श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६६ ) मनवा लेना संभव नहीं है । अनन्त विशेषण विशिष्ट अपूर्व अर्थ प्रति- पादनक्षम अनेक वाक्यों की जो एक सामान्य गति है (अर्थात् जो विशेष विशेषणों से, एक चेतनविशिष्ट ब्रह्म का ही प्रतिपादन कर रहे हैं) उसे आकाश शब्द के प्रतिपादन के लिए, केवल अनुवाद मात्र कह कर झुठलाया भी नहीं जा सकता । यत्वात्मशब्दश्चेतनैकान्तो न भवति, “मृदात्मकोघटः” इत्यादिदर्शनादित्युक्तम्, तत्रोच्यते—यद्यपि चेतनादन्यत्रापि क्वचि- दात्मशब्दः प्रयुज्यते, तथापि शरीर प्रतिसंबंधिन्यात्मशब्दस्य प्रयोग प्राचुर्यात्— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” आत्मन आकाशस्संभूतः “इत्यादिषु शरीरप्रतिसंबंधि चेतन एव प्रतीयते यथा गोशब्दस्यानेकार्थवाचित्वेऽपि प्रयोगप्राचुर्यात् सास्नादिमानेव स्वतः प्रतीयते । अर्थान्तरप्रतीतिस्तु तत्तदसाधारणनिर्देशापेक्षा, तथास्वतःप्राप्तं शरीरप्रतिसंबंधिचेतनाभिधानमेव । “सईक्षत लोकान्नु सृजां इति “सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय” इत्यादि तत्तद् [