भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३७३ ) प्रत्यभिज्ञा भी नहीं की गई है। उदरस्थ ज्योति से प्रसिद्ध ज्योति का ऐक्य भी बतलाया है। जिससे ज्ञात होता है कि—प्रसिद्ध ज्योति ही कारण ब्रह्म है। सिद्धान्त—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—ज्योतिश्चरणाभिधानात्द्युसंबं- धितयानिर्दिष्टं निरतिशयदीप्तियुक्तं परमपुरुष एव । कुतः ? “पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि” इत्यस्यैव द्युसंबन्धिनश्चरणत्वेन सर्वभूताभिधानात् । सिद्धान्त--इस पर मेरा मत यह है कि-द्युलोक से संबद्ध अतिशय दीप्तिमती ज्योति परब्रह्म ही है, क्यों कि-"समस्त भूत समुदाय उसका एक पाद है तथा उससे तीन पाद द्युलोक में स्थित हैं" इस वाक्य में समस्त भूत समुदाय को द्यु संबंध विशिष्ट उक्त ज्योति के चरण रूप से कहा गया है। एतदुक्तं भवति—यद्यपि—“अथ यदतः परोदिवो ज्योतिः” इत्यस्मिन्वाक्ये परमपुरुषासाधारणलिंगनोपलभ्यते, तथापि पूर्वं वाक्ये द्युसंबंधितयापरमपुरुषस्य निर्देशादिदमपि द्युसंबंधिज्योतिस्स एवेति प्रत्यभिज्ञायत इति । कौक्षेयज्योतिषैक्योपदेशश्च फलाय तदात्मकत्वानुसंधानविधिरिति न कश्चिद्दोषः, कौक्षेयज्योतिष- श्चतदात्मकत्वं भगवता स्वयमेवोक्तम् “अहंवैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः” इति । कथन यह है कि-"इस द्युलोक के ऊपर जो ज्योति प्रकाशित हो रही है" इस वाक्य में यद्यपि परंपुरुष का ग्राहक कोई लिंग (चिन्ह) नहीं है, फिर भी पूर्व वाक्य में द्यु संबंधी जिस परंपुरुष का निर्देश है, उसी से इस वाक्य की उल्लेख्य ज्योति विशिष्ट का संबंध समन्वय प्रतीत होता है, इस ज्योति से उदरस्थ ज्योति की जो एकता बतलाई गई वह भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। फल विशेष की प्राप्ति के लिए ही उदरस्थ ज्योति की एकता बतलाई गई है। उदरस्थ ज्योति की ब्रह्म-