- कानसृजत् तस्माद् वा एतस्मादात्मन् आकाशस्सम्भूतः" इति साधा- रणैशब्दैर्जगत्कारणे निर्दिष्टे ईक्षणविशेषानन्दविशेषरूपविशेषार्थ स्वभावात् प्रधानक्षेत्रज्ञादिव्यतिरिक्तं ब्रह्मेत्युक्तम्। इदानीमाका- शादि विशेषशब्दैर्निर्दिश्य जगत्कारणत्वजगदैश्वर्यादिवादेऽप्याका- शादिशब्दाभिधेयतयाप्रसिद्धचिदचिद्वस्तुनोऽर्थान्तरमुक्तलक्षणमेव ब्रह्मे- ति प्रतिपाद्यते आकाशास्तल्लिङ्गात् इत्यादिना पादशेषेण— जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं"—इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि-जगत् के कारण परमात्मा ही हैं। उस जगत् के कारण का स्वरूप क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर निम्न श्रुतियाँ सामने आती हैं-"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एक सत् ही था—उसने तेजकी सृष्टि की-जगत् पहिले आत्मस्वरूप ही था-जिसने इन लोकों की सृष्टि की—उम आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ" इन श्रुतियों में साधारण शब्दों से जगत्कर्त्ता
( ३६४ ) का निर्देश किया गया है । बाद में ईक्षण विशेष, आनंद विशेष, और रूप विशेष बोधक शब्दों द्वारा प्रधान और क्षेत्रज्ञ से विलक्षण ब्रह्म का प्रति- पादन किया गया है । अब आकाश आदि विशेष शब्दों से निर्देश करके जगत्कारणत्व और जगदैश्वर्यवाद में भी, प्रसिद्ध जडचेतन विलक्षण ब्रह्म को ही आकाश शब्द से बतलाते हैं— आकाशस्तल्लिङ्गात् १।१।२३। इदमाम्नायते छांदोग्ये “अस्य लोकस्य का गतिरिति आकाश इति होवाच सर्वाणि हवा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते, आकाश प्रत्यस्त यंति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्” इति । तत्र संदेहः किं प्रसिद्धाकाश एवात्राकाशशब्देन अभिधीयते उतोक्तलक्षणमेव ब्रह्म इति । किं प्राप्तम् ? प्रसिद्ध आकाश इति कुतः ? शब्दैकसमधिगम्ये वस्तुनि य एवार्थो व्युत्पत्तिसिद्धशब्देन प्रतीयते स एव ग्रहीतव्यः । अतः प्रसिद्ध आकाश एव चराचरभूतजातस्य कृत्स्नस्य कारणम् अतस्तस्मादनतिरिक्तं ब्रह्म । छांदोग्योपनिषद में पाठ है कि-“इस लोक की गति क्या है ? उसने कहा आकाश, समस्तभूत समुदाय आकाश से ही उत्पन्न हुआ है और आकाश में ही विलीन हो जाता है, आकाश सभी भूतों से श्रेष्ठ है, यह सभी का आश्रय है ।” यहाँ संदेह होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही यहाँ आकाश शब्द से उल्लेख्य है अथवा उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म का निर्देश है ? (पूर्वपक्ष) प्रसिद्ध आकाश ही हो सकता है क्यों कि-एकमात्र शब्द गम्य विषय में, शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार शब्द से जो अर्थ प्रतीत होता है उसे ही मानना उचित होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में आकाश ही चराचर जगत् का कारण है, ब्रह्म भी वही है । नान्वीक्षापूर्वकं सृष्ट्यादिभिरचेतनाचेतनजीवाच्च व्यतिरिक्तं ब्रह्मेत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् अयुक्तं तु तत् । तथाहि “यतो वा इमानि ankurnagpal108@gmail.com
