श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७६ ) यदि कहें कि—"इसके अमृत स्वरूप तीन चरण द्युलोक में हैं' इस वाक्य में द्युलोक को तीन चरणों का अधिकरण कहा गया है और “द्युलोक से पर” इस वाक्य में उसकी अवधि कही गई है, इस प्रकार दोनों उपदेशों में विभिन्नता है । इसलिए ये दोनों वचन ब्रह्मवाची नहीं हैं । आपका यह कथन असंगत है । दोनों विभिन्न होते हुए भी एकार्थक हैं, इसलिए सिद्धान्त समर्थन में विरोध नहीं है । जैसे कि—"वृक्ष की फुनगी में बाज है' या 'वृक्ष के ऊपर बाज है' इस कथन में कोई अर्थ भेद नहीं है । इसलिए परम पुरुष के ही असीम तेज का 'परोदिवोज्योति- र्दीप्यते' ऐसा प्रतिपादन किया गया है । “एतावानस्य महिमा, अतोज्यायाँश्च पूरुषः, पादोऽस्य विश्वा- भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि” इति प्रतिपादितस्य चतुष्पदः परम- पुरुषस्य “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्, आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” इत्याभिहिताप्राकृतरूपस्य तेजोऽप्यपाकृतमिति तद्वत्तया स एव ज्योतिःशब्दाभिधेय इति निरवद्यम् । “इसकी महिमा पुरुष नाम से भी महान है, इसके एक चरण में विश्व के समस्त भूत हैं तथा तीन अमृतमय चरण द्युलोक में व्याप्त हैं।” इस वाक्य के प्रतिपादित चतुष्पद परं पुरुष का ही “आदित्यवर्ण ( ज्योतिर्मय ) अज्ञानातीत इस महापुरुष को जानता हूँ” इस प्रकार अलौकिक वर्णन किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि--अप्राकृत रूप संपन्न ज्योति भी अनौकिक ही है । इसलिए निर्दोष ब्रह्म ही ज्योति शब्दवाची है ऐसा सिद्ध होता है । ११, अधिकरण— निरतिशय दीप्तियुक्तं ज्योतिश्शब्दाभिधेयं प्रसिद्धवन्निर्दिष्टम् परमपुरुष एकेत्युक्तं; इदानीं कारणत्वव्याप्तामृतत्वप्राप्त्युपायतयोपास्य त्वेन श्रुत इन्द्रप्राणादिशब्दाभिधेयोऽपि परमपुरुष एवेत्याह— प्रसिद्ध की तरह निर्दिष्ट असीम दीप्तिमान् ज्योति परं पुरुष ही हैं ऐसा सिद्ध किया गया । अब कारण के अनुगत धर्म