श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७५ ) संवर्गविद्यायाम्—"ते वा एते पंचान्ये दश संपद्यंते" इत्यारभ्य “सैषा विराडन्नात्” इत्युच्यते । “इसके एक चरण में सारा विश्व है, तथा इसके तीन चरण अमृत द्युलोक में हैं" इस श्रुति से चतुष्पद ब्रह्म से चतुष्पदा गायत्री का सादृश्य ज्ञान होता है । कहीं-कहीं चतुष्पदा गायत्री देखी भी जाती है, जैसे कि— (१) “इन्द्र शचीपतिः (२) बलेन पीड़ितः (३) दुश्च्यवनो वृषा (४)” समित्सु सासहिः कहीं सादृश्य छंदबोधक शब्द का दूसरा अर्थ भी देखा जाता है । जैसा कि संवर्ग विद्या में—"ये अग्नि आदि पंच महाभूत और वाग् आदि पंच ज्ञानेन्द्रिया मिलकर दस होते हैं।" ऐसा कहकर “वे ही विराट के भक्ष्य अन्न हैं।" ऐसा बतलाया गया । इतश्च गायत्री शब्देन ब्रह्मै वाभिधीयते— इसलिए भी गायत्री शब्द से ब्रह्म की प्रतीति होती है कि— भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् । १।१।२७॥ भूतपृथिवीशरीरहृदयानि निर्दिश्य “सैषा चतुष्पदा” इति व्यपदेशो ब्रह्मण्येव गायत्री शब्दाभिधेय उपपद्यते । भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय को निर्देश करते हुए बतलाया गया कि—"इन चारों से चतुष्पदा हैं।" ऐसा व्यपदेश ब्रह्म के लिए ही, गायत्री शब्द से किया गया है । उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् । १।१।२८॥ पूर्ववाक्ये "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति दिवोऽधिकरणत्वेन दिनिर्देशादिह च दिवः पर इत्यवाधित्त्वेन निर्देशादुपदेशस्य भिन्नरूप- त्वेन पूर्ववाक्योक्तं ब्रह्म परस्मिन्न प्रत्यभिज्ञायत इति चेत्-तन्न उभयस्मिन्नपि उपदेशे अर्थस्वभावैक्येन प्रत्यभिज्ञाया अविरोधात् । यथा—"वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परश्श्येनः" इति । तस्मात् परमपुरुष एव निरतिशयतेजस्को दिवःपरःज्योतिर्दीप्यत इति प्रति- पाद्यते ।