( ३६५ ) भूतानि जायन्ते तद्ब्रह्म" इत्युक्ते कुत इमानि भूतानि जायन्त इत्यादि विशेषापेक्षायां “सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते” इत्यादिना विशेषप्रतीतेः जगज्जन्मादिकारणं आकाश एवेति निश्चिते सति “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिष्वपि सदिशब्दासाधारणकारास्तमेव विशेषमाकाशमभिदधति । “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” इत्यादिष्वात्मशब्दोऽपि तत्रैव वर्त्तते ।” तस्यापि हि चेतनैकान्तत्वं न संभवति । यथा-“मृदात्मको घटः” इति । आप्नोतीत्यात्मेति व्युत्पत्या सुतरामाकाशेऽप्यात्मशब्दो वर्त्तते । अत एवमाकाश एव कारणं ब्रह्मेति निश्चिते सतीक्षणादय- स्तदनुगुणांगौणावर्णनीयाः । यदि हि साधारणशब्दैरेव सदादिभिः कारणमभ्यधायिष्यत, ईक्षणाद्यर्थानुरोधेन चेतनविशेष एव कारण- मिति निरचेष्यत । आकाश शब्देन तु विशेष एव निश्चित इति नार्थस्वाभाव्यान्निर्णेतव्यमस्ति । उक्त पक्ष पर शंका होती है कि-ब्रह्म तो जड और चेतन जीवों से भिन्न, स्वेच्छा से सृष्टि करने वाला कहा जाता है, (तो वह आकाश कैसे हो सकता है ?) (उत्तर) हाँ कहा तो गया है पर वह कथन ठीक नहीं है। उस कथन पर यह शंका तो बनी ही रहती है कि-ये भूत किससे उत्पन्न हुए ? उक्त शंका की पूर्ति ‘ये सब आकाश से ही हुए” इत्यादि वाक्य से होती है और निश्चित होता है जगत् के जन्मादि का कारण आकाश है । ऐसा निश्चित हो जाने पर “हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व सत् ही था” इस वाक्य में कहे गए “सत्” शब्द का अर्थ भी आकाश ही निश्चित होता है । तथा “यह सारा जगत् पहले आत्मा ही था” इस वाक्य का “आत्मा” शब्द भी आकाश वाची ही सिद्ध होता है । आत्मा शब्द एकमात्र चेतन तत्त्व का ही ज्ञापक हो सो बात भी नहीं है । “मृदात्मक घट” ऐसे अचेतन प्रयोग भी आत्मा के लिए होते हैं । “आप्नोति इति आत्मा” अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त है वह आत्मा है इति व्युत्पत्ति के अनुसार भी आत्मा शब्द आकाश वाची हो सकता है । इस- ankurnagpal108@gmail.com
( ३६६ ) लिए आकाश ही कारण ब्रह्म है ऐसा निश्चित हो जाने पर, जगत कर्त्ता के लिए प्रयुक्त ईक्षण आदि गुण गौण प्रतीत होते हैं । और फिर यदि "सद्" आदि साधारण शब्दों पर ही जगत कर्त्ता का निर्णय निर्भर है तो ईक्षण आदि अर्थों के द्वारा चेतन विशेष को ही कारण मानना चाहिए । आकाश शब्द का तो विशेष उल्लेख होने से निश्चित हो जाता है कि आकाश ही जगत कर्त्ता है, अर्थ के आधार पर निर्णय करने की बात तो उठती ही नहीं । ननु "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इत्याकाशस्यापि कार्यत्वं प्रतीयते । सत्यम्, सर्वेषामेवाकाशवाथ्वादीनां सूक्ष्मावस्थास्थूला- वस्थाचेत्यवस्थाद्वयमस्ति । तत्राकाशस्य सूक्ष्मावस्था कारणम् । स्थूलावस्था तु कार्यम् । "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इति स्वस्मा- देव सूक्ष्मरूपात् स्वयं स्थूलरूपस्सम्भूत इत्यर्थः । "सर्वाणि ह वा इमानि भूता याकाशादेव समुत्पद्यन्ते" इ त सर्वस्य जगत आकाशा- देव प्रभवाप्ययादि श्रवणात् तदेव हि कारणं ब्रह्मेति निश्चितम् यत एवं प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्म अत एव च "यदेषश्राकाश आनंदो न स्यात्" आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इत्येवमादि निर्देशोप्युपपन्नतरः । अतः प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्मेति । संशय होता है कि—"आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से तो आकाश की कार्यता ज्ञात होती है ठीक है, आकाश वायु आदि सभी की स्थूल और सूक्ष्म दो अवस्थायें होती हैं। आकाश की सूक्ष्मावस्था कारण तथा स्थूलावस्था कार्य है । "आत्मा से आकाश हुआ" का तात्पर्य है कि वह अपने सूक्ष्म रूप से स्वयं स्थूल हुआ । सारे भूत समुदाय आकाश से उत्पन्न हुए "इस वाक्य से ज्ञात होता है कि-आकाश से ही सब का उदय और उसी में सब लय होते हैं इसलिए आकाश ही कारण ब्रह्म निश्चित होता है । इससे यह भी निश्चिन होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है" यदि यह आनंद स्वरूप आकाश न होता "आकाश ही नामरूप को धारण करने वाला है" इत्यादि निर्देशक वाक्य भी इसी तथ्य के उपपादक हैं । इससे सिद्ध होता है कि प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है ।
