श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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जगतकर्त्ता के समर्थक जो भी गुण आवश्यक है अर्थान्तर में प्रसिद्ध ज्योति इन्द्र इत्यादि शब्दवाची सभी गुण विशेष परब्रह्म के हैं, ऐमा “ज्योतिश्चरणाभिधानात्” सूत्रो मे बतलावेगे । ज्योतिश्चरणाभिधानात् १।१।२५॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये-“अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूलोकेष्विदं वाव तद्यदिम- मस्मिन्नन्तः पुरुषेज्योतिः” इति । तत्र संशयः किमयं ज्योतिशब्देन- निर्दिष्टोनरतिशयदीप्तियुक्तोऽर्थः प्रसिद्धमादित्यादिज्योतिरेव कारणभूत ब्रह्म उत् समस्तचिदचिद्वस्तुजातविजातीयः परमकारणभूतोऽमि- तभाः सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः पुरुषोत्तमः इति । छांदोग्य का प्रवचन है कि—“द्युलोक, विश्व, तथा उत्तमाधम समस्त लोकों के ऊपर जो ज्योति प्रकाशित हो रही है वह पुरुषों की अन्तःस्थ ज्योति ही है।” इस प्रसंग पर संशय होता है कि—क्या उक्त ज्योति शब्द से निर्दिष्ट अतिशय दीप्ति अर्थवाली प्रसिद्ध सूर्य आदि की ज्योति ही कारण ब्रह्म है अथवा समस्त जडचेतन वस्तुओं से विलक्षण सभी के कारण अमित दीप्तिमान सर्वज्ञसत्यसंकल्प पुरुषोत्तम ज्योति- नाम से अभिहित हैं ? किं युक्तम् ? प्रसिद्धमेव ज्योतिरिति । कुतः प्रसिद्धवन्निर्देशेऽप्या- काशप्राणादिवत् स्ववाक्योपात्तपरमात्मव्याप्त लिंगविशेषा दर्शनात्, परमपुरुष प्रत्यभिज्ञानासम्भवात्, कौक्षेयज्योतिषैक्योपदेशाच्च प्रसिद्धमेव ज्योतिः कारणत्वव्याप्तनिरतिशय दीप्तियोगाज्जगत्कारणं ब्रह्मेति । उक्त दोनों में कौन समीचीन है ? (पूर्वपक्ष) प्रसिद्ध ज्योति ही कारण ब्रह्म हो सकती है क्यों कि—प्रसिद्ध की तरह निर्देश होते हुए भी आकाश और प्राण की तरह उक्त वाक्य में, परमात्म ग्राहक कोई निर्देश नहीं किया गया है तथा ज्योति की परमात्म विषयक कोई