श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७० ) प्रतीति तो, उस अर्थ संबंधी असाधारण निर्देश से अपेक्षित होती है, स्वतः ज्ञात अर्थ तो शरीर संबंधी चेतनाभिधायक ही है । “उसने सोचा कि लोक की सृष्टि करूँ” उसने सोचा अनेक रूप धारण करूँ “इत्यादि वाक्य सामर्थ्यवान चेतन शक्ति को ही जगत कर्त्ता के रूप मे वर्णन करते हैं, वाक्यशेष शब्दो द्वारा प्रतिपादित तथा अनन्य असाधारण अलौकि- कार्थ बोधक “सदेव सौम्य ।” इत्यादि वाक्य सिद्ध ब्रह्म ही “आकाश” शब्द से प्रसिद्ध की तरह “सर्वाणि हवा इमानि भूतानि” इत्यादि वाक्यो में बतलाए गए है । ६ अधिकरण— अत एव प्राणः १।१।२४॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—‘प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता” इति प्रस्तुत्य “कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्य- पतिष्यत” इति । ऐसा छांदोग्योपनिषद् में वर्णन आता है कि—“हे स्तोत्र पाठक ! जो देवता प्रस्ताव में अनुगत हैं” इस भूमिका के बाद जिज्ञासा की गई कि “वे देवता कौन हैं [ इसके उत्तर में उषस्ति ऋषि ने प्रस्तोता से कहा—]” प्राण “ही वे देवता है, ये सारे भूत समुदाय प्राण में ही प्रवेश करते हैं, प्राण से ही उत्पन्न होते हैं, वे प्राण देवता ही प्रस्ताव के लिए अनुगत हैं। उनको न जानकर (अर्थहीन) स्तोत्र पाठ करोगे तो तुम्हारा मस्तक कट कर गिर जावेगा ।” अत्र प्राणशब्दोप्याकाशशब्दवत् प्रसिद्धप्राणव्यतिरिक्ते परस्मिन्नेव ब्रह्मणि वर्तते, तदसाधारणनिखिलजगत्प्रवेश- निष्क्रमणार्दिलिंगात् प्रसिद्धवन्निर्दिष्टात् । अधिकाशंका तु कृत्स्नस्य- भूतजातस्य प्राणाधीनस्थितिप्रवृत्यादिदर्शनात् प्रसिद्धएव प्राणो जगत्कारणतया निर्देशमर्हति इति । ankurnagpal108@gmail.com