श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७४ ) त्मकता स्वयं भगवान ने ही बतलाई है—"मैं ही प्राणियों में जाठराग्नि के रूप में स्थित हूँ।" छन्दोभिधानान्नेतिचेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगमात्तथाहिदर्शनम् ॥१।१।२६॥ पूर्वस्मिन् वाक्ये "गायत्री वा इदं सर्वम्" इति गायत्र्याख्यं छंदोऽभिधाय "तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम्" इत्युदाहृतायाः "तावानस्य महिमा" इत्युक्तवा ऋचोऽपि छन्दोविषयत्वान्नात्र परं पुरुषाभि- धानमिति चेत् । तन्न, तथा चेतोऽर्पणनिगमात् न गायत्री शब्देन छंदोमात्र इहाभिधीयते छंदोमात्रस्य सर्वात्मकत्वानुपपत्तेः अपि तु ब्रह्मण एव गायत्री चेतोऽर्पणमिह निगद्यते । ब्रह्मणि गायत्री सादृश्यानुसंधानं फलायोपदिश्यत इत्यर्थः । उक्त ज्योति प्रसंग के पूर्ववर्त्ती वाक्य में "गायत्री ही ये सारा जगत है" गायत्री छंद का उल्लेख करके—"इसे ही मंत्र कहते हैं" यह समस्त उसी की महिमा है" इत्यादि में गायत्री मंत्र का ही उल्लेख है इसलिए उक्त प्रसंग परमपुरुष का अभिधायक नहीं है; ऐसा कथन असंगत है। उक्त प्रसंग में वस्तुतः चित्त समर्पण की विधि का उल्लेख है। यहाँ "गायत्री" शब्द केवल छंद के अर्थ में ही प्रयुक्त हो सो बात नहीं है, अपितु गायत्री से ब्रह्म अर्थ भी अभिप्रेत है, उसी में चित्त समर्पण का उपदेश दिया गया हैं, अर्थात् फलविशेष की प्राप्ति के लिए, ब्रह्म का ही गायत्री की तरह चिन्तन करने का उपदेश दिया गया है। संभवति च—"पादोऽस्य सर्वाभूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति चतुष्पदो ब्रह्मणश्चतुष्पदया गायत्र्या च सादृश्यम् । चतुष्पदा च गायत्री क्वचिद्दृश्यते । तद्यथा—"इन्द्रः शचीपतिः । बलेन पीड़ितः । दुश्च्यवनो वृषा । समित्सुसासहिः" इति । तथा ह्यन्यत्रापि सादृश्याच्छन्दोभिधायी शब्दोऽर्थान्तरे प्रयुज्यमानो दृश्यते । यथा ankurnagpal108@gmail.com