श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६८ ) ब्रह्माकाशशब्देन प्रसिद्धवन्निर्दिश्यते । संभवति च परस्यब्रह्मणः प्रकाशकत्वादाकाशशब्दाभिधेयत्वं आकाशते आकाशयति च इति । यदि कहो कि - विशेषरूप से जगतकर्ता के स्वरूप के निर्धारण के अभिप्राय से 'आकाश" शब्दविशेष का उल्लेख किया गया है, सो ऐसा कहना भी गलत है । "ये सारे भूत आकाश से ही उत्पन्न होते हैं" इस श्रुति में प्रसिद्ध का सा निर्देश है (विशेष का नहीं) प्रसिद्ध का सा वर्णन अन्य प्रमाणों से सापेक्ष होता है (अर्थात् प्रसिद्ध के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता होती है "यह वही है जिसकी इस रूप में प्रसिद्धि है") अन्य प्रमाण जैसे- "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र 'सत्' ही था ।" ये प्रमाण प्रसिद्ध ब्रह्म के ही प्रतिपादक है । उस ब्रह्म का प्रतिपादक आकाश शब्द प्रसिद्ध की तरह ही कहा गया है । प्रकाशक अर्थवाची आकाश शब्द परब्रह्म में ही घटता है । आकाशते = प्रकाशते आकाशयति = प्रकाशयति अर्थात् जो आ समंतात् चारो ओर से काशते-प्रकाशते होता है अथवा जो दूसरे को प्रकाशित करता है [इन दो व्युत्पत्तियों से प्रकाशवाची आकाश शब्द परब्रह्म का बोधक ही सिद्ध होता है] किं च-अनेनाकाशशब्देन विशेषसमर्पणक्षमेणापि चेतनांशं प्रत्यसंभावितकारणभावमचेतनविशेषमभिदधानेन "तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" सोऽकामयत् बहुस्यां प्रजायेय "इत्यादि वाक्यशेषावधारित सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वादि विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थ वाक्यार्था- न्यथाकारणं न प्रमाणपदवीमधिरोहति । एवमपूर्वानन्तविशेषण- विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थनेकवाक्यगतिसामान्यं चैकेनानुवाद- स्वरूपेणान्यथाकर्तुं न शक्यते । अर्थ विशेष (भूताकाश) के प्रतिपादक होते हुए भी इस (आकाश) में चेतनांश की कारणता असंभव है । अचेतन विशेष प्रतिपादक आकाश में उसने सोचा में बहुत हो जाऊँ" उसने बहुत होने का संकल्प किया इत्यादि वाक्यों से ज्ञात, सर्वज्ञता, सर्वसंकल्पता आदि विशिष्ट अलौकिक प्रतिपादक अर्थों को झुठला कर अपने लिए प्रमाण रूप से इन वाक्यों को ankurnagpal108@gmail.com