श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७१ ) उक्त श्रुति बतलाती है कि-आकाश शब्द की तरह प्राण शब्द भी, प्रसिद्ध प्राण से भिन्न परमात्मा का ही वाचक है। समस्त जगत् के असाधारण प्रवेश निष्क्रमण आदि के उल्लेख तथा प्रसिद्ध की तरह निर्देश से उक्त बात की ही पुष्टि होती है। इस पर एक विशेष शंका की जाती है कि- संपूर्ण भूत समुदाय से उद्भूत पदार्थों की स्थिति, प्रवृति आदि प्राणाधीन ही देखी जाती है। इसलिए जगत्कर्त्ता के रूप में प्रसिद्ध प्राण का ही निर्देश प्रतीत होता है। परिहारस्तु--शिलाकाष्ठादिषु चेतनस्वरूपे च तदभावात् “सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्यु- ज्जिहते” इति नोपपद्यत इति । अतः प्राणयति सर्वाणिभूतानि इति कृत्वा परंब्रह्मैव प्राणशब्देनाभिधीयते । अतः प्रसिद्धाकाश प्राणादेरन्यदेव निखिलजगदेककारणमपहतपाप्मत्वसार्वज्ञसर्व- संकल्पत्वाद्यनंतकल्याणगुणगणं परंब्रह्मौवाकाश प्राणादिशब्दा- भिधेयमिति सिद्धम् । परिहार—शिलाकाष्ठ आदि के चेतन स्वरूप में उस प्राण का अभाव है, “सारे भूत प्राण में ही स्थित हैं तथा प्राण से ही उद्गत होते हैं” इस प्रमाण से भूत समुदाय की स्थिति प्राण में बतलाई गई है, यदि इसे प्रसिद्ध प्राण का वर्णन मान लें तो निष्प्राण शिलाकाष्ठादि की संगति कैसे बैठेगी। सभी भूतों को प्राणित करता है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार परब्रह्म ही प्राणवाची सिद्ध होता है। प्रसिद्ध आकाश और प्राण से भिन्न संपूर्ण जगत का कारण निष्पाप, सर्वज्ञ, सत्यसंकल्प, अनंत कल्याण गुणों वाला परमात्मा ही आकाश प्राण आदि शब्दवाची है। १० अधिकरण— अतः परं जगत्कारणत्वव्याप्तेन येन केनापिनिरतिशयोत्कृष्ट- गुणेन जुष्टं ज्योतिरिन्द्रादिशब्दैरर्थान्तरप्रसिद्धैरप्यभिधीयमानं परंब्रह्मैवेत्यभिधीयते, ज्योतिश्चरणाभिधानात् इत्यादिना । ankurnagpal108@gmail.com