( ३६७ ) सिद्धान्त—एवं प्राप्ते ब्रूमः—आकाशस्तल्लिङ्गात् आकाश- शब्दाभिधेयः प्रसिद्धाकाशादचेतनादर्थान्तरभूतो यथोक्तलक्षणः पर- मात्मैव कुतः ? तल्लिङ्गात् निखिलजगदेककारणत्वं, परायणत्वं इत्यादीनि परमात्मलिङ्गानि उपलभ्यन्ते । निखिल कारणत्वं हि अचिद्वस्तुनः प्रसिद्धाकाशशब्दाभिधेयस्य नोपपद्यते, चेतन- वस्तुनस्तत्कार्यत्वासंभवात् । परायणत्वं च चेतनानां परमप्राप्यत्वं । तच्चाचेतनस्य हेयस्य सकलपुरुषार्थ विरोधिनो न संभवति । सर्वस्माज्ज्यायस्त्वं च निरुपाधिकं सर्वैः कल्याणगुणैस्सर्वभ्यो- निरतिशयोत्कर्षः । तदप्यचितो नोपपद्यते । सिद्धान्त—उक्त मत पर कथन यह है कि—प्रसिद्ध आकाश से पृथक् पूर्वोक्त लक्षणों वाला परमात्मा ही यहाँ आकाश शब्द वाच्य है । क्यों कि-सूत्र में “तल्लिङ्गात्” अर्थात् 'उसके बोधक' ऐसा स्पष्ट उल्लेख है । संपूर्ण जगत की एकमात्र कारणता, सर्वश्रेष्ठता और परमाश्रयता इत्यादि परमात्म बोधक शब्द शास्त्रों में पाये जाते हैं । चिदचिद् जगत की कारणता आकाश नामक जड तत्त्व में संभव नहीं है । उसमें चेतन वस्तु के संचालन की क्षमता तो कदापि नहीं हो सकती । जगतकर्त्ता के लिए जो परायण विशेषण मिलता है उसका अर्थ होता है “परम आश्रय” जो कि अचेतन पुरुषार्थ रहित वस्तु में संभव नहीं है । “सर्वश्रेष्ठता” का अर्थ भी “निरपेक्ष अतिशय कल्याण गुणों की उत्कर्षता” है, यह भी अचेतन में संभव नहीं है । यदुक्तं जगत्कारणविशेषाकांक्षायाम् आकाशशब्देन विशेष- समर्पणादन्यत्सर्वंतदनुरूपमेव वर्णनीयमिति, तदयुक्तम् “सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते” इति प्रसिद्धवन्निर्दें- शात् । प्रसिद्धवन्निर्देशो हि प्रमाणान्तरप्राप्तिमपेक्षते । प्रमा- णान्तराणि च “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्येवमादीन्येव वाक्यानि तानि च यथोदितप्रकारेणैव ब्रह्म प्रतिपादयन्तीति तत्प्रतिपादितं ankurnagpal108@gmail.com
( ३६८ ) ब्रह्माकाशशब्देन प्रसिद्धवन्निर्दिश्यते । संभवति च परस्यब्रह्मणः प्रकाशकत्वादाकाशशब्दाभिधेयत्वं आकाशते आकाशयति च इति । यदि कहो कि - विशेषरूप से जगतकर्ता के स्वरूप के निर्धारण के अभिप्राय से 'आकाश" शब्दविशेष का उल्लेख किया गया है, सो ऐसा कहना भी गलत है । "ये सारे भूत आकाश से ही उत्पन्न होते हैं" इस श्रुति में प्रसिद्ध का सा निर्देश है (विशेष का नहीं) प्रसिद्ध का सा वर्णन अन्य प्रमाणों से सापेक्ष होता है (अर्थात् प्रसिद्ध के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता होती है "यह वही है जिसकी इस रूप में प्रसिद्धि है") अन्य प्रमाण जैसे- "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र 'सत्' ही था ।" ये प्रमाण प्रसिद्ध ब्रह्म के ही प्रतिपादक है । उस ब्रह्म का प्रतिपादक आकाश शब्द प्रसिद्ध की तरह ही कहा गया है । प्रकाशक अर्थवाची आकाश शब्द परब्रह्म में ही घटता है । आकाशते = प्रकाशते आकाशयति = प्रकाशयति अर्थात् जो आ समंतात् चारो ओर से काशते-प्रकाशते होता है अथवा जो दूसरे को प्रकाशित करता है [इन दो व्युत्पत्तियों से प्रकाशवाची आकाश शब्द परब्रह्म का बोधक ही सिद्ध होता है] किं च-अनेनाकाशशब्देन विशेषसमर्पणक्षमेणापि चेतनांशं प्रत्यसंभावितकारणभावमचेतनविशेषमभिदधानेन "तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" सोऽकामयत् बहुस्यां प्रजायेय "इत्यादि वाक्यशेषावधारित सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वादि विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थ वाक्यार्था- न्यथाकारणं न प्रमाणपदवीमधिरोहति । एवमपूर्वानन्तविशेषण- विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थनेकवाक्यगतिसामान्यं चैकेनानुवाद- स्वरूपेणान्यथाकर्तुं न शक्यते । अर्थ विशेष (भूताकाश) के प्रतिपादक होते हुए भी इस (आकाश) में चेतनांश की कारणता असंभव है । अचेतन विशेष प्रतिपादक आकाश में उसने सोचा में बहुत हो जाऊँ" उसने बहुत होने का संकल्प किया इत्यादि वाक्यों से ज्ञात, सर्वज्ञता, सर्वसंकल्पता आदि विशिष्ट अलौकिक प्रतिपादक अर्थों को झुठला कर अपने लिए प्रमाण रूप से इन वाक्यों को ankurnagpal108@gmail.com
( ३६६ ) मनवा लेना संभव नहीं है । अनन्त विशेषण विशिष्ट अपूर्व अर्थ प्रति- पादनक्षम अनेक वाक्यों की जो एक सामान्य गति है (अर्थात् जो विशेष विशेषणों से, एक चेतनविशिष्ट ब्रह्म का ही प्रतिपादन कर रहे हैं) उसे आकाश शब्द के प्रतिपादन के लिए, केवल अनुवाद मात्र कह कर झुठलाया भी नहीं जा सकता । यत्वात्मशब्दश्चेतनैकान्तो न भवति, “मृदात्मकोघटः” इत्यादिदर्शनादित्युक्तम्, तत्रोच्यते—यद्यपि चेतनादन्यत्रापि क्वचि- दात्मशब्दः प्रयुज्यते, तथापि शरीर प्रतिसंबंधिन्यात्मशब्दस्य प्रयोग प्राचुर्यात्— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” आत्मन आकाशस्संभूतः “इत्यादिषु शरीरप्रतिसंबंधि चेतन एव प्रतीयते यथा गोशब्दस्यानेकार्थवाचित्वेऽपि प्रयोगप्राचुर्यात् सास्नादिमानेव स्वतः प्रतीयते । अर्थान्तरप्रतीतिस्तु तत्तदसाधारणनिर्देशापेक्षा, तथास्वतःप्राप्तं शरीरप्रतिसंबंधिचेतनाभिधानमेव । “सईक्षत लोकान्नु सृजां इति “सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय” इत्यादि तत्तद् [
( ३७० ) प्रतीति तो, उस अर्थ संबंधी असाधारण निर्देश से अपेक्षित होती है, स्वतः ज्ञात अर्थ तो शरीर संबंधी चेतनाभिधायक ही है । “उसने सोचा कि लोक की सृष्टि करूँ” उसने सोचा अनेक रूप धारण करूँ “इत्यादि वाक्य सामर्थ्यवान चेतन शक्ति को ही जगत कर्त्ता के रूप मे वर्णन करते हैं, वाक्यशेष शब्दो द्वारा प्रतिपादित तथा अनन्य असाधारण अलौकि- कार्थ बोधक “सदेव सौम्य ।” इत्यादि वाक्य सिद्ध ब्रह्म ही “आकाश” शब्द से प्रसिद्ध की तरह “सर्वाणि हवा इमानि भूतानि” इत्यादि वाक्यो में बतलाए गए है । ६ अधिकरण— अत एव प्राणः १।१।२४॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—‘प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता” इति प्रस्तुत्य “कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्य- पतिष्यत” इति । ऐसा छांदोग्योपनिषद् में वर्णन आता है कि—“हे स्तोत्र पाठक ! जो देवता प्रस्ताव में अनुगत हैं” इस भूमिका के बाद जिज्ञासा की गई कि “वे देवता कौन हैं [ इसके उत्तर में उषस्ति ऋषि ने प्रस्तोता से कहा—]” प्राण “ही वे देवता है, ये सारे भूत समुदाय प्राण में ही प्रवेश करते हैं, प्राण से ही उत्पन्न होते हैं, वे प्राण देवता ही प्रस्ताव के लिए अनुगत हैं। उनको न जानकर (अर्थहीन) स्तोत्र पाठ करोगे तो तुम्हारा मस्तक कट कर गिर जावेगा ।” अत्र प्राणशब्दोप्याकाशशब्दवत् प्रसिद्धप्राणव्यतिरिक्ते परस्मिन्नेव ब्रह्मणि वर्तते, तदसाधारणनिखिलजगत्प्रवेश- निष्क्रमणार्दिलिंगात् प्रसिद्धवन्निर्दिष्टात् । अधिकाशंका तु कृत्स्नस्य- भूतजातस्य प्राणाधीनस्थितिप्रवृत्यादिदर्शनात् प्रसिद्धएव प्राणो जगत्कारणतया निर्देशमर्हति इति । ankurnagpal108@gmail